कुछ दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि दहेज उत्पीड़न के मामले में ससुराल के लोगों की गिरफ्तारी तभी हो, जब ऐसा करना निहायत जरूरी हो। राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस फैसले के खिलाफ सुधारात्मक याचिका दायर की थी। महिला संगठनों ने भी इस फैसले का विरोध किया था। मगर अपने पहले के फैसले में किसी भी तरह का बदलाव करने से कोर्ट ने इन्कार कर दिया और महिला आयोग की याचिका खारिज कर दी।
दहेज उत्पीड़न विरोधी धारा 498 ए ऐसी है, जिसका नाम सुनते ही बड़े-बड़े कांपने लगते हैं। वर्षों पहले उच्चतम न्यायालय इसे 'लीगल टेररिज्म' यानी कि कानूनी आतंकवाद तक कह चुका है। कारण यह है कि इस कानून के तहत बहू और उसके घर वाले जिसका नाम ले लें, उसे पकड़ लिया जाता है। अब तक कोई ऐसा अध्ययन शायद ही हुआ हो, जिससे पता चल सके कि दहेज उत्पीड़न कानून के जरिये वास्तव में सताई गई कितनी औरतों को न्याय मिला और कितनी निरपराध फंसाई गईं। यह भी देखने में आया कि वर पक्ष के पूरे कुनबे और सत्तर-सत्तर लोगों के नाम लिखवा दिए गए। यही नहीं विदेश में जो लोग रहते थे, उन्हें भी आरोपी बना दिया गया। सेव इंडियन फैमिली नामक संस्था ने एक बार कहा था कि इस धारा के अंतर्गत हर इक्कीस मिनट में एक औरत पकड़ी जा रही है। यह कितनी अजीब बात है कि जिस कानून को औरतों की रक्षा के लिए बनाया गया था, वह औरतों को ही सताने लगा। न्याय की एकपक्षीय अवधारणा ऐसा ही करती है। इस कानून के अंतर्गत औरत सिर्फ बहू थी या पत्नी थी। मां, बहन, चाची, ताई , बुआ, सास, ननद, जिठानी, देवरानी आदि औरतें नहीं थीं। मान लिया गया और लगातार प्रचारित भी किया गया कि ये सबकी सब औरतें सिर्फ बहुओं को सताने के लिए बनी हैं। बहुएं भी किसी को सता सकती हैं, इसे बिल्कुