भारतीय धर्मग्रंथों में कई ऐसे प्रसंग हैं, जिसमें बताया गया है कि धर्म के प्रति आकर्षण रखने से ही परलोक सुधारा जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति सांसारिक सुख-सुविधा को दरकिनार कर धर्म धारण करता है, तो उसे देश-समाज में तो सम्मान मिलता ही है, मोक्ष की भी प्राप्ति होती है।
श्रावस्ती निवासी ब्राह्मण वक्कलि ने भगवान बुद्ध की सौम्य छवि से प्रभावित होकर उनसे दीक्षा ले ली। भिक्षु बनने के बाद भी वह धर्म का पालन करने के बजाय बुद्ध की आकर्षक छवि को निहारता रहता था। एक दिन बुद्ध ने उससे इसका कारण पूछ ही लिया। वक्कलि ने उत्तर दिया, भंते, मैं आपके मुखमंडल की आभा से ही तृप्त हो जाता हूं। इसके बाद धर्म-कर्म का पालन करने को जी नहीं चाहता।
भगवान बुद्ध ने उसे समझाते हुए कहा, वत्स, यह समझ लो कि चेहरे का सौंदर्य क्षणभंगुर है, देर-सवेर उसका विनाश अवश्य होगा। जबकि धर्म की आभा सदैव-शाश्वत ज्योति प्रदान करने वाली है। धर्म के लावण्यमय दिव्य रूप के यदि तुमने एक बार दर्शन कर लिए, तो फिर तुम किसी अन्य प्रकार के सौंदर्य के प्रपंच में नहीं पड़ सकोगे। बुद्ध ने उस दिन अपने प्रवचन में भी साधकों को सावधान करते हुए कहा, शारीरिक सौंदर्य के प्रति आसक्ति पतन का कारण बनती है। हमें केवल धर्म के प्रति आसक्ति पैदा करनी चाहिए।