ताकाइची आत्मरक्षा बलों को औपचारिक मान्यता देने और रक्षा खर्च को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के दो फीसदी से अधिक बढ़ाने का समर्थन करती हैं। जाहिर है कि ताकाइची का प्रधानमंत्री बनना जापान के उस दिशा में बढ़ने का संकेत है, जो कहीं अधिक मुखर और अधिक सैन्यीकृत होगा। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या उनका प्रधानमंत्री बनना और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के नेतृत्व की दौड़ में उनकी जीत सतर्कतापूर्ण ढंग से शांति बनाए रखने की उस नीति से विचलन है, जो दशकों से जापान की विदेश नीति का विशिष्ट लक्षण रही है। हां, यह जरूर है कि जापान जैसे भारी लिंग असमानता वाले समाज में, जहां महिलाओं की संसदीय भागीदारी 15 फीसदी के आसपास है, उनकी नियुक्ति का प्रतीकात्मक महत्व है।
ताकाइची की जीत भारत के लिए भी फायदेमंद हो सकती है, क्योंकि वह जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की करीबी मानी जाती हैं, जिनके कार्यकाल में भारत व जापान के संबंधों में तेजी से सुधार हुए थे। क्षेत्रीय सुरक्षा और ताइवान जैसे मुद्दों पर चूंकि ताकाइची का पक्ष अमेरिका की हिंद-प्रशांत रणनीति के ही अनुरूप है, ऐसे में, नई दिल्ली उनके लिए एक स्वाभाविक रणनीतिक साझेदार के रूप में उभर रही है।
दूसरी ओर, जब अमेरिका के अनिच्छापूर्ण रवैये के चलते क्वाड की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं, तब ताकाइची का यह कहना महत्वपूर्ण है कि भारत, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के साथ मिलकर एक अर्ध-सुरक्षा गठबंधन बनाने के लिए लोकतांत्रिक देशों के समूह का हिस्सा है। दरअसल, एक ओर अमेरिका चीन का प्रभाव सीमित रखना चाहता है, तो दूसरी ओर, ताइवान को लेकर ताकाइची का रुख क्षेत्रीय भू-राजनीति के शतरंज में भारत की स्थिति को मजबूत बनाता है।
जहां तक बात आंतरिक चुनौतियों की है, तो जापान इस वक्त आर्थिक मंदी, बढ़ती महंगाई और अपनी मुद्रा येन के मूल्य में गिरावट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। हाल की चुनावी हारों ने एलडीपी के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में, येन-केन-प्रकारेण सत्ता के शीर्ष पर पहुंचीं ताकाइची के उदय को समझना, विश्वास के संकट से जूझ रहे एक राष्ट्र की मानसिकता को समझना है। सरकार के अपने सहयोगियों से घोड़े की तरह काम करने का आह्वान करने वाली जापान की नई निजाम के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती तो अपनी सरकार के शासन पर पकड़ को मजबूत बनाने की ही होगी।