यूपीए के दशक में (2004-14), जब आर्थिक विकास की दर अच्छी थी और माना जाता था कि 2004 के चुनाव में एनडीए के इंडिया शाइनिंग के खिलाफ मत पड़े हैं, भारत में हक-आधारित कल्याणकारी व्यवस्था के निर्माण की तरफ कदम उठाए गए। इन छोटे-छोटे कदमों, मसलन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, शिक्षा का हक इत्यादि को मुख्यधारा की मीडिया ने यूपीए सरकार की 'माई-बाप सरकार' मानसिकता करार दिया। कहा गया कि ऐसे कार्यक्रम निर्भरता पैदा करेंगे, और ये 'भीख' देने के बराबर हैं। पर ये कानून माई-बाप सरकार की मानसिकता से विपरीत हैं। किसी भी सरकार की सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रतिबद्धता से स्वतंत्र, ये लोगों के मूल अधिकार सुरक्षित करते हैं। सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर भारत विश्व के गरीब देशों में भी पीछे है। इसके बावजूद समाज के समृद्ध तबके ने इन कानूनों का विरोध किया।
जब से नई सरकार ने डोर संभाली है, वास्तव में माई-बाप सरकार का असली स्वरूप दिखने लगा है। माई-बाप सरकार यानी ऐसी स्थिति, जहां लोग अपने हकों के लिए सरकार की शुभेच्छा पर निर्भर हैं। राजस्थान में तो ऐसी ही स्थिति दिखती है। अपनी सरकार के एक वर्ष से भी कम समय में वसुंधरा राजे ने, जिन्हें किसी ने 'आम आदमी की महारानी' का ओहदा दिया है, कई तरह से इसे स्पष्ट किया है। पहला किस्सा है, बारां के सहरिया परिवारों के लिए शुरू किए गए खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का। काफी पिछड़ी मानी जाने वाली यह सहरिया जनजाति खबरों में तभी होती है, जब उनमें भूख से मौतें होती हैं, या बंधुआ मजदूरी के किस्से सामने आते हैं। इनके लिए पिछली सरकार ने 35 किलोग्राम गेहूं, दो किलो खाद्य तेल व दाल और एक किलो घी की मुफ्त व्यवस्था की एक योजना चलाई थी। राजे के आते ही इसे रोक दिया गया। छह महीनों तक आश्वासन दिया गया कि इसे जल्दी शुरू किया जाएगा, मगर जब विगत जुलाई में गेहूं की आपूर्ति शुरू हुई, तो सरकार ने इसका दाम रखा, दो रुपये प्रति किलो। बाकी पौष्टिक खाद्य पदार्थों की तो खबर ही नहीं थी। काफी आलोचना के बाद सितंबर में गेहूं के मुफ्त वितरण और दूसरे खाद्य पदार्थों के वितरण की बात जनजाति क्षेत्र विकास प्राधिकरण (टीएडीए) ने कही। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। मुफ्त गेहूं बांटने की घोषणा फरवरी, 2015 तक ही लागू है। उसके बाद लोगों को फिर से सरकार के सामने हाथ फैलाने होंगे।
राजस्थान की मुख्यमंत्री द्वारा इन कार्यक्रमों को अपनी 'जागीर' के रूप में चलाने का दूसरा उदाहरण स्वास्थ्य क्षेत्र में दिखता है। 2011 से वहां सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त दवाइयों का कार्यक्रम चलाया जा रहा था, जो बेहद लोकप्रिय था। इन केंद्रों में कोई भी मुफ्त इलाज करवा सकता है। चुनाव से पहले वसुंधरा राजे ने दवाइयों को 'जहर' कहा, मगर सत्ता में आने के बाद उन्होंने इसे जारी रखने का समझदारी वाला फैसला लिया। पर जुलाई में फिर उनका मूड बदल गया, और अब इसे केवल खाद्य सुरक्षा कानून के लाभार्थियों तक ही सीमित कर दिया गया है।
मनरेगा पर मुख्यमंत्री के ख्याल और भी चौंकाने वाले हैं। एक सम्मेलन में उन्होंने कहा, 'सभी जानते हैं कि यह कानून पूरी तरह से नाकामयाब रहा है। यह लोगों को भीख देने जैसा है, क्योंकि लोग अब काम नहीं करते। आप चार घंटे काम कीजिए, पैसे लीजिए और घर जाइए। तो अब आपने लोगों को कामचोर बनाना सिखा दिया है।' इसके विपरीत 2014 की वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट में मनरेगा को ग्रामीण विकास का एक उत्कृष्ट नमूना बताया गया है।
यह 'माई-बाप सरकार' की मानसिकता राजस्थान तक ही सीमित नहीं है। जहां तक मनरेगा की बात है, सरकार ने नुकसान पैदा करने वाले कुछ प्रस्ताव रखे हैं, जिनमें श्रम-सामग्री अनुपात को सामग्री के पक्ष में बढ़ाने की बात चल रही है। इससे ठेकेदारों की वापसी होगी, जो मनरेगा में प्रतिबंधित थे, और जो पहले के रोजगार कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार की मूल वजह साबित हुए थे। कुछ परिस्थितियों में मशीनों के प्रयोग की भी अनुमति दी गई है। मजदूरी की दर कई वर्षों से बढ़ी नहीं है। इन्हीं वजहों से ग्रामीण मजदूरों को सशक्त बनाने की जो कोशिश मनरेगा कानून की थी, वह कमजोर पड़ रही है। तिस पर इस कानून को एक-तिहाई जिलों तक ही सीमित किए जाने की भी अफवाह जोरों पर है।
यह मानसिकता केवल मनरेगा तक सीमित नहीं, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को भी चुपके से किनारे कर दिया गया है। कुछ लोग कहेंगे कि अब तो यह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे लाभार्थी परिवारों का चयन करें। पर यहां भी केंद्र सरकार सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के आंकड़े राज्यों को न देकर इस कानून के क्रियान्वयन में बाधा डाल रही है, क्योंकि लाभार्थी परिवारों के चयन के लिए ये आंकड़े जरूरी हैं।
कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि मनरेगा और खाद्य सुरक्षा कानून को चोट पहुंचाने की वजह माई-बाप सरकार की मानसिकता नहीं, बल्कि राजकोषीय घाटे को काबू में लाने की जरूरत है। मगर जरा सोचिए, मनरेगा का बजट जीडीपी का केवल 0.3 प्रतिशत है, जबकि अमीर कंपनियों को कर में जो छूट मिलती है, वह जीडीपी का तीन प्रतिशत है। अफसोस की बात है कि सरकारी आय बढ़ाने पर तो चर्चा भी नहीं होती। अर्थशास्त्री पिकेटी और कियान की शोध रिपोर्ट (2007) के अनुसार, 1986 से 2008 के बीच चीन में कर देने वाली जनसंख्या 0.1 से बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि इस दौरान भारत मे यह दो से तीन प्रतिशत के बीच अटकी हुई है।
दरअसल, वंचित वर्गों के सशक्तिकरण के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रम जब नेताओं की मनमर्जी पर चलने लगते हैं, तो वे अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। अधिकार दिए जाने से लोगों में सुरक्षा का भाव आता है, ताकि वे अपने अस्तित्व को बचाए रखने से आगे की सोच पाएं। वहीं अधिकारों को कमजोर करने से लोग अनिश्चितता के भंवर में डूब जाते हैं। यह अगर माई-बाप सरकार नहीं, तो क्या है?
(सामाजिक कार्यकर्ता और आईआईटी, दिल्ली से संबद्ध)