भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में 2019-20 की अपनी वार्षिक रिपोर्ट, और अपने वार्षिक खाते जारी किए हैं। इसे पढ़ना दिलचस्प है। हमेशा की तरह रिजर्व बैंक ने लाभांश के रूप में 57,132 करोड़ रुपये का अधिशेष सरकार को हस्तांतरित कर दिया। पिछले साल, रिजर्व बैंक ने 1.76 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित किए थे, जिसमें पिछला अधिशेष 52,618 करोड़ रुपये शामिल था। इस वर्ष के हस्तांतरण से आकस्मिक कोष (कंटिजेंसी रिजर्व) के लिए 73,615 करोड़ रुपये हस्तांतरित हुए हैं। तुलनात्मक आधार पर देखें, तो 2018-19 में आरक्षित कोष से वापस लिए बिना अधिशेष 1.23 लाख रुपये था, जबकि वर्ष 2019-20 में आकस्मिक कोष में हस्तांतरण से पहले अधिशेष 1.31 लाख करोड़ रुपये था। इसका मतलब है कि एक अभूतपूर्व आर्थिक गिरावट के बीच सरकार को हस्तांतरण वास्तव में इस वर्ष कम हो गया है, क्योंकि बढ़ते अधिशेष के बावजूद आकस्मिक कोष में बड़े पैमाने पर हस्तांतरण हुआ है।
क्या रिजर्व बैंक को इतना आकस्मिक कोष रखना चाहिए, इस बात की चर्चा पहले बिमल जालान समिति द्वारा की गई थी, जिसने रिजर्व बैंक के अधिशेषों के बारे में सिफारिशें की थीं। उसने बैलेंस शीट का 5.5-6.5 फीसदी आकस्मिक कोष और 20.8-25.4 फीसदी आर्थिक कोष रखने की सिफारिश की थी, जिसमें भारतीय रिज़र्व बैंक के सोने, विदेशी मुद्रा, विदेशी प्रतिभूतियां और भारत सरकार की प्रतिभूतियां का पुनर्मूल्यन कोष (रीवैल्यूएशन रिजर्व) शामिल है।
30 जून 2020 तक, रिजर्व बैंक के पास कुल 11.25 लाख करोड़ रुपये का पुनर्मूल्यन कोष था, जिनमें से 9.77 लाख करोड़ रुपये उसके सोने और विदेशी मुद्रा होल्डिंग्स से निकले, विदेशी प्रतिभूतियों से 53,800 करोड़ रुपये और रुपये की प्रतिभूतियों से 93,400 करोड़ रुपये। इसके अलावा आकस्मिक कोष बढ़कर 2.64 लाख करोड़ रुपये हो गया। यानी बैलेंस शीट में 26 फीसदी का इजाफा हुआ! अब सवाल यह है कि क्या रिजर्व बैंक को इतना भारी कोष - बैलेंस शीट के 26 फीसदी तक रखना चाहिए, जिसमें 2.64 लाख करोड़ रुपये का नकद भंडार भी शामिल है, जो कुल संपत्ति का लगभग पांच फीसदी है?
ध्यान देने वाली बात यह है कि रिजर्व बैंक अपने आकस्मिक कोष की गणना अपनी विदेशी मुद्रा, स्वर्ण, विदेशी प्रतिभूतियों और भारतीय प्रतिभूतियों की संपत्ति के बाजार मूल्य के आधार पर करता है। उसके मुताबिक, इन परिसंपत्तियों का मूल्य और बाजार जोखिम है, इसलिए, विशाल कोष की आवश्यकता है। महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि क्या आकस्मिक कोष संपत्ति के बाजार मूल्य पर आधारित होना चाहिए, जहां पुनर्मूल्यन अधिशेष को आवंटित नहीं किया जाता है, बल्कि बैलेंस शीट में आरक्षित रखा जाता है?
