पिछली शताब्दी में मंडल आयोग की रिपोर्ट ने पूरे देश में आग लगा दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विराम मिला। सुप्रीम कोर्ट के आठ जजों की पीठ ने नवंबर, 1992 में कहा था कि सामाजिक न्याय जरूरी होने के बावजूद प्रशासनिक कुशलता की दृष्टि से 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं होना चाहिए। 27 साल बाद अब राज्य में चुनावों के पहले, बॉम्बे हाई कोर्ट के दो जजों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नई व्याख्या करते हुए मराठा आरक्षण को वैध ठहरा कर आरक्षण के जिन्न को फिर से जगा दिया है। गायकवाड़ आयोग ने शिक्षण संस्थाओं में 12 फीसदी और सरकारी नौकरियों में 13 फीसदी आरक्षण की अनुशंसा की थी, जिसे महाराष्ट्र सरकार ने बढ़ाकर 16 फीसदी कर दिया था। हाई कोर्ट ने सरकार के फैसले को बदलते हुए आयोग की अनुशंसा को बहाल कर दिया। महाराष्ट्र में मराठों को 72,000 नई सरकारी नौकरियों में नियुक्ति पत्र जारी होने हैं, लेकिन तीन फीसदी की कमी होने से नए विवाद पैदा हो सकते हैं।
मंडल आयोग और परवर्ती आयोगों ने मराठों को पिछड़ा मानने से इनकार कर दिया था। इंदिरा साहनी मामले के फैसले के बाद केंद्र और सभी राज्यों को पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना था। महाराष्ट्र सरकार ने तेरह साल बाद वर्ष 2006 में इस पर अमल किया, पर मराठों को आरक्षण का लाभ देने के लिए बनाए कानून को नवंबर, 2018 में आनन-फानन में मंजूरी मिल गई। राष्ट्रपति की मंजूरी के बगैर इस कानून को लागू करने पर सांविधानिक विवाद है, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट में ही फैसला होगा। महाराष्ट्र में 2001 के कानून से 52 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। केंद्र सरकार ने भी आर्थिक तौर पर पिछड़ों को 10 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून बनाकर 50 फीसदी के नियम का उल्लंघन किया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाने से इनकार कर दिया है। तमिलनाडु में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने के लिए बहुत पहले से कानून है। खबरों के अनुसार, तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में अधिक आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पिछले 25 वर्षों से लंबित है। आरक्षण और प्रोन्नति से संबंधित अनेक अन्य मामले भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, तो फिर इस पर जल्द फैसला कैसे होगा?
महाराष्ट्र में 32 फीसदी आबादी मराठों की है, जिन्हें सरकार द्वारा 16 फीसदी आरक्षण से लुभाने की कोशिश की गई। गायकवाड़ आयोग ने इस बारे में पांच संगठनों को सर्वेक्षण हेतु नियुक्त किया, जिनमें कई सदस्य मराठा आरक्षण के पक्षधर थे। इसे हितों का विरोधाभास माना जाए, तो सर्वेक्षण पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे। समिति ने लगभग 46,629 परिवारों का सर्वेक्षण किया, जिनमें से 29,813 मराठा परिवार थे। पिछडे़पन को निर्धारित करने के लिए 25 अंकों का मापदंड बनाया गया, जिसमें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक फैक्टर शामिल थे। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, मराठों को 12.5 यानी आधे अंक मिले, फिर भी उन्हें पिछड़ा मान लिया गया। पिछड़ेपन के इस पैमाने पर मराठों की तर्ज पर अन्य जातियों में भी पिछड़ेपन की होड़ लग सकती है, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र में ब्राह्मण महासभा ने कर दी है। महाराष्ट्र के साथ हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां पर जाट और गुज्जरों द्वारा ऐसे आरक्षण की मांग परवान चढ़ेगी।
अंग्रेजों ने भारत को जाति और धर्म के आधार पर विभाजित किया। ब्रिटिश भारत में काउंसिल के चुनावों में मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन सूची बनाने की शुरुआत हुई, जिसका अंत पाकिस्तान के विभाजन के तौर पर हुआ। ब्रिटिश भारत में 1931 में पिछड़े वर्ग की आबादी का सर्वेक्षण हुआ, जिसे मंडल आयोग ने 50 साल बाद बेतुकी मान्यता दे दी गई। आजाद भारत में घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए एनआरसी की व्यवस्था पर विवाद हो रहा है और अब आरक्षण के आंकड़ों पर भी विवाद होगा। वर्ष 2011 में भारत में सामाजिक और आर्थिक पैमाने पर जातिगत जनगणना हुई थी, जिसके संपूर्ण आंकड़े अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए। केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष संविधान संशोधन करके पिछड़ा वर्ग आयोग को सांविधानिक मान्यता दे दी और 2021 में पिछड़े वर्ग की जनगणना कराने का भी निर्णय लिया है। महाराष्ट्र में गायकवाड़ आयोग ने 85 साल पुराने आंकड़ों के आधार पर मराठों के पिछड़ेपन के लिए मनगढ़ंत मापदंड बना दिए, जिन्हें 2021 के बाद चुनौती मिल सकती है। 2021 की जनगणना के बाद पिछड़े वर्ग में शामिल होने और बाहर निकलने के लिए विवादों की अनंत शृंखला शुरू हो सकती है।
मोदी सरकार ने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में नौकरशाही को चुस्त बनाने के लिए 27 आईआरएस अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर सराहनीय कदम उठाया है। निजी क्षेत्र से प्रतिभाओं को आमंत्रित करके सरकार में वरिष्ठ पदों पर सीधे नियुक्ति का नया चलन भी शुरू हुआ है। इन नियुक्तियों में आरक्षण नहीं होने से अनेक कानूनी विवाद हो रहे हैं। पिछले कार्यकाल में मोदी सरकार ने 'मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस' का नारा दिया था। डिजिटल होती अर्थव्यवस्था में सरकारी नौकरियों में अवसर कम हो रहे हैं, तो फिर आरक्षण की सियासत में बेरोजगार युवाओं को कैसे लाभ मिलेगा? आरक्षण के विस्तार के साथ क्रीमीलेयर की व्यवस्था को लागू नहीं करने से अराजकता बढ़ रही है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बाद निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग स्वाभाविक है। इंदिरा साहनी मामले में प्रशासनिक कार्यकुशलता और सामाजिक न्याय में संतुलन बिठाया गया था, जिसे राजनेताओं द्वारा चुनावी लाभ के लिए ध्वस्त किया जा रहा है।
संविधान के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को अल्पकालिक अवधि के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। संविधान में समानता, भाईचारा और न्याय का संपूर्ण आधार है, जिसमें आरक्षण एक अपवाद था। राजनीतिक लाभ के लिए आरक्षण के अपवाद को शासन की मुख्यधारा बनाने से भारतीय समाज और विघटित होगा, जो गणतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने संघीय व्यवस्था में केंद्र को इंजन और राज्यों को डिब्बा बताया है। तो फिर केंद्र में प्रशासनिक कुशलता और राज्यों में आरक्षण की बंदरबांट के विरोधाभास से 'एक भारत-श्रेष्ठ भारत' कैसे बनेगा?