इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इस बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नदी दिवस की विषयवस्तु महिलाओं के योगदान पर केंद्रित है और इसमें कहीं कोई अतिश्योक्ति नहीं है, क्योंकि अगर नदी से सीधा किसी का कोई रिश्ता जुड़ा है, तो वह शायद महिलाएं ही हैं। महिलाएं और नदी, दोनों एक ही व्यवहार के होती हैं, क्योंकि महिलाएं परिवार का केंद्र होती हैं, सबके सुख-दुख व पालन-पोषण की जिम्मेदारी सीधे उनकी होती है और यही अमूमन व्यवहार नदियों का भी होता है। नदियां न जाति देखती हैं, न वर्ण देखती हैं। वे सबके लिए समान भाव से अनवरत सेवा में रत हैं और उनसे जितना भी संभव हो, उनकी हर बूंद लोकहित में समर्पित होती है। इसलिए इस बार का नदी दिवस अपने आप में महत्वपूर्ण इसलिए बन जाता है, क्योंकि इसे महिलाओं से जोड़ने की कोशिश की गई है। पिछले कुछ समय से जब देश में जल संकट खड़े हुए, तो इस सत्य से सभी अच्छी तरह परिचित हैं कि देश भर में महिलाओं ने ही पानी को जोड़ने का बड़ा बीड़ा उठाया है।
राजस्थान की बावड़ियों की बात हो या उत्तराखंड की सूखती धारों की या फिर तमिलनाडु में पानी व नदी को लेकर किए जा रहे बड़े प्रयोगों की बात, वह सीधे महिलाओं की भागीदारी से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में हैस्को शुक्लापुर की आसन गंगा नदी या फिर तिलवाड़ा में मंदाकिनी की सहायक नदियां या जैराज अल्मोड़ा में रामगंगा की सहायक नदियां हों या चकराता के स्थानीय गाद-गदेरों व धारों की बात हो, यहां स्थानीय महिलाओं ने इनके पुनरूद्धार के लिए कमर कसी है। उन सूखी धारों में पानी की वापसी के लिए जो कवायद शुरू की गई है, वह अपने आप में एक बहुत बड़ा प्रयोग है। आज इनके जलछिद्रों का प्रयोग पूरे देश में सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं ने अपनाया है।
यह मान कर चलिए कि अगर नदियों की वापसी हम सबको तय करनी है, तो स्वाभाविक ही है कि इसका एक ही अवसर हो सकता है कि हम महिलाओं के जुड़ाव को बढ़ाने के रास्ते देखें और यह मानकर चलें कि महिलाएं ही नदी का पर्याय हैं। नीति आयोग हो या जल मंत्रालय, उसे अपनी जल व नदियों से जुड़ी नीतियों के रास्ते महिलाओं से होकर ही ले जाने होंगे, क्योंकि यह तो तय है कि पुरुष वर्ग अपने अन्य कई कार्यों से जुड़ा है। यह समझ बनाने की सबसे बड़ी आवश्यकता होगी कि हम नदियों को जोड़ने के रास्ते अगर महिलाओं के साथ मिल बैठकर तैयार करेंगे, तो बेहतर परिणामों पर पहुंच सकेंगे। दुनिया में सभ्यताओं का उद्गम नदियों के साथ हुआ है, और वर्तमान में भी नदियों के चलते ही सब कुछ चल रहा है। कुएं, तालाब, नाले और पानी से जुड़े स्रोत नदियों की देन हैं। नदियों को अलग-थलग रखने की हमारी भूल हमारे वर्तमान व भविष्य के साथ की जाने वाली सबसे बड़ी गलती साबित होगी।
देश की 265 से ज्यादा नदियां या तो मरने को हैं या मरने के कगार पर हैं। घर-गांव की छोटी-मोटी नदियां, तो वैसे भी गायब हो चुकीं, जिनका बड़ी नदियों को बनाने में एक अहम योगदान होता है। छोटी-छोटी नदियों के मरने की खबर हमें विचलित न करती हो पर अब बारी बड़ी नदियों की है। देश की सारी बड़ी नदियां भी संकट आ चुकी हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि नदी छोटी हो या बड़ी, कभी अकेली नहीं होती। इसके साथ बहुत कुछ जुड़ा होता है। जल, जंगल, जमीन से इसके सीधे रिश्ते हैं। किसी भी एक नदी का असर उसी जगह नहीं होता, जहां वह बहती है, बल्कि उससे सैकड़ों किलोमीटर दूर भी उसकी उपस्थति होती है।
मनुष्य ही नहीं, कई और प्राणियों के जीवन भी इनसे जुड़े होते हैं। साफ-सी बात है कि किसी एक जगह नदी से किया हुआ कोई व्यवहार वहीं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विस्तारित होता है। और इसलिए हमारे शास्त्रों ने नदियों को मां की संज्ञा दी है, जो पालक के रूप में जानी जाती है। असल में नदियों की रक्षा व संरक्षण सबका दायित्व है। आज बड़े मंथन व विचार की आवश्यकता है कि हम सामूहिक संकल्प लें और नदियों को बचाने के लिए एकजुट जरूर हों पर ये आंदोलन महिला केंद्रित होने चाहिए, क्योंकि महिलाएं ही एक सामूहिक भविष्य के लिए बेहतर परिणाम दे सकती हैं और नदियों के प्रति न्याय कर सकती हैं।