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मंत्रिमंडल में बदलाव के बहाने

Tue, 05 Jul 2016 12:56 PM IST
नीरजा चौधरी
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नीरजा चौधरी
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कुछ घंटे बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में होने वाले फेरबदल के बारे में किसी तरह की अटकल लगाना मूर्खता ही है कि किन्हें मंत्री बनाया जाएगा, और किन्हें बाहर किया जाएगा। देश के जोड़ी नंबर वन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और संभवतः अरुण जेटली को छोड़कर कोई नहीं जानता कि किन नए चेहरे को मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा और किनकी विदाई होगी। हालांकि कई लोगों का मानना है कि हाल के कथित ‘स्वामी प्रकरण’ के बाद अरुण जेटली की वैसी स्थिति नहीं रह गई है, जो पहले कभी हुआ करती थी।
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एक समय था, जब मंत्रिमंडल में फेरबदल की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती थी और सरकार में शामिल कई लोगों को अच्छी तरह से पता होता था कि क्या कुछ पक रहा है। जिन मंत्रियों को दिल्ली में रुकने के लिए कहा जाता था, उनके हाव-भाव से पता चल जाता था। पीवी नरसिंह राव के 1991-96 के कार्यकाल में अक्सर सूचनाएं बाहर आती थीं और अखबार बदलावों का सटीक वर्णन करते थे। पर आज ऐसा नहीं है, अब सूचनाओं पर बेहद सख्ती से अंकुश लगाया जाता है। और न मंत्रियों और न ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को इस बात का पता होता है कि क्या होने जा रहा है। इन सबके बावजूद मीडिया 'अंदरूनी सूत्रों' से खबरें जुटाता है। लेकिन आज के समय में 'अंदरूनी सूत्र' बहुत कम हैं।

प्रधानमंत्री मोदी को मंत्रिमंडल में फेरबदल के लिए यह बहुत ही अनुकूल समय लगता है। वह दो वर्षों से सरकार में हैं और उन्हें पार्टी के अंदरूनी परिणामों की बहुत ज्यादा चिंता किए बगैर निकम्मे लोगों को हिलाने की जरूरत है। वर्ष 2015 में लोकप्रियता में आई गिरावट के बाद आसानी से असम में जीत और केरल तथा पश्चिम बंगाल में पार्टी का प्रभाव बढ़ने से एक बार फिर वह पूरे आत्मविश्वास में हैं। अब वह फिर से बड़े फायदे के लिए जोर लगाने की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की मजबूरियां सरकार और राजनीति, दोनों स्तरों पर हैं। उन्हें अपनी सरकार में नई चमक और ऊर्जा की जरूरत है, क्योंकि उनका मंत्रिमंडल अपने कार्यकाल का आधा सफर पूरा कर चुका है, जिसके बाद सामान्य तौर पर किसी भी सरकार के ढलान का सफर शुरू होता है।
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अब चूंकि वह दिल्ली और दिल्ली दरबार के तरीके से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं, इसलिए अब अपने प्रति पूरी तरह वफादार लोगों की टीम तैयार कर सकते हैं और 2019 के संसदीय चुनाव को ध्यान में रखते हुए इसके लिए राज्य मंत्री के रूप में वैसे लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल कर उन्हें तैयार कर सकते हैं। उन्होंने पहले ही संकेत दे दिया है कि 75 वर्ष से ऊपर के लोगों के लिए उनके मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं है। इसलिए अटकलें लगाई जा रही हैं कि कुछ वरिष्ठ मंत्रियों को राज्यपाल बनाया जा सकता है।
अर्थव्यवस्था उनके लिए एक बड़ी चुनौती बनने जा रही है। पिछले दो वर्षों में उन्होंने निवेश को आकर्षित करने के लिए दुनिया के कई देशों की यात्राएं की हैं। सरकार ने रक्षा जैसे कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोला है। अब उम्मीद है कि संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस के सहयोगी जदयू समेत कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों के सहयोग से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पारित हो जाएगा।

