संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की एक के बाद एक नाकामियों और गलत फैसलों की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हो गई है। जहां बारहवीं योजना के लिए दस फीसदी की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर के लक्ष्य की बातें हो रही थीं, वहीं अब पांच फीसदी की विकास दर के लाले पड़ गए हैं। बात यहां तक ही नहीं रुकी, बल्कि लगातार गिरावट के नए पायदान छू रहा रुपया 2013 और 1991 के बीच की तुलना का आधार बनने लगा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 65 रुपये के स्तर को पार करने के साथ ही ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले सौ रुपये को पार कर गया।
मौजूदा हालात एक साल या एक माह में नहीं बने, बल्कि सरकार के पिछले पांच साल के फैसलों और नीतिगत जड़ता ने देश को इस हाल में पहुंचाया है। इसमें कॉरपोरेट जगत भी बराबर का भागीदार है, जो सरकार पर नीतिगत जड़ता का आरोप तो लगाता रहा है, लेकिन प्रतिस्पर्धी माहौल को ध्वस्त कर घोटालों के जरिये सरकारी एजेंसियों से फायदा लेने में लगातार आगे रहा है।
असल में सरकार को वास्तविकता स्वीकार करने में शर्म महसूस हो रही है और यही वजह है कि अर्थव्यवस्था की कमजोर घरेलू स्थिति को स्वीकार करने के बजाय सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस के नेता बाह्य कारकों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
सच्चाई यह है कि औद्योगिक उत्पादन लगातार दो माह ऋणात्मक रहा है। सेवा क्षेत्र की विकास दर भी कमजोर है। मानसून की मेहरबानी और किसानों की मेहनत के चलते कृषि उत्पादन जरूर बेहतर बना रहा है और चालू साल में इसके अच्छा रहने की उम्मीद है। मगर सरकार की कमजोरी और गलत नीतियों के चलते रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद खाद्य महंगाई दर दो अंकों में बनी हुई है।
चालू खाता घाटा रिकॉर्ड स्तर 4.8 फीसदी पर है, क्योंकि हमारे निर्यात नहीं बढ़ रहे हैं, जबकि आयात बेलगाम हैं। पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर हमारा कोई बस नहीं है, लेकिन सोना आयात जब 60 अरब डॉलर पर पहुंच गया, तो सरकार को सुध आई कि चालू खाता घाटे का एक तिहाई हिस्सा इसी के चलते है।
पिछले वित्त वर्ष के अंतिम महीनों में सरकार ने सोना आयात पर अंकुश का सिलसिला शुरू किया, जबकि इसके पहले निजी और सरकारी बैंकों के साथ ही पोस्ट ऑफिस तक लोगों को सोने के सिक्के बेचकर कारोबार बढ़ा रहे थे। लेकिन अब इतनी सख्ती की गई कि सोने में स्मगलिंग फायदे का सौदा बन गई है, क्योंकि हमारे देश में सोने के मोह को कोई रोक नहीं सकता है।
सरकार की नजर 2014 के चुनाव पर है। इसलिए सरकारी खर्च को बेतहाशा बढ़ाया गया, लेकिन राजस्व बढ़ाने पर उतना काम नहीं हुआ, नतीजतन राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। करीब साल भर पहले सरकार ने नीतिगत जड़ता तोड़ने की पहल की और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से जुड़े कई फैसले किए। साल बीत गया, अभी तक एक पैसा भी एफडीआई इसमें नहीं आया, उल्टे तमाम विवाद खड़े हो गए। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी कर सब्सिडी घटाने का फैसला हुआ और उस पर अमल भी शुरू हुआ, लेकिन कमजोर होते रुपये ने इस पर पानी फेर दिया।
महंगाई रोकने के लिए रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी की शुरुआत करा दी है, जबकि उद्योग लगातार ब्याज दरों में कमी की वकालत करता रहा है, उसके सुर में वित्त मंत्री का सुर भी मिलता रहा है, लेकिन रिजर्व बैंक गर्वनर ने इसको अनसुना कर दिया। अब वित्त मंत्री की मर्जी के नए गर्वनर रघुराम राजन कामकाज संभालने जा रहे हैं, देखना होगा कि उनकी पी. चिदंबरम से कितनी ट्यूनिंग बैठती है।
जहां तक नीतिगत जड़ता की बात है, तो उसके पीछे कॉरपोरेट जगत भी एक बड़ा कारण रहा है। जिस तरह गलत रास्ते अख्तियार कर टेलीकॉम लाइसेंस से लेकर कोल ब्लॉक तक हथियाए गए, उनके लिए कॉरपोरेट जगत भी कम जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के बजाय उसने देश के बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे से कारोबार बढ़ाने की रणनीति अपनाई। तमाम घोटाले सामने आने पर सरकार ने फैसले लेना ही बंद कर दिया था।
वहीं सरकार की लगातार कोशिश रही है कि कारोबारी गतिविधियों से खुद को बाहर रखे। पूंजीवादी नीतियों के हिसाब से यह सही लगता है, लेकिन इसका नतीजा सही नहीं रहा, क्योंकि निजी क्षेत्र बाजार में लगातार विफल होता रहा है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) का एक मॉडल योजना आयोग ने पेश किया और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह इसके बड़े हिमायती रहे, ताकि ढांचागत क्षेत्र में अरबों डॉलर के जरूरी निवेश में निजी क्षेत्र भागीदारी कर सके। लेकिन दिल्ली में एयरपोर्ट मेट्रो और दिल्ली एयरपोर्ट जैसे नाकाम उदाहरण हमारे सामने हैं।
वहीं क्रेडिट सुईस की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश के दस शीर्ष कॉरपोरेट समूहों पर छह लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज है। इसमें एक बड़ा हिस्सा विदेशी कर्ज है और जिस तरह से रुपया गिर रहा है, उसके चलते इनकी दिक्कत बढ़ने जा रहा है।
मौजूदा आर्थिक हालात को करीब से देखें, तो साफ होता है कि जिसका भरोसा किया, उसी ने डुबोया। सरकार के पास एक ही उपाय है कि सार्वजनिक उपक्रमों और अपने संसाधनों के उत्पादक इस्तेमाल के जरिये निवेश के पहिये को आगे बढ़ाए। इसके जरिये ही देश में निवेश और अर्थव्यवस्था में भरोसा लौटेगा, जो विदेशी मुद्रा के देश से प्रवाह को रोक सकेगा और देश में कारोबारी गतिविधियों को तेज कर रोजगार के अवसर पैदा करेगा।