दुनिया भर में 16 जून घरेलू कामगार दिवस के रूप में मनाया जाता है। जो औरतें दूसरों के घरों में काम करती हैं, वे शायद ही अपने इस काम की खुशी मनाती होंगी। उनसे काम लेने वाली महिलाएं भी खुशी कम मनाती हैं, शिकायतें ज्यादा करती है। ‘देर से आती है’, ‘काम कम करती है, चाय ज्यादा पीती है’, ‘जब जी चाहता है, छुट्टी कर लेती है’ जैसी बातें ही इन महिलाओं से सुनने को मिलती हैं।
काम करने वाली महिलाओं को शायद ही पता हो कि साल का एक दिन उनके काम नाम कर दिया गया है। दरअसल यह दिन दूसरों के घरों में काम करने वाली इन महिलाओं के अधिकारों की याद दिलाने के लिए तय किया गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने इस काम में लगी महिलाओं के लिए बहुत सारे अधिकार तय किए हैं। हमारी सरकार ने इसके अनुरूप कुछ कानून भी बनाए हैं। पर देश की परिस्थितियां इस तरह की है कि इनको लागू करने का काम कहीं दिखाई नहीं देता।
काम करने वाली और काम लेने , दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं। अच्छी तनख्वाह पाने वाली, बड़े पदों पर बैठी, अभिनेत्रियां, शिक्षिकाएं, डॉक्टर, वकील-सबको नाज है कि अपनी प्रतिभा, मेहनत और काबिलियत के कारण ही वे शिखर पर हैं। पर वे भूल जाती हैं कि उनके वहां बने रहने में कामवालियों का कितना योगदान है। इसका पता तब चलता है, जब कामवाली काम पर नहीं आती। इस निर्भरता का नतीजा तो यह होना चाहिए कि कामवाली के श्रम का सम्मान हो। चूंकि दोनों एक दूसरे की पूरक हैं, अतः दोनों को एक दूसरे के बराबर होने का एहसास होना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है।
हमारे समाज में शारीरिक श्रम करने वालों की अवहेलना की जाती है। कामवाली गरीब भी होती हैं और सामजिक रूप से उपेक्षित भी।जबकि वह बच्चे खिलाती हैं, कप-प्लेट धोती हैं, कपड़े साफ करती हैं, पोछा लगाती है। उसे मजदूरी भी कम मिलती है और बहुत सारे घरों में यह मजदूरी पाने के लिए भी उसे जद्दोजहद करनी पड़ती है। चोरी का इल्जाम उस पर बहुत जल्दी लग जाता है, अक्सर मजदूरी मांगने पर भी लग जाता है।
कुछ दिन पहले ग्रेटर नोएडा के एक आलीशान कॉम्प्लेक्स में भारी बवाल मचा। एक कामवाली काम के बाद घर नहीं लौटी। उसका पति रात में उसका पता लगाने गया, तो मालकिन ने बता दिया कि वह तो चली गई। दूसरे दिन तड़के जब उस बिल्डिंग के सामने भीड़ जमा हो गई, तो सिक्युरिटी गार्ड उस औरत को बेहोशी की हालत में उठाकर बाहर ले आए। उसे देख लोग उत्तेजित हो गए और उन्होंने मालकिन के फ्लैट में घुसकर तोड़फोड़ की। कामवाली का कहना है कि उसे दो महीने से तन्ख्वाह नहीं मिली, मांगने पर उसे बुरी तरह मारा गया। मालकिन का कहना है कि कामवाली ने चोरी की। उसने चोरी की, तो पुलिस के हवाले क्यों नहीं किया?
फिर कहा गया कि कामवाली मुस्लिम है, बांग्लादेशी है। पुलिस के वरिष्ठ अधीक्षक ने बयान दिया कि वह बांग्लादेशी नहीं है और मामले की जांच होगी।
फिर सब कुछ बदल गया। मालिक-मालकिन से मिलने केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा पहुंचे। उन्होंने कहा कि वह उनकी पूरी मदद करेंगे।
कुछ ही घंटों में कामवालियों की झुग्गियों से कुछ पुरुषों को पकड़कर जेल भेज दिया गया। उनके खिलाफ मुकदमे ठोक दिए गए।
दूसरे दिन तमाम झुग्गियां तहस-नहस कर दी गईं। उन झुग्गियों में रहने वाले लोगों ने ही वह बिल्डिंग बनाई थी, जिनमे बसने वालों ने इन मजदूरों का बसेरा बर्बाद कर दिया।
यह सब 'कामगार दिवस’ के कुछ ही दिन बाद हुआ।