छत्तीसगढ़ कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हुआ नक्सली हमला फिर हमारी पूरी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है।
इसे खुफिया तंत्र की एक बड़ी विफलता मानना चाहिए कि वह हजारों की संख्या में हमला करने वाले नक्सलियों के बारे में कोई पूर्व सूचना नहीं दे सका।
नक्सलियों के खिलाफ पूरी व्यवस्था एक तरह से निष्क्रिय है; न तो कोई उसके हृदय-प्रदेश में पहुंचता है और न ही उसके खिलाफ कोई बड़ा ऑपरेशन चल रहा है।
इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि हमारा शासन तंत्र नक्सलियों से निपटने के लिए न तो खुफिया तंत्र तैयार कर पाया है और न ही सुरक्षा बलों में वह क्षमता विकसित कर पाया है कि वे सघन जंगलों में नक्सलियों से डटकर मुकाबला कर सकें।
देश के लगभग 65-70 जिले ऐसे हैं, जहां नक्सली लगातार सक्रिय हैं और वे सरकार की पूरी व्यवस्था को लगातार चुनौती दे रहे हैं।
अब अगले पांच जून को जब मुख्यमंत्रियों की बैठक होगी, तब देखिएगा कि सभी एनसीटीसी के गठन की बात करेंगे। लेकिन क्या दिल्ली में एनसीटीसी का कार्यालय बना देने से भर से बस्तर या झारखंड के जंगलों में फैले नक्सलियों से मुकाबला किया जा सकता है?
उसके लिए तो स्थानीय स्तर पर ही सुरक्षा एवं खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा। शनिवार की ही घटना ले लीजिए। होना तो यह चाहिए था कि 20 से 25 मिनट के भीतर नक्सलियों से मुठभेड़ कर रहे सुरक्षा बलों की मदद के लिए अतिरिक्त जवान पहुंच जाते, लेकिन जब नक्सली चले गए, उसके काफी देर बाद सुरक्षा बल वहां पहुंचे।
जहां तक नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन की बात है, तो पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने जो ऑपरेशन शुरू किया था, वह बुरी तरह विफल रहा था, क्योंकि उस ऑपरेशन में सबसे ज्यादा सुरक्षा बल मारे गए थे। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अब तक के प्रयासों में ठोस रणनीति का अभाव ही दिखा है।
प्रधानमंत्री वर्षों से नक्सलवाद को देश के लिए एक बड़ी चुनौती बता रहे हैं। लेकिन क्या सिर्फ बयान देने भर से कोई चुनौती हल होती है? अगर नक्सलवाद आतंरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है, तो इसके लिए कोई ठोस रणनीति क्यों नहीं बनाई गई? देखा जाए, तो हमारे देश के पूरे राजनीतिक तंत्र में नक्सलवाद को एक समस्या मानकर उसे खत्म करने के प्रति उदासीनता देखी जाती है।
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव के समय नक्सलियों से फायदा उठाते हैं। आंध्र प्रदेश में वर्ष 2004 में कांग्रेस ने, छत्तीसगढ़ में पिछले चुनाव में स्थानीय स्तर पर भाजपा ने और पश्चिम बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने नक्सलियों के साथ समझौता किया था।
इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि हमारे राजनीतिक तंत्र में नक्सलवाद की समस्या से निपटने के प्रति इच्छाशक्ति का अभाव है। जब तक हमारे देश में सुरक्षा तंत्र (पुलिसिंग) को प्रभावी एवं मजबूत नहीं किया जाएगा, जब तक खुफिया तंत्र को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाएगा और जब तक कानून का राज कायम नहीं किया जाएगा, तब तक नक्सलवाद तो क्या, कोई भी जुर्म खत्म नहीं हो सकता।
हर जुर्म के पीछे आर्थिक एवं सामाजिक कारण होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि पहले हम उन आर्थिक-सामाजिक समस्याओं को हल करेंगे, फिर जुर्म खत्म करने के लिए कदम उठाएंगे। शासन का काम है, सुरक्षा एवं न्याय दिलवाना। इसके लिए व्यवस्था के हर अंग में व्यापक बदलाव की जरूरत है, जिसके प्रति इच्छाशक्ति का अभाव दिख रहा है।
मुझे नहीं लगता कि इस हादसे के पीछे कोई राजनीति है, क्योंकि अगर इस घटना से किसी को सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान होगा, तो वह वहां की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा को होगा। जो लोग सुरक्षा व्यवस्था में कमी की बात कर रहे हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए कि इसके खिलाफ कांग्रेसी नेताओं ने पहले आवाज क्यों नहीं उठाई।