भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार, सुधार तथा पुनर्वास अधिनियम, 2013 ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 जैसे किसान एवं जन विरोधी कानून की जगह ली थी। यह कानून सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र के सभी संबंधित लोगों के बीच गहन विचार-विमर्श का नतीजा था। इसके लिए किसानों, पर्यावरणविदों, व्यवसाय जगत और सरकार की चिंताओं के समाधान के लिए सहमति बनाने की जरूरत पड़ी। यह कानून अन्याय से समानता की ओर एक लंबी छलांग जैसा था। भूमि अधिग्रहण का यह कानून परिवर्तनकामी होने के साथ ही किसानों एवं आम लोगों के हित में था। इस एक ही कानून में भूमि अधिग्रहण के साथ-साथ पुनर्वास, पुनर्स्थापन एवं मुआवजा जैसे तमाम मुद्दों को समेटा गया, क्योंकि इन्हें परस्पर संबंधित माना गया।
इस कानून की चार अवधारणाएं थीं। पहला, अगर सरकार भूमि का अधिग्रहण करना चाहेगी, तो पहले उसके सामाजिक प्रभाव के आकलन के लिए अध्ययन करना होगा। प्रभावित क्षेत्र में संबंधित पंचायत, नगरपालिका एवं नगर निगम से सलाह लेनी होगी। प्रभावित परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ मुआवजे और अन्य कारकों का भी इसमें विश्लेषण होगा। जन-सुनवाई के साथ सामाजिक प्रभाव प्रबंधन योजना इस प्रक्रिया का अंतर्निहित हिस्सा होगी। इसमें सामाजिक प्रभाव के आकलन की रिपोर्ट तैयार करने और संबंधित सरकारों को सुझाव देने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र समूह गठित करने की जरूरत थी। बदले में सरकार को प्रस्तावित अधिग्रहण के लिए वैधता और वास्तविक सार्वजनिक उद्देश्य निर्धारित करने और उसी के अनुसार फैसला लेना होता।
दूसरी अवधारणा थी कि अगर अधिग्रहण सार्वजनिक हित में निजी कंपनियों के लिए किया जाएगा, तो 80 फीसदी प्रभावित परिवारों की सहमति जरूरी होगी। जहां प्रस्तावित अधिग्रहण सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) प्रोजेक्ट के लिए होगा, वहां अधिग्रहण से पहले 70 फीसदी प्रभावित परिवारों की सहमति जरूरी होगी।
तीसरी अवधारणा सिंचित क्षेत्र की बहुफसली भूमि के अधिग्रहण से संबंधित थी। सिंचित भूमि का बड़ा हिस्सा बहुफसली है और यह खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है। भूमि अधिग्रहण कानून में कहा गया कि ऐसी भूमि केवल अंतिम विकल्प के रूप में अधिगृहीत की जाएंगी। चौथी अवधारणा 1894 के कानून के तहत अधिग्रहण खत्म होने से संबंधित थी, जिसमें कहा गया कि यदि इस कानून के अस्तित्व में आने से पांच वर्ष या उससे पहले अधिग्रहण किया गया हो, पर भौतिक कब्जा न किया गया हो और मुआवजा भी न दिया गया हो, तो अधिग्रहण रद्द होगा।
भूमि अधिग्रहण कानून की उपरोक्त ज्यादातर विशेषताओं को संशोधित अध्यादेश में खत्म कर दिया गया है। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा या रक्षा क्षेत्र से संबंधित महत्वपूर्ण परियोजनाओं सहित ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी संरचनाओं से संबंधित परियोजनाओं में सामाजिक प्रभाव के निर्धारण और जनहित के आकलन में मुश्किल आएगी। ऐसी परियोजनाओं में औद्योगिक कॉरीडोर और पीपीपी से संबंधित सामाजिक आधारभूत संरचनाएं भी शामिल हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भारी निवेश पर जोर दिया जा रहा है, जिसमें सरकार निष्पक्षता के बजाय गति पर जोर दे रही है। वह ऐसे लाखों लोगों के हितों के बजाय बड़े व्यवसायियों के हितों को तरजीह दे रही है, जिनकी आजीविका का एकमात्र स्रोत जमीन है। इस अध्यादेश से पीपीपी, दिल्ली-मुंबई एवं अन्य औद्योगिक कॉरीडोर, स्मार्ट सिटी, नए शहर जैसी तमाम परियोजनाएं सामाजिक प्रभाव और जनहित के आकलन जैसे प्रावधान से मुक्त हो जाएंगी।
संशोधित अनुबंध के माध्यम से यह अध्यादेश बताता है कि निजी अस्पताल और निजी शिक्षण संस्थान के लिए, जिन्हें सरकार पट्टे पर जमीन देती है, और जो सामाजिक आधारभूत परियोजनाएं मानी जाती हैं, भूमि अधिग्रहण करते वक्त सामाजिक प्रभाव और जनहित के आकलन जैसे प्रावधानों का पालन जरूरी नहीं है। इसके लिए सिंचित बहुफसली भूमि का भी अधिग्रहण किया जा सकता है। वास्तव में, लगभग सभी आधारभूत संरचनाओं से संबंधित परियोजनाओं को भूमि अधिग्रहण कानून में प्रदान की गई जांच से छूट दी जाएगी। नया अध्यादेश बताता है कि सार्वजनिक हित के लिए अधिगृहीत जमीन निजी कंपनियों और निजी संस्थाओं को भी दी जा सकती है। इन निजी संस्थाओं में भागीदारी, गैर कॉरपोरेट संगठन और रजिस्टर्ड सोसाइटी भी शामिल होंगी।
सबसे चिंता की बात है कि उपरोक्त सभी परियोजनाएं, जिनमें पीपीपी समेत निजी संस्थाओं के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाएगा, क्रमशः 80 या 70 फीसदी परिवारों की सहमति लेना जरूरी नहीं होगा। अधिगृहीत भूमि पर पांच वर्ष या उससे अधिक की अवधि में भौतिक कब्जा न करने या मुआवजा न चुकाने की स्थिति में जमीन किसानों को नहीं लौटाई जाएगी, बल्कि कुछ मामलों में सरकार के कब्जे में रहेगी। इस तरह से कानून के महत्वपूर्ण प्रावधानों को सरकार के पक्ष में पलट दिया गया है।
यह अध्यादेश 1894 के कानून से अलग नहीं है। औपनिवेशिक कानून की तरह यह अध्यादेश किसान और आम लोगों के हितों के खिलाफ है। इससे राज्य सत्ता के रथ के नीचे हाशिये के लोगों का गला घोंटा जाएगा। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों और आदिवासियों को होगा। यह सब कुछ जीडीपी बढ़ाने और आर्थिक विकास के नाम पर हो रहा है।
भूमि अधिग्रहण कानून के तहत सावधानीपूर्वक की गई संरक्षण की व्यवस्था का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। ग्रामीण भारत की कीमत पर व्यवसाय जगत फलेगा-फूलेगा। जो लोग भूमि अधिग्रहण कानून के जरिये सशक्त होने का सपना देख रहे थे, वह सपना एक बार फिर खो गया है, क्योंकि सरकार ने बड़े व्यवसायियों के साथ हाथ मिला लिया है।
-लेखक यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे हैं