नरेंद्र मोदी के लिए जीएसटी अब सिर्फ कर सुधार नहीं है। यह वायदा पूरा करने की प्रधानमंत्री की क्षमता भी दर्शाएगा और वैश्विक समुदाय तथा संभावित निवेशकों को एक संकेत देगा। मौजूदा संदर्भ में जीएसटी का पारित होना मोदी की टोपी में कलगी लगने जैसा होगा।

फिर प्रधानमंत्री को अर्थव्यवस्था से जुड़े मंत्रालयों में दौड़ने वाले घोड़ों की जरूरत होगी। इसलिए वह उन मंत्रियों को प्रोन्नत कर सकते हैं, जिन्होंने अच्छा काम किया है। कृषि मंत्रालय मोदी की योजनाओं के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। यह ऐसा मंत्रालय है, जो किसानों के कल्याण और मोदी द्वारा शुरू किए गए कार्यक्रमों से जुड़ा है। इसलिए आश्चर्य नहीं, अगर इसमें किसी नए मंत्री को लाया जाए।

75 वर्ष से अधिक के मंत्रियों को बाहर करने की प्रतिबद्धता के बावजूद उत्तर प्रदेश में यह फैसला शायद ही लागू किया जाए, क्योंकि वह चुनाव सभी लड़ाइयों की जननी है। भाजपा ब्राह्मणों का समर्थन बनाए रखना चाहेगी, खासकर तब, जब मायावती की स्थिति में सुधार दिख रहा है। इसलिए भाजपा की कोशिश न सिर्फ वहां एकजुट होकर अपना जनाधार बनाए रखने की होगी, बल्कि वह भाजपा को वोट न देने वाले मतदाताओं के बीच भी अपनी पैठ बनाने की कोशिश करेगी। इसी वजह से मोदी के मंत्रालय में उत्तर प्रदेश व्यापक प्रतिनिधित्व वाला राज्य बनने जा रहा है, जबकि पहले से ही राज्य के कई सांसद मंत्रिमंडल में शामिल हैं।

निस्संदेह अमित शाह चाहेंगे कि मोदी का मंत्रालय ऐसा हो, जिसमें विभिन्न वर्गों के हितों को प्रतिनिधित्व मिले, जिसने 2014 में उत्तर प्रदेश में पार्टी को भारी विजय दिलाई थी, यानी जाति, समुदाय एवं विकास का समन्वय। इसलिए उन्होंने सूबे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में केशव प्रसाद मौर्य को चुना; जो कुशवाहा जाति से हैं, ताकि अति पिछड़ों का पार्टी को समर्थन मिले। अपने मंत्रिमंडल में उत्तर प्रदेश से एक दलित को शामिल कर प्रधानमंत्री भी दलितों को एक संदेश दे सकते हैं, जिन्होंने 2014 में भारी संख्या में उन्हें वोट दिया था, और जो विधानसभा चुनाव में मायावती की तरफ रुख कर सकते हैं। विकास की बात करते हुए भाजपा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अपने हिंदुत्व एजेंडे को भी आगे बढ़ाना चाहेगी।

मंत्रिमंडल विस्तार में कई मुद्दों को एक साथ ध्यान में रखा जाएगा, जो नरेंद्र मोदी की चिंताओं, प्राथमिकताओं का संकेत देगा और यह भी कि वह उसे किस तरह से हासिल करने की योजना बना रहे हैं। यह फेरबदल इस बात का संकेत देगा कि सत्ता में आने के दो साल बाद प्रधानमंत्री कैबिनेट पर अपनी छाप छोड़ने में सफल हैं या नहीं, और कौन-कौन से वायदे हैं, जो उन्हें पूरे करने हैं। यह बदलाव अपने सहयोगियों, चाहे वह दूसरी पार्टियां हों या संघ, को खुश करने का अवसर भी होगा।
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