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बढ़ती आबादी संसाधनों पर भारी, चार दशक बाद किसी प्रधानमंत्री ने चिंता जताई

क्षमा शर्मा Published by: क्षमा शर्मा Updated Wed, 04 Sep 2019 06:56 AM IST
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Population Growth rate in India - फोटो : अमर उजाला

करीब चार दशक बाद किसी प्रधानमंत्री ने बढ़ती आबादी के प्रति चिंता जताई है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में जब आपातकाल लगाया था, तब आपातकाल की प्रतिज्ञाओं में आबादी नियंत्रण पर भी ध्यान देने की बात कही गई थी। कम बच्चे पैदा करने को भी देशभक्ति बताया गया था। उस दौरान आबादी नियंत्रण के लिए लोगों पर काफी जोर-जबर्दस्ती की गई। आपातकाल हटने पर चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी हार गईं। अरसे तक उन्हें परिवार नियोजन के नाम पर हुई ज्यादतियों के लिए याद किया जाता रहा। तब से तमाम राजनीतिक दलों ने इस मसले को उठाना ही छोड़ दिया। इसका ही नतीजा है, आज आबादी विस्फोट पर कोई दल बात नहीं करना चाहता।

अपने देश में सोच यह है कि बच्चे भगवान की देन हैं, बड़ा परिवार सुखी परिवार। यह ठीक है कि मानव पूंजी किसी देश की सबसे बड़ी संपदा होती है। लेकिन, यदि  एक कमरे में क्षमता से ज्यादा लोग ठूंस-ठूंसकर भर दिए जाएं, तो आपस में ही छीन-झपट करेंगे। इस कमरे को अगर पूरा देश मान लिया जाए तो सहज ही सोचा जा सकता है कि संसाधनों के मुकाबले अगर आबादी तेजी से बढ़ती है, तो लोगों को वह सब कुछ नहीं मिलता, जो उन्हें मिलना चाहिए। इससे मामूली बातों पर लड़ाई- झगड़े बढ़ते हैं, जो आजकल दिखाई भी देते हैं।



घरों में लड़कों की चाहत भी इतनी ज्यादा है कि एक के बाद एक कई लड़कियां हों, तो भी जब तक लड़का न हो जाए, बच्चे होते रहते हैं। भ्रूण हत्या का एक बड़ा कारण भी लड़के की चाहत ही है। बताया जा रहा है कि यदि आबादी इसी तरह से बढ़ती रही, तो कुछ सालों में आबादी के मामले में हम चीन को पीछे छोड़कर दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश बन जाएंगे। चीन ने दशकों तक कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति अपनाकर आबादी को काबू किया है। अब उसने इसमें कुछ ढील दी है, लेकिन अपने यहां तो कोई नीति ही नहीं है। दल और सरकारें इस मुद्दे को वोट खोने के डर से उठाने से डरती हैं।

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Population Growth rate in India - फोटो : अमर उजाला
करीब चार दशक बाद किसी प्रधानमंत्री ने बढ़ती आबादी के प्रति चिंता जताई है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975 में जब आपातकाल लगाया था, तब आपातकाल की प्रतिज्ञाओं में आबादी नियंत्रण पर भी ध्यान देने की बात कही गई थी। कम बच्चे पैदा करने को भी देशभक्ति बताया गया था। उस दौरान आबादी नियंत्रण के लिए लोगों पर काफी जोर-जबर्दस्ती की गई। आपातकाल हटने पर चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी हार गईं। अरसे तक उन्हें परिवार नियोजन के नाम पर हुई ज्यादतियों के लिए याद किया जाता रहा। तब से तमाम राजनीतिक दलों ने इस मसले को उठाना ही छोड़ दिया। इसका ही नतीजा है, आज आबादी विस्फोट पर कोई दल बात नहीं करना चाहता।

अपने देश में सोच यह है कि बच्चे भगवान की देन हैं, बड़ा परिवार सुखी परिवार। यह ठीक है कि मानव पूंजी किसी देश की सबसे बड़ी संपदा होती है। लेकिन, यदि  एक कमरे में क्षमता से ज्यादा लोग ठूंस-ठूंसकर भर दिए जाएं, तो आपस में ही छीन-झपट करेंगे। इस कमरे को अगर पूरा देश मान लिया जाए तो सहज ही सोचा जा सकता है कि संसाधनों के मुकाबले अगर आबादी तेजी से बढ़ती है, तो लोगों को वह सब कुछ नहीं मिलता, जो उन्हें मिलना चाहिए। इससे मामूली बातों पर लड़ाई- झगड़े बढ़ते हैं, जो आजकल दिखाई भी देते हैं।

घरों में लड़कों की चाहत भी इतनी ज्यादा है कि एक के बाद एक कई लड़कियां हों, तो भी जब तक लड़का न हो जाए, बच्चे होते रहते हैं। भ्रूण हत्या का एक बड़ा कारण भी लड़के की चाहत ही है। बताया जा रहा है कि यदि आबादी इसी तरह से बढ़ती रही, तो कुछ सालों में आबादी के मामले में हम चीन को पीछे छोड़कर दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश बन जाएंगे। चीन ने दशकों तक कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति अपनाकर आबादी को काबू किया है। अब उसने इसमें कुछ ढील दी है, लेकिन अपने यहां तो कोई नीति ही नहीं है। दल और सरकारें इस मुद्दे को वोट खोने के डर से उठाने से डरती हैं।

साठ के दशक के आखिरी दिनों में यह लेखिका रेलवे स्टेशनों पर परिवार नियोजन के विज्ञापन देखती थी। वे पोस्टरों के रूप में या दीवार पर लिखे रहते थे। तब उनका अर्थ समझ में नहीं आता था। अक्सर कहा जाता था कि देश की आबादी अस्सी करोड़ तक पहुंच गई है। अगर जल्दी ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। आजादी से पहले जब पाकिस्तान अलग नहीं हुआ था, तब आबादी मात्र 34 करोड़ थी। तो ऐसा क्या हुआ कि आबादी इतनी तेजी से बढ़ी कि आज इक्कीसवीं सदी में एक अरब 30 करोड़ तक जा पहुंची?

कौन नहीं जानता कि अधिक आबादी का मतलब है संसाधनों का अधिक दोहन। ज्यादा नौकरियां, ज्यादा घर, ज्यादा अन्न, ज्यादा पानी, अधिक चिकित्सा सुविधाएं, अधिक स्कूल, अधिक परिवहन के साधन। हर साल बढ़ती आबादी और उसका प्रबंधन ही एक ऐसी बड़ी चुनौती होती है कि बाकी सारी समस्याओं का निदान पीछे छूट जाता है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले से बढ़ती आबादी को लेकर जो चिंता जताई है, उसे समग्रता में देखने की जरूरत है।

'हम दो हमारे दो' का नारा मध्य वर्ग ने अपनाया जरूर, लेकिन इसे सभी वर्ग का समर्थन नहीं मिला जिससे यह कारगर नहीं हुआ। 1975 में संजय गांधी ने एक नारा और चलाने की कोशिश की थी- हम दो हमारा एक, लेकिन वह चल नहीं पाया था। कायदे से तो ऐसा होना चाहिए कि जो लोग दो बच्चे के सिद्धांत को अपना रहे हैं, उन्हें सरकार की तरफ से प्रोत्साहन मिले, जिससे कि उन्हें लाभ मिलते देखकर दूसरे भी प्रेरणा पा सकें।
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