प्रधानमंत्री ने फिर राष्ट्रपिता को याद किया है। और ऐसा, जैसा पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया था। राष्ट्रपिता के 145वें जन्मदिवस के लिए ‘स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत’ का नारा दोहराया जा रहा है। यह सांस्कृतिक एवं सामाजिक कारणों के अलावा राजनीतिक कारणों से भी उल्लेखनीय है। यह सब नए राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री की गांधीगीरी है।
इस गांधीगीरी को अपन कैसे समझें? क्या प्रधानमंत्री बनते ही संघसेवक नरेंद्र मोदी में थॉमस बैकेट की आत्मा समा गई है? थामस बैकेट इंग्लैंड के राजा हेनरी द्वितीय के अभिन्न मित्र थे। चर्च को कब्जे में करने के लिए हेनरी ने उन्हें जबर्दस्ती आर्च बिशप ऑफ केंटरबरी बनाया था। मगर बैकेट ने हेनरी की इस सत्ताचाल को नकार कर चर्च की संप्रभुता को ही सर्वोपरि बनाए रखा। इसके लिए उन्हें मरना भी मंजूर हुआ। इसी तरह, संघ द्वारा पदोन्नत और भाजपा द्वारा बेमन से मनोनीत नरेंद्र मोदी ने, जनता द्वारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद अपना व्यवहार ही बदल लिया है। क्या संघ और भाजपा को यह अंदेशा था कि प्रधानमंत्री बनते ही मोदी गांधीगीरी करने लगेंगे?
बहरहाल, प्रधानमंत्री ने पिछले दिनों राष्ट्र को याद दिलाया कि देश को गांधी-प्रासंगिकता के उत्सव की तैयारी करनी चाहिए। नरेंद्र मोदी को बहुमत भी ऐसा मिला है कि उन्हें संघ और भाजपा की अनुमति की फिलहाल आवश्यकता नहीं है। लेकिन राष्ट्रपिता कतई राष्ट्रवादी नहीं थे। वह तो मानवतावादी थे। राष्ट्र जब बापू के डेढ़ सौवें जन्मदिन की तैयारी में लगेगा, तो दुनिया का ध्यान हिंद स्वराज पर दिलाया जाना जरूरी होगा। क्योंकि हिंद स्वराज में ही गांधी जी का सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक सिद्धांत का सपना निहित है।
आजादी के बाद से सरकारी अवकाश माने गए गांधी जी के जन्मदिन पर इस बार स्वच्छ भारत की मुहिम चलेगी। शायद गांधीवाद से ज्यादा सार्थक गांधीगीरी होगी यह। सामाजिक स्वच्छता के अनुरोध से किसी को कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए। गांधी जी ने आजादी को जनांदोलन बनाया था। उसी तर्ज पर मोदी विकास को जनांदोलन बनाना चाहते हैं। लोकतंत्र में जनांदोलन और जनमत की शक्ति को मोदी जान गए हैं। उसको वे मानते कितना हैं, यह देखना शेष है। हालांकि कुछ नारों के साथ वह जनांदोलन की आशा लगा रहे हैं। इनमें ‘मेक इन इंडिया’ द्वारा आर्थिक, ‘स्वच्छ भारत’ द्वारा रचनात्मक, ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ की सामाजिक, तो गांधी प्रासंगिकता की वैश्विक राजनीतिक आशा है।
बहरहाल, लोकतंत्र में सांस्कृतिक और रचनात्मक कार्यक्रम जनसमर्थन के लिए जरूरी होते हैं। मगर इन कार्यक्रमों को बनाए-चलाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। कांग्रेस के लंबे राजकाज के बाद जनता की सहनशीलता भाजपा को कितना मौका देती है, यह समझने की बात होगी। मगर सच यही है कि अन्ना के अनशन और केजरीवाल के आंदोलन के बाद बदली राजनीति के कारण ही देश की जनता ने नया नरेंद्र मोदी तराशा है। ऐसे में, जरूरी है कि विकास की खेती आसमान में न हो और जमीन पर कम्युनल फसल न काटी जाए। मेडिसन स्क्वायर से जिस महात्मा गांधी की जयकार की गई है, उसके देश में सच्ची गांधीगीरी ही होनी चाहिए।