फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सूचना का लोकनैतिक अधिकार

Mon, 17 Jun 2013 10:13 PM IST
संदीप जोशी
विज्ञापन
विज्ञापन
यह किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है कि लोकनीति का वायदा करने आए लोग राजनीति करने लगते हैं। अंग्रेजी की राजनीति, हिंदी की लोकनीति कैसे हो सकती है? राजनीतिक तंत्र में सूचना के अधिकार की लोकनीति सर्वव्यापी होनी चाहिए, क्योंकि जो नीति लोकनीति के लिए आवश्यक है, वह राजनीति में कैसे अनावश्यक हो सकती है? अगर सूचना का अधिकार देश की जनता को जानने का अधिकार देता है, तो लोकनीति चलाने वाले राजनीतिक दल इससे अलग कैसे हो सकते हैं? लोकनीति से सरकार चलाना ही राजनीति हो सकता है। आप सरकार में आने तक राजनीति चला सकते हैं, लेकिन फिर आपका लोकनीति से चलना ही लोकतंत्र कहा जाएगा। यही राजनीति में मूलनीति भी है।
विज्ञापन


केंद्रीय सूचना आयोग ने कहा कि सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार के तहत आना होगा। बौखलाए राजनीतिक दल सूचना आयोग के इस थोपे गए कथन को पचा नहीं पा रहे हैं। आयोग के इस आग्रह पर सभी दल रट्टू तोते की तरह आदेश को नकार रहे हैं। आजादी के पैंसठ सालों में सबसे ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस तो साफ मुकर गई है। राज पर नाज करना और नाज में काज करना अगर होता, तो आयोग के लोकतांत्रिक आग्रह पर कांग्रेस भी नाज कर सकती थी। पर नाज तो दूर, उनको लाज भी नहीं आ रही है। राजनीतिक दल इसकी बहस में भी नहीं पड़ना चाहते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत आना उनको क्यों  मान्य नहीं है?

सरकार में बैठी कांग्रेस कह रही है कि ऐसे जोखिमभरे फैसले लोकतंत्र की संस्था को कमजोर कर सकते हैं। यह तब कहा जा रहा है, जब देश की ज्यादातर लोकतांत्रिक संस्थाएं नाटकीय ढंग से सरकारी दंभ में चलाई जा रही हैं। वहीं भाजपा मान रही है कि पार्टियों पर आरटीआई लागू करना चुनाव आयोग के कार्य में दखलंदाजी होगा। जनता को राजनीतिक दलों के बारे में जानने का अधिकार उसी तरह है, जैसे चुनाव में उनका मताधिकार। फिर जो चुनाव आयोग को जानकारी मिलती है, उसे जनता को जानने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक ही धुन पर बीन बजाए जा रहे हैं। अन्य दल इनकी आड़ में अपनी पारी चलाए रखना चाहते हैं।
विज्ञापन



सूचना आयोग मानता है कि राजनीतिक दल लोकसंस्था हैं और उनकी जवाबदेही सूचना के अधिकार के तहत लोकाचार में आनी चाहिए। सवाल है कि सरकार की गतिविधियों को सूचना के अधिकार से आपत्ति क्यों होनी चाहिए। आखिर सरकारें चलती भी तो जनता के लिए ही हैं, फिर वही जनता कैसे उनको चलाने में अवरोधक हो सकती है? और अगर अवरोध पड़ता है, तो उसका निपटारा सरकार को करना चाहिए। लेकिन जानने का अधिकार जनता से छीनने का हक किसी को भी नहीं होना चाहिए, राजनीतिक दलों को भी नहीं। क्या राजनीतिक दल सरकारी धन का उपयोग नहीं करते हैं? क्या प्रमुख दल चंदा अत्यधिक मात्रा में यानी करोड़ों में नहीं पाते हैं? और क्या वही दल, लोक विकास की प्रक्रिया में पारदर्शिता को अहम और अच्छा नहीं मानते हैं?

देश की जनता इन सवालों का जवाब चाहती है। लोकनीति बनाने वाले, और लोकाचार चलाने वाले कैसे लोकाधिकार से अलग रह सकते हैं, बावजूद इसके कि यह दलों को सही राह दिखाने और सुचारू सरकार चलाने में मदद ही कर सकता है।

लोकनीति चलाना राजनीति का व्यापार करना कैसे हो सकता है? सभी सरकारी घोटाले सूचना के अधिकार के कारण ही उजागर हुए हैं। लगातार ऐसे उद्घाटन से ही सरकार को सुचारू रूप से चलाने में मदद मिलती है। दलों और उनके नेताओं के विकास के लिए पारदर्शिता जरूरी है, और तभी जन विकास भी सुचारू चलता है।

सेवा का अधिकार सूचना के अधिकार के बिना कैसे मान्य हो सकता है? अधिकारों की इस जंग में सही सूचना से ही स्थिर सत्ता चलाई जा सकती है। राजनीति के लिए लोकनीति ही जरूरी है। महात्मा गांधी ने भी कहा था कि जो बदलाव आप खुद में नहीं ला सकते हैं, वह जनता पर कैसे थोप सकते हैं। सूचना का अधिकार जनता पर लागू करने से पहले राजनीतिक दलों को इसे अपने पर लागू करना होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें