भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र है, इस आत्म-संतुष्टि के विरुद्ध उठने वाली आवाजें, जो गणतंत्र के नाम पर दिए जा रहे धोखों को गिनाने का प्रयास करती हैं, 26 जनवरी की भव्य परेड में वायुसेना के लड़ाकू विमानों की आवाज में दबकर रह जाती हैं। लेकिन इस बार की 26 जनवरी अलग थी। आवाज उठाने वालों ने केवल बोलने और चीखने का काम नहीं किया है, उन्होंने अपनी पीड़ा के असहनीय होने का ऐसा सुबूत पेश किया है, जिसे कोई तर्क खारिज नहीं कर सकता।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के 26 वर्षीय पीएच.डी. छात्र रोहित वेमुला को उसकी मां ने सिलाई करके पढ़ाया था। विश्वविद्यालय में उसकी रुचि राजनीति और अंबेडकर के विचारों में बढ़ी और वह छात्र कार्यकर्ता बन गया, जिसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी। एबीवीपी के छात्र नेताओं से कई सवालों पर बहस हुई, नतीजतन उनके नेता ने रोहित और उसके साथियों के खिलाफ मारपीट करने की शिकायत कर दी। रोहित और उसके साथी निर्दोष पाए गए, दो केंद्रीय मंत्रियों ने विश्वविद्यालय पर लगातार दबाव बनाकर रोहित को निलंबित करा दिया। रोहित और उसके साथियों को हॉस्टल से बाहर कर दिया गया और उसने तमाम समर्थकों के साथ धरना शुरू कर दिया। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। उसकी छात्रवृत्ति भी अन्यायपूर्ण तरीके से रोक दी गई। उसको कर्ज लेकर खर्च चलाना पड़ा और कर्ज लेकर ही अपनी मां को पैसे भेजने की व्यवस्था करनी पड़ी। अधिकारियों की संवेदनहीनता ने उस गीत गाने वाले, तारों तक पहुंचने का सपना देखने वाले उत्साही नौजवान को इतना मजबूर कर दिया कि उसने आत्महत्या कर ली।
रोहित की आत्महत्या के कुछ ही दिन बाद, तामिलनाडु के विल्लुपुरम में तीन दलित छात्राओं ने कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। सरन्या, प्रियंका और मोनिषा, तीनों 19 साल की थीं। वे दो साल से एसवीएस योग और प्राकृतिक उपचार कॉलेज में पढ़ रही थीं। उन्हें वहां पढ़ने की राय सरकार की काउंसलिंग संस्था द्वारा दी गई थी। इन दो वर्षों में उनकी पढ़ाई पर उनके गरीब मां-बाप की कमाई से कई गुना ज्यादा खर्च हो चुके थे।
एक तरफ इस खर्च का बोझ और दूसरी तरफ इस बात की जानकारी ने, कि इस कॉलेज के एक भी छात्र को कहीं नौकरी नहीं मिली थी, उन्हें कुएं के अंदर धकेल दिया। बाद में पता चला कि यह कॉलेज अपने बारे में घोषित कर चुका है कि वह मुनाफे के लिए काम नहीं करता। इसलिए उसे सरकार की तरफ से दलित छात्र-छात्राओं के लिए वजीफा भी मिलता है। जाहिर है, वजीफे का पैसा इन बच्चियों और उनके जैसे न जाने कितने और बच्चों को कभी दिया नहीं गया था। इसी हादसे के दो दिन बाद, खबर मिली कि हिंदी के प्रख्यात कवि, प्रकाश साउ, ने आत्महत्या कर ली है। वह आगरा स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान में काम करते थे। लेकिन वर्षों बाद भी उनकी नौकरी पक्की नहीं हुई थी। अपने दोस्तों से वह इस बारे में और जातिगत टिप्पणियों को सहने की बात बताते थे।
डॉ. अंबेडकर का कहना था, 'देश में प्रजातंत्र को बचाना कठिन है, क्योंकि भारतीय समाज में समानता और भाईचारे को बहुत कम स्थान दिया गया है। ये मौतें इस सच्चाई की गवाह हैं। उनके साथ जो लाखों कंठों से आक्रोश और विरोध की आवाजें उठ रही हैं, उन्हें खामोश नहीं होना चाहिए, चाहे कितना भी अत्याचार क्यों न हो।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।