महापुरुषों के पदचिह्न अभी मिटे नहीं, क्योंकि हम उन पर कभी चले नहीं। बचपन की बतकही में ये चाचा सुनाते थे। अपन हंसी में उड़ा दिया करते थे। सभ्य समाज पीढ़ी दर पीढ़ी अपने पुरखों और सामाजिक नायकों को याद कर प्रेरणा पाता है। लेकिन आज महापुरुषों को याद करना औपचारिक हो गया है। उनके अच्छे विचारों को, अच्छे कामों को ग्रहण करना मुश्किल होता गया है। उनके नाम को चुनावी मुद्दा बनाया जाता है, उनके नामों पर तुकबंदियां चलाई जाती हैं और लुभावनी योजनाओं की घोषणा होती है। मगर उनके काम पर बात तक नहीं होती।
पिछले दिनों चार कर्मठ महापुरुषों को औपचारिक तौर पर ही सही, याद किया गया। अक्तूबर में महात्मा गांधी को याद करने के अलावा देश ने जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया और नानाजी देशमुख को भी याद किया। चारों ने आजाद भारत में सत्ता के विरोध में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष किए। अपने भाषण और लेखन से समाज के उत्थान के लिए जीवनपर्यंत संघर्षरत रहे। समाज की वैचारिक, सांस्कारिक स्थापना में इनके योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकेगा।
आज बच्चों को देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रियों के नाम तो रटाए जाते हैं, लेकिन जेपी, दीनदयालजी, लोहियाजी और नानाजी के विचार और काम के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता। आने वाली पीढ़ी को इनके विचार और काम के बारे में बताएगा कौन?
देश में अगर किसी ने अलोकतांत्रिक, भ्रष्ट सत्ता को पहली बार जनजागरण से ललकारा था, तो वह जयप्रकाश नारायण थे। जनता ने 1977 के आम चुनाव में इंदिरा कांग्रेस की प्रभुसत्ता को लोकतंत्र की शक्ति दिखाई थी। जिस जनता पार्टी को जेपी ने एकजुट किया और जिसके नेता सत्ता में आए, उनसे सत्ता संभली नहीं। आपसी कलह और सरकारी झगड़ों के कारण जनता के बहुमत को जनता पार्टी ने ढाई साल में ही गंवा दिया। नेताओं की राजसत्ता के कारण जेपी की सेवासत्ता हार गई।
जेपी की तरह ही डॉ राममनोहर लोहिया ने राजनीति को समाज की सेवा के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया। लोहिया ने भी माना था कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वशक्तिमान होनी चाहिए। जनता को झकझोरने के लिए उन्होंने कहा था, ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती हैं’। कांग्रेस में रहते हुए ही उन्होंने सरकार की व्यक्तिवादी नीतियों का विरोध किया। वह लगातार जातिवादी असमानता, और समाज के उत्थान में बाधा बने मुद्दों पर बोलते, लिखते रहे।
इसी तरह दीनदयाल उपाध्याय ने भारत के लिए ‘एकात्म मानववाद’ का सपना संजोया था। वह जीवनपर्यंत भारतीय सनातन विचारधारा को पुनर्स्थापित करने में लगे रहे। उन्होंने कहा था, 'भारत में रहनेवाला और उसके प्रति ममत्व की भावना रखनेवाला मानव समूह एक जन है। अपनी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे, तभी भारत एकात्म रहेगा।'
नानाजी देशमुख का जीवनकाल, मूल भारतीय शिक्षा के प्रचार और समाज में संगठनात्मक शक्ति खड़ी करने के लिए लगा। 1977 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने सरकार में शामिल न होने का निर्णय किया। जेपी को जनता पार्टी की कलह ने दुख दिया। लोहिया का समाजवाद आज परिवारवाद में सिमटकर रह गया है। दीनदयालजी और नानाजी के विचार और काम आगे बढ़ाने से ज्यादा उनके अनुयायी आज मनमौजी सत्ता चला रहे हैं।