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रिजर्व बैंक और सरकारः विक्रम और बेताल

शंकर अय्यर
Updated Wed, 21 Nov 2018 07:03 PM IST
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रिजर्व बैंक बनाम सरकार
सोमवार देर शाम आठ बजे टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में शोर मच गया कि, रिजर्व बैंक झुक गया। मानो किसी सूबेदारी में हुई बगावत को कुचल दिया गया हो। एक संस्थान बनाम भारत सरकार का यह कथानक राज्य की दशा को बयान करता है। सवाल वित्तीय व्यवस्था और सार्वजनिक धन के जोखिम का है। रिजर्व बैंक निदेशक मंडल की बैठक के बाद घोषित जीत का मतलब संवाद कायम होने और मुद्दों की जांच के लिए समितियों के गठन से है। अलबत्ता रिजर्व बैंक के निदेशक मंडल ने संकटग्रस्त एमएसएमई के पुनर्गठन के लिए 25 करोड़ रुपये के कर्ज और नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) को नौ फीसदी रखने का फैसला कर मामूली राहत दी है। 


भारतीय रिजर्व बैंक में जारी लड़ाई और अधिक संसाधन की जरूरत को लेकर है। आम तौर पर राजनीतिक दिलचस्पी इस बात पर होती है कि धन को कहां खर्च करने की जरूरत है, जबकि यह कहां खर्च हो गया, इस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया जाता। रोनाल्ड रीगन ने एक बार कहा था कि सरकारों को हमेशा पैसों की जरूरत होती है। हकीकत में हाल के वर्षों में सरकारों ने हमेशा कोई न कोई ऐसी जरूरत तलाशी हैं, जिसके लिए उनके पास धन नहीं होता। पिछली सरकारों की तरह यह सरकार भी अतिरिक्त धन प्राप्त करने की कोशिश कर रही है।


आरक्षित कोष तक पहुंच बनाने के लिए और रिजर्व बैंक को अपने निर्देश के अनुपालन को राजी करने के लिए सरकार ने आरबीआई एेक्ट के कभी न इस्तेमाल किए गए अनुच्छेद सात को लागू करने की धमकी दी थी। सरकार रिजर्व बैंक के पास जमा अतिरिक्त आरक्षित कोष का हिस्सा चाहती है। रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और के एस विश्वनाथन ने सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध करते हुए इसे स्वायत्तता पर हमला करार दिया था। मंत्रालय के अधिकारियों ने यह आंकड़ा 3.6 लाख करोड़ रुपये के करीब बताया था। सार्वजनिक तौर पर टकराव के उजागर होने के दो दिन बाद सरकार ने इससे इनकार किया। इस इनकार की व्याख्या पुष्टि के तौर पर की गई। 


सबसे पहले हम स्वायत्तता के सिद्धांत पर गौर करते हैं। रिजर्व बैंक के पास सरकार द्वारा तय की गई नीतियों को लेकर कामकाजी स्वायत्तता है। रिजर्व बैंक को संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र सरकार के अधीन रखा गया है। आरबीआई एेक्ट का अनुच्छेद सात सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने और बोर्ड के दैनंदिन कामकाज को अपने हाथ में लेने का अधिकार देता है। अभी तक नहीं पूछा गया और अप्रिय सवाल यही है कि क्या 8 नवंबर, 2016 को रिजर्व बैंक स्वायत्त था! 


दिलचस्प है कि तीन लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा नोटबंदी के बाद से चर्चा में था, मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि रद्द किए गए नोटों के कारण चार से पांच लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आएंगे और इस बात की अटकल थी कि यह धन सरकार के खजाने में रिजर्व बैंक के लाभांश के रूप में जमा होगा। 99.9 फीसदी नोटों के वापस आ जाने से ऐसा नहीं हो सका। दूसरा गुब्बारा जीएसटी लागू होने के बाद राजस्व को होने वाली बढ़ोतरी से जुड़ा था, मगर दुखद है कि संग्रह अब भी लक्ष्य से कम है।