मूल्य में उतार-चढ़ाव के कारण बाजार या मूल्य जोखिम हमेशा परिसंपत्ति की लागत, शुद्ध पुनर्मूल्यन रिजर्व के आधार पर गणना की जाती है। यदि सोने की कीमत गिरे या रुपये के मूल्य में बढ़ोतरी हो, या भारत सरकार के बांडों के मूल्य में गिरावट आए, तो मूल्य में कमी को पहले पुनर्मूल्यन कोष के आधार पर तय किया जाएगा, और उसके बाद ही एक आकस्मिक रिजर्व की आवश्यकता लागू होगी। इन परिसंपत्तियों का पुनर्मूल्यन कोष 22.6 फीसदी है, जो एक उच्च आंकड़ा है।
इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, इन परिसंपत्तियों की लागत पर आकस्मिक कोष की गणना करना उचित है, जो बाजार मूल्य की तुलना में बाजार या मूल्य जोखिमों से ग्रस्त हैं। यदि 38.48 लाख करोड़ रुपये की लागत पर गणना की जाती है, तो 2.64 लाख करोड़ रुपये के आकस्मिक भंडार, जिसमें चालू वर्ष का अंतरण 73,615 करोड़ रुपये शामिल है, इन परिसंपत्तियों की लागत 6.87 फीसदी पर होगी। आकस्मिक रिजर्व के साथ-साथ रिजर्व बैंक के पास कुल संपत्ति का 26 फीसदी कुल आर्थिक भंडार है, जो अविश्वसनीय रूप से उच्च राशि है, जिसके कारण यह दुनिया के सभी केंद्रीय बैंकों के सबसे बड़े भंडार में शुमार है।
स्पष्ट है कि रिजर्व बैंक असाधारण रूप से रूढ़िवादी है और नकदी भंडार की जरूरत से ज्यादा मुनाफे का हस्तांतरण कर रहा है। यदि अधिशेष के 73.615 करोड़ रुपये सरकार को हस्तांतरित कर दिए जाते, जो कि रिजर्व बैंक का संप्रभु और वैधानिक स्वामी है, तो कोविड-19 के चलते भारी आर्थिक संकट से गुजरते भारत को इससे मदद मिलती। वर्तमान हस्तांतरण के बिना नकद भंडार तब इन परिसंपत्तियों की लागत का लगभग पांच फीसदी होगा, जो किसी भी जोखिम को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा।
बिमल जालान समिति ने भी परिसंपत्ति की लागत, शुद्ध पुनर्मूल्यन कोष पर आकस्मिक कोष होने के इस पहलू पर विचार नहीं किया और इस उद्देश्य के लिए परिसंपत्तियों का बाजार मूल्य लिया।
यह कार्यप्रणाली एक असामान्य स्थिति की ओर ले जाती है, जहां अगर सोने, विदेशी मुद्रा और विदेशी प्रतिभूतियों की कीमतों में वृद्धि होती है या रुपये में और गिरावट आती है, तो रिजर्व बैंक को अपने मुनाफे से और अधिक राशि आकस्मिक कोष में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, क्योंकि लागत की तुलना में बाजार मूल्य पर आकस्मिक कोष की गणना की जाती है, जबकि पुनर्मूल्यन कोष में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
भारत इस समय अप्रत्याशित वित्तीय संकट से जूझ रहा है। यह रिजर्व बैंक की गड़बड़ी को बताता है कि उसने इस संकट के समय सरकार को हस्तांतरित करने के बजाय पहले से ही समृद्ध आकस्मिक कोष में इतनी अधिक मात्रा में धन हस्तांतरित करना जरूरी समझा। इस समय आकस्मिक कोष में बड़े पैमाने पर धन का हस्तांतरण अनावश्यक है, और भारतीय नागरिकों की आवश्यकताओं के प्रति असंवेदनशीलता है। सरकार ने अपने अधिकार के तहत ठीक ही मांग की है लाभांश के रूप में 73,625 करोड़ रुपये सामान्य राजस्व में स्थानांतरित किए जाएं। बिमल जालान समिति ने यह भी कहा था कि रिजर्व बैंक संकट के दुर्लभ क्षणों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च मात्रा में कोष रखता है। आज की अभूतपूर्व वैश्विक महामारी निश्चित रूप से उसके योग्य है।
(मोहनदास पई एरिन कैपिटल पार्टनर के चेयरमैन एवं निशा होला सी-कैंप की टेक्नोलॉजी फेलो हैं।)