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आवारा पूंजी की क्रांतिकारी हेडलाइन

Sun, 28 Jun 2015 04:05 PM IST
यशवंत व्यास
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सालों साल पहले जॉर्ज ऑरवेल को यह पता था और सालों साल बाद हमारे खबर वीरों को भी पता है। लेकिन, दुनिया चलती रहती है। खबरों का व्यवसाय भी चलता रहता है। प्यू रिसर्च के एक आंकड़े के मुताबिक पब्लिक की नजर में आज की तारीख में समाज को कुछ देने वालों की पंक्ति में, सबसे आखिर वालों में जर्नलिस्ट हैं। उनकी कद्र का स्तर यह है, तो सिर्फ इसलिए वे समाज में कुछ जोड़ते नहीं, जोड़ने-घटाने के दौरान शोर को 'एम्प्लीफाई' करके सुनाते हैं या शांति को भयावह बनाते हैं। वकीलों की जोड़ उनसे मिलती है। रिसर्च के मुताबिक वैज्ञानिक-शिक्षक इसके बनिस्बत समाज के ज्यादा काम के हैं। उनकी विश्वसनीयता और योगदान का ध्यान रखना चाहिए।
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आंकड़े अमेरिकी हैं और कोई शक नहीं कि राजनीति करने वालों के प्रति भाव भी वही हैं, जो यहां पाए जाते हैं। इसी साल पुलित्जर से सम्मानित होने की खबर जिन पत्रकारों के पास पहुंची, वे अपना धंधा बदलकर पब्लिक रिलेशन में जा चुके थे। वजह, अच्छी पत्रकारिता करके रोज कमाने की संभावनाएं क्षीण लग रही थीं और पब्लिक रिलेशन में पर्याप्त पैसा था। वे ईमानदार थे और जो चल रहा था, उसमें उसी नाम से जाना बेहतर समझते थे। वे उनसे ज्यादा पारदर्शी थे, जो महान पत्रकारिता की मुद्रा में पब्लिक रिलेशन का धंधा कर रहे हैं।

ललित मोदी हाल के सबसे बड़े पत्रकार हैं। और, यह सारा हिसाब-किताब इसीलिए।

ललित मोदी ने जितने ट्वीट किए वे खबर बन गए। जितने फोटो पोस्ट किए, वे पूंजी के उन्मत्त खेल का वास्तविक 'स्कूप' बन गए। वे खुद नायक हैं, खुद मुखबिर हैं, खुद स्रोत हैं, खुद संवाददाता हैं, खुद प्रकाशक-मुद्रक-संपादक हैं और मीडिया के अकबर-जहांगीर उनके स्रोत से पुनर्मुद्रण करके अपनी-अपनी क्षमता और एजेंडे के अनुरूप धुआंधार कर रहे हैं।
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'ओपिनियन जर्नलिज्म' का धमाल मचा हुआ है। सब बता रहे हैं कि देश का क्या होगा? और दिलचस्प यह है कि चाहे देसी नीरा राडिया लैबोरेटरी हो या आयातित एजेंडा फैक्टरी, 'फाइनेन्स' और 'लीगल' - दो इलाके हैं जिनमें भीषण राजनेता मीडिया के महान विशेषज्ञों से गलबहियां करते हुए राष्ट्र की दिशा निर्धारित करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। जो चीजें सालों पहले पता थीं, वे प्रकट तब होती हैं, जब किसी पार्टनर को समस्या हो जाती है। ख्यातनाम क्रांतिकारी टाइमिंग निर्धारित करते हैं। वे बताते हैं कि कब, क्या, कैसे ब्रेक करना चाहिए? हमारे प्रख्यात राजनेता-वकील, किसी कुख्यात को बचाने का केस ही हाथ में लेते हैं, किसी को सजा दिलाने के मामले में उनकी दिलचस्पी व्यक्तिगत एजेंडे तक ही सीमित रहती है। पहले पर्दा था, अब तार्किक दुस्साहस है।

एक प्रख्यात खोजी पत्रकार का बौद्धिक मेला, एक कुख्यात शराब व्यवसायी के फाउंडेशन की मदद से समृद्ध हो रहा था, यह तब पता चला जब वे दुर्योगवश व्यक्तिगत चरित्र के मामले में फंस गए। वर्ना मेला भी आबाद था और क्रांति के सूत्र तो अब भी वहीं से सिंचित हो रहे हैं।

तो, यह क्या वजह है कि पूंजी को कानूनी कलाओं से प्रस्तुत करने वाले आर्थिक विशेषज्ञ राजनीति को मीडिया के साझे संचालन में चला पाते हैं? कुछ चेहरों को वह शक्ति कैसे प्राप्त हो जाती है कि वे शेड्यूल बनाकर खबरें और विश्लेषण बो पाते हैं, फसल खड़ी करवा देते हैं और उसे 'राष्ट्रीय हित' का उत्पादन स्थापित करते हैं। कैसे जो सचमुच ईमान के एजेंडे पर रहना चाहते हैं या तो उनका उपयोग करने की कोशिश होती है या वे मंदिर के नंदी बनाए दिए जाते हैं?

इसका उत्तर 'ख्यात' में छुपा है। आपने नोट किया होगा कि जो भी इस गोरखधंधे में हैं, वे सब 'ख्यात' हैं, कुख्यात या विख्यात। सेलिब्रिटी स्टेटस के ये चेहरे, एक छोटे से खास सर्कल में आवाजाही करते हैं। क्रिकेट, राजनीति, मीडिया, उद्योग-व्यापार या मनोरंजन के तमाम ऊंचे धंधों में, अलग-अलग मुद्राओं में इनकी समान उपस्थिति है। इस तरह से वैचारिक सत्ता के रसूखदार कौन-सा रंग चलना चाहिए से लेकर, कौन-सी वैचारिक भंग पी जानी चाहिए तक निर्धारित करने का तंत्र निर्मित करते हैं। वित्तीय रूप से सफल, पहुंच के स्तर पर निष्णात, मूल्यों के स्तर पर नियंता तथा प्रस्तुतिकरण के स्तर पर परम तार्किक।

इस पर ब्यूरोक्रेसी से काम कराने वाले उस रिटायर्ड क्रांतिकारी जर्नलिस्ट से पूछिए जो नए दौर में सीओओ 'कॉरपोरेट अफेयर्स' हो गया है। उसे अकेले में मार्क्सवादी चूरन फांकते हुए मिलने पर पता चलेगा कि ललित मोदी एक 'फिनॉमिना' है और उसके लालित्य का आनंद कहां-कहां छाया हुआ है। खबरें प्लांट कराने में विशेषज्ञता के तहत कई महत्वपूर्ण स्थलों पर आवाजाही की घोषित मिसाल एक सज्जन ने पिछले दिनों कहा, 'आडवाणी के दुख में वे सुखी हैं, जो मोदी के सुख में दुखी हैं। सारा सट्टा एक के दुख और दूसरे के सुख पर लगा है।'

यह कांग्रेसी इमरजेंसी पर विमर्श का सत्य था। जाहिर है, वैचारिक विशेषज्ञ ज्यादा खतरनाक होते हैं, वे चाहें तो कंबोडिया को बांग्लादेश के गांव की धर्मशाला साबित करके चकित कर सकते हैं। इसलिए ललित मोदी पूरा आनंद ले रहे हैं। जिसके हमाम का दरवाजा टूटता है, उसकी सेल्फी निकल आती है।

माइकल रोजनब्लम ने कहा है, जर्नलिस्ट खत्म हुआ। सबसे बड़ी होटल कंपनी के पास एक कमरा अपना नहीं, सबसे बड़ी टैक्सी कंपनी के पास एक टैक्सी अपनी नहीं। आगे सुनेंगे, सबसे बड़ी मीडिया कंपनी के पास अपना कोई जर्नलिस्ट नहीं।

यह मोबाइल की सूचना-विस्फोट क्षमता के संदर्भ में दिया गया बयान था। जब अभिव्यक्ति के पहरेदार होने की प्रतिष्ठा भी चाहिए होगी और मुनाफे के एजेंडे की सिक्यूरिटी एजेंसी का मालिकाना हक भी, तब सिर्फ लीगल एडवाइजर, फाइनेंस एक्सपर्ट, पॉलिटिकल लॉबिस्ट और सेलिब्रिटी जर्नलिस्ट का सामूहिक आख्यान ही ललित का लालित्य निर्मित कर पाएगा।

सांप-नेवले के खेल का झांसा देकर दंत मंजन बेचना निश्चित ही एक कला है। लेकिन जनता की वैचारिक सत्ता पर मीडिया यह दांव कैसे खेल सकता है?

यह आवारा पूंजी से पूछो। जनपथ, राजपथ और लोधी गार्डन, से पूछो! भूल से भी, उंगलियों से मोबाइल पोस्ट उगलते, फार्म हाउसों में प्रवचन करते क्रांतिकारी थिंकर मीडिया उस्ताद से न पूछो!
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वह नए विश्व की रचना में ध्वस्त है।

जनता उससे मुक्ति की प्रतीक्षा करे!
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