बहस इस बात पर है कि आखिर सरकार को 3.6 लाख करोड़ रुपये क्यों चाहिए? दो बातें चर्चा में हैं। पहली बात, पांच राज्यों के चुनावों के बाद अंतरिम बजट में नई चुनावी घोषणाओं के लिए इसकी जरूरत है। दूसरी बात वित्तीय क्षेत्र के संकट से जुड़ी है और कहा जा रहा है कि वित्तीय कमी पूरी करने के लिए इसकी जरूरत है। चुनावी घोषणाओं की बात है, तो ऐसा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लुभाने और नाराज किसानों का विश्वास जीतने के लिए किया जा सकता है।


तेलंगाना सरकार की रायुतू बंधु योजना जैसी किसी आय बढ़ाने वाली योजना पर विचार हो सकता है, जिसमें रबी और खरीफ के लिए प्रति किसान चार हजार रुपये देने का वायदा किया गया है। कर्नाटक में भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इसे शामिल किया था। तेलंगाना की योजना की लागत 12,000 करोड़ रुपये है। सभी राज्यों का अनुमान वार्षिक खाद्य सब्सिडी से अधिक हो जाएगा। इसके अलावा हर वर्ष इसके लिए धन की जरूरत होगी। 
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पसंदीदा विकल्प चुनावी रूप से फायदेमंद बुनियादी आय हस्तांतरण हो सकता है, यह 2016-17 के आर्थिक सर्वे में शामिल सार्वभौमिक बुनियादी आय की तरह है। एक विकल्प आयुष्मान भारत के तहत चिह्नित दस करोड़ लक्षित परिवारों को एक बार भुगतान किए जाने के रूप में हो सकता है। 3.6 लाख करोड़ रुपये के कोष से हर परिवार को 30,000 रुपये दिए जा सकते हैं। तो क्या वाकई सरकार लोकलुभावन कार्यक्रम के लिए धन चाहती है? राजनीति के चतुर खिलाड़ी आपको बताएंगे कि मतदाता शायद ही याद रखते हैं कि उनके लिए क्या किया गया और राजनीतिक दल वायदे के आधार पर वोट मांगते हैं। इसका मतलब है कि धन की जरूरत 2019 के नतीजों के बाद होगी। नाॅर्थ ब्लाक और मिंट स्ट्रीट के बीच हुआ टकराव वित्तीय संकट की तीव्रता को दिखाता है।


पहली तिमाही में अर्थव्यवस्था की रफ्तार 8.2 फीसदी रही, प्रत्यक्ष कर संग्रह बढ़कर 16.7 फीसदी हो गया और अग्रिम कर संग्रह में भी यही स्थिति है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि वित्तीय घाटा 3.2 फीसदी रहेगा और विनिवेश प्रक्रिया पटरी पर है और यह एक लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य को पार कर जाएगी। तो फिर सरकार को धन की जरूरत क्यों है? आय और खर्च में बेमेल होने के कारण संदेह हो रहा है। सरकार के भीतर राज्य बिजली बोर्डों के बिजली कंपनियों के बकाए, केंद्र के एफसीआई के बकाए और संस्थाओं के ढांचागत तथा सस्ती आवासीय परियोजनाओं के बकाए को लेकर खलबली है। इसी तरह से बाजार में नकदी की कमी से खलबली है, बैंक और गैरवित्तीय संस्थाएं इससे संकट में हैं।


समस्या क्षमता, सामर्थ्य और कल्पना शक्ति में कमी की है। जुबानी जंग का कोई मतलब नहीं। एक बहुत सरल समाधान यह है कि रिजर्व बैंक से कहा जाए कि वह अतिरिक्त धन से 'भारत फंड' की स्थापना करे, जो कि बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में मदद दे, नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट में निवेश करे और विनिवेश को सुगम बनाए। संपत्ति सरकार के पास है औऱ सरकार को बिना धन झटके मुद्दों को सुलझाना है। 
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