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जलवायु संकट: जरूरी हैं पर्यावरणीय मूल्य, सम्मान देकर ही हासिल होगी प्राकृतिक संपदा

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 19 Nov 2023 06:06 AM IST

सार

जलवायु संकट से निपटने के लिए परंपरागत अर्थों में धार्मिक होना बेशक जरूरी न हो, लेकिन यह जरूर  समझना चाहिए कि प्रकृति केवल उपभोग की वस्तु नहीं है। इसे भी सम्मान की जरूरत है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


किताब का नाम है : मैन एंड नेचर : द स्पिरिचुअल क्राइसिस ऑफ मॉडर्न मैन, जिसे उस वक्त तेहरान विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर रहे सैय्यद हुसैन नस्र ने लिखा था। अब नब्बे वर्ष के हो चुके नस्र ने एक असामान्य, दिलचस्प और बेहद उत्पादक जिंदगी जी। ईरान में विद्वानों व लेखकों के एक परिवार में जन्मे नस्र ने 1958 में अपने वतन लौटने पहले मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और हार्वर्ड में शिक्षा प्राप्त की। पश्चिम से मिल रहे बेहतरीन नौकरियों के कई प्रस्तावों को ठुकराते हुए उन्होंने तेहरान में पढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करने का फैसला किया। वह फ्रेंच और अरबी भाषाओं में लिखते रहे हैं।


हालांकि, 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उन्हें अपनी मातृभूमि छोड़कर भागना पड़ा, क्योंकि अयातुल्ला खुमैनी के ईरान में स्वतंत्र विचारों के लिए कोई जगह नहीं थी। उसके बाद से नस्र अमेरिका के विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के साथ बौद्धिक इतिहास और तुलनात्मक धर्म के क्षेत्र में लिखना व प्रकाशित होना जारी रखा है। अपनी पुस्तक मैन एंड नेचर की शुरुआत में नस्र टिप्पणी करते हैं कि पश्चिम में पर्यावरण के दुरुपयोग को लेकर जागरूकता बढ़ रही थी। वहां लोग प्रकृति पर विजय पाने के विचार से मनुष्य और प्रकृति में पैदा हुए असंतुलन से उपजी समस्याओं को दूर करना चाहते थे। वह लिखते हैं कि कुछ लोग सच्चाई का सामना करना चाहते हैं कि समाज में शांति के लिए जरूरी है कि प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता युद्ध और आक्रामकता पर आधारित न हो। इस पुस्तक में नस्र ने भले ही पश्चिम और खासकर अमेरिका को संबोधित किया हो, लेकिन विकास की नीतियों में इन्हीं देशों के नक्शे-कदम पर चल रहे भारत और चीन के लिए भी इसमें लिखी बातें महत्वपूर्ण हैं।


प्रोफेसर नस्र का तर्क है कि समस्या की जड़ आधुनिक मनुष्य के विचारों में है, जिसके तहत वह खुद को प्रकृति पर पूर्ण अधिकार, मनचाहे उपयोग या दुरुपयोग और उसे अपने अधीन मानने की सर्वोच्च शक्ति देता है। प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने के इसी विचार का नतीजा आज बढ़ती आबादी, शहरी भीड़भाड़, प्राकृतिक संसाधनों की कमी, मशीनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण का नाश और मानसिक बीमारियों में बेतहाशा वृद्धि के रूप में दिखता है। प्रोफेसर नस्र कहते हैं, 'प्रकृति पर प्रभुत्व और उसे एक भौतिक इकाई मानने की भावना आधुनिक मनुष्य में घर कर गई है। जब यह भावना मनुष्य के लालच व वासना से जुड़ती है, तो पर्यावरण पर दबाव ज्यादा बढ़ जाता है। चीजों के उपभोग की एक सीमा होती है। लेकिन उन्हें बगैर किसी सीमा के अनंत संभावनाओं वाला समझने की सोच सबसे पहले अमेरिका में फैली।'


प्रोफेसर नस्र कहते हैं, 'मनुष्य की असीमित शक्ति और संभावनाओं को लेकर फैली इस गलत सोच को विकास अर्थशास्त्र ने भी बढ़ावा दिया, जिसमें मनुष्य को पूरी तरह से भौतिक जरूरतों वाला प्राणी माना गया है।' आधुनिक विज्ञान और अर्थशास्त्र ने मनुष्य को आध्यात्मिक व नैतिक संयम से दूर कर दिया है। इसी वजह से मनुष्य प्रकृति को उपभोग की वस्तु मानते हुए, उसके प्रति किसी तरह की जिम्मेदारी महसूस नहीं करता। इसीलिए प्रोफेसर नस्र कहते हैं कि मनुष्य को प्रकृति को पवित्र मानते हुए उसके साथ रहना सीखना होगा और इसके लिए एक नए तरह के विश्वास और अभ्यास की जरूरत होगी।


इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा तेहरान छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के बाद प्रोफेसर नस्र ने अमेरिका में खुद को नए सिरे से स्थापित किया। 1996 में उनकी लिखी पुस्तक रिलिजन एंड द ऑर्डर ऑफ नेचर में तर्क दिया गया कि आधुनिक पश्चिम में धर्मनिरपेक्ष मानवतावाद और सांसारिक मनुष्य के अधिकतम उपभोग के विचारों का मनुष्य और प्रकृति के इतिहासों पर गंभीर असर दिखा। प्रोफेसर नस्र की यह किताब यह आकलन प्रस्तुत करती है कि विभिन्न धार्मिक परंपराएं जलवायु संकट को हल करने में क्या योगदान दे सकती हैं। नस्र ने 'एक ऐसी स्थिति की उम्मीद करते हुए लिखा, जिसमें दुनिया भर के धर्म एक-दूसरे को समृद्ध कर सकें और प्रकृति की पवित्रता के साझा दृष्टिकोण के आधार पर पृथ्वी पर लगे घावों को भरने में सहयोग भी कर सकें।'


यह नजरिया आज के तकनीकी मनुष्य की धारणाओं के विपरीत है, जो मानते हैं कि जलवायु संकट को सौर, हाइड्रोजन और पवन जैसे नए ऊर्जा स्रोतों, इलेक्ट्रिक कारों, कार्बन कैप्चर और भू-इंजीनियरिंग द्वारा हल किया जा सकता है। हाल ही में तकनीकी क्षेत्र के कुछ शीर्ष अरबपतियों द्वारा समर्थित पुस्तक क्लाइमेट कैपिटलिज्म में ऐसे नवाचारों की बात की गई है, जो 'दुनिया की प्रमुख आर्थिक प्रणाली (अर्थात, पूंजीवाद) के भीतर ही विकास की गति को कम किए बगैर जलवायु समस्याओं का समाधान दे सकते हैं।'
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हालांकि प्रोफेसर नस्र जलवायु संकट के पीछे की प्रमुख वजह खराब तकनीकों को नहीं, बल्कि खराब विचारों को बताते हैं। जो अरबपति हैं, वे अपने निजी विमानों, निजी जहाजों और कई महाद्वीपों में स्थित अपने तमाम घरों की सुविधा के साथ जलवायु संकट का हल खोजना चाहते हैं। दूसरी ओर, एक ही धर्म कुछ लोगों को धैर्य और सहिष्णुता सिखाता है, वहीं दूसरे लोग उसी धर्म की व्याख्या हिंसा व युद्ध को फैलाने के लिए कर रहे हैं। आध्यात्मिक बदलाव का प्रोफेसर नस्र का आह्वान काबिले तारीफ है, हालांकि, परंपरागत तौर पर धार्मिक हुए बगैर भी प्रकृति के प्रति सम्मान और संसाधनों के उपयोग में संयम का विकास किया जा सकता है। दरअसल, जलवायु संकट से निपटने के लिए संस्थागत बदलाव जरूरी हैं। इसके अलावा, एक विकेंद्रीकृत, ज्यादा पारदर्शी व लोकतांत्रिक शासन भी समय की मांग है। ऐसी राजनीतिक व्यवस्था, जिसमें कोयला व पेट्रोकैमिकल क्षेत्र के दिग्गज यह निर्धारित करें कि चुनाव कैसे लड़े और जीते जाएंगे, सत्तारूढ़ दल को किन नीतियों को आगे बढ़ाना चाहिए, मीडिया को क्या रिपोर्ट करना चाहिए, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों के बिल्कुल विपरीत है।

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