बीते कुछ वर्षों में 'महिला सशक्तीकरण' की गूंज भले ही चारों ओर सुनी जा रही है, लेकिन कुछ लोग इससे इत्तफाक नहीं रखते। वे इसे राजनीतिक शुचिता की दिशा में उठाया गया नया कदम नहीं, बल्कि ऐसा हथकंडा मानते हैं, जिसकी सहायता से महिला मतदाताओं को भरमाया जाता है। पर हाल की कुछ घटनाएं साफ करती हैं कि लैंगिक समानता की बात क्यों सिर्फ सनक नहीं है।
नार्वे की 24 वर्षीय मार्टे डेलेव को याद कीजिए। अपनी दुबई यात्रा के दौरान हुए बलात्कार की जब उसने शिकायत की, तो उसे ही विवाहेतर संबंध रखने सहित कई आरोपों में 16 महीने की सजा सुना दी गई। यह सजा बलात्कार करने वाले व्यक्ति को दी गई सजा से भी तीन महीने ज्यादा है। हालांकि जब यह मुद्दा जोर-शोर से उछला, तो संबंधित अधिकारियों ने डेलेव को 'माफी' दे दी, लेकिन यह माफी उसके आरोपी को भी मिली। इस घटना के परिप्रेक्ष्य में पहला कारण समझा जा सकता है कि आखिर क्यों 'सशक्तीकरण' सिर्फ एक फील गुड का नारा नहीं है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि लैंगिक अन्याय हर जगह है, दुबई में भी और अमेरिका में भी। अमेरिकी सेना में ही यौन हिंसा का दुखद रिकॉर्ड रहा है। इसमें सालाना करीब 26,000 सैनिक अवांछित यौन संबंधों से जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति बराक ओबामा अब तक कर्स्टन गिलीब्रांड के उस प्रस्ताव को वापस कांग्रेस में लाने में सफल नहीं हो पाए हैं, जिसमें सेना में बलात्कार जैसे मामलों की जांच में सुधार लाने और हितों के टकराव को रोकने की बात कही गई है। और यही वह दूसरी वजह है, जो सशक्तीकरण का पक्ष मजबूत करती है, क्योंकि राजनीति में निर्णयों को प्रभावित करने लायक महिलाओं का प्रतिनिधित्व ही नहीं है।
असल में, जो लोग यह सोचते हैं कि महिला सशक्तीकरण कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है, उनके लिए पाकिस्तान की मलाला युसुफजई की भी अहमियत नहीं है, जिसे महिला शिक्षा की वकालत करने की वजह से तालिबान ने गोलियों का निशाना बनाया और जिसने अपने 16वें जन्मदिन पर हाल में संयुक्त राष्ट्र को संबोधित किया। मलाला ने अपने संबोधन में बताया कि आखिर महिलाओं का सशक्तीकरण क्यों जरूरी है। जैसा कि मलाला ने कहा, बदलाव की दिशा में सबसे मजबूत ताकत शिक्षा है, विशेषकर लड़कियों की शिक्षा। 9/11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हजारों जानें गंवाईं और सैकड़ों-अरबों डॉलर खर्च किए, पर हम प्रमाणित क्या कर पाए? हमें शिक्षा मद में अधिक से अधिक खर्च करना चाहिए था, क्योंकि ड्रोन और सेना कभी-कभी अतिवाद को मजबूत करते हैं। बदलाव सिर्फ बम-बंदूक से ही नहीं आ सकता, किसी पेड़ के नीचे या किसी मस्जिद में शिक्षा ग्रहण करती कोई लड़की भी इसकी संवाहक हो सकती है। संभव है कि उसके जैसी लड़कियां कम बच्चे पैदा करें, अपने पांवों पर खड़ी हों और उनके भाई या बच्चे तालिबान से न जुड़ें।
बदलाव की दिशा में महिलाएं उत्तोलक की भूमिका निभा सकती हैं, इस संबंध में मेरा नजरिया तब और स्पष्ट हुआ, जब मैं कुपोषण पर गहन अध्ययन कर रहा था। दुनिया भर में कुल बच्चों की होने वाली मौत में 45 फीसदी मौत इसी कुपोषण की वजह से होती है। इन लाखों बच्चों की जान सिर्फ भूखों तक अन्न पहुंचाने या अफ्रीका में खेती विकसित करने से ही नहीं बचेगी। इसमें महिला सशक्तीकरण का भी बड़ा हाथ होगा। हमने कई ग्रामीण महिलाओं से बात कर यह जानने का प्रयास किया कि आखिर बच्चे कुपोषित क्यों हैं? जो बड़ा कारण सामने आया, वह है, ग्रामीण क्षेत्रों में पहले पुरुषों का, फिर बाद में बच्चों और महिलाओं का भोजन करना, जो दुनिया भर में आम है। इस शोध में यह भी पाया गया कि जमीनों पर महिलाओं को अधिकार देना, उन्हें उत्तराधिकारी चुनना और उनका बैंक खाता खुलवाने का प्रभाव सिर्फ सांकेतिक नहीं होता, बल्कि यह घर के फैसलों में महिलाओं का हस्तक्षेप बढ़ाने और बच्चों का जीवन बचाने की रणनीति है।
इसलिए जो लोग राजनीतिक शुचिता के लिए 'महिलाओं के अधिकार' पर उत्तेजित हो जाते हैं, वे दोबारा सोचें। यह मुद्दा किसी पुरुष या महिला से संबंधित नहीं होता, बल्कि यह तो पूरे समाज से जुड़ा है। मलाला के शब्दों में कहें, तो 'हम तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक आधी आबादी पिछड़ी रहेगी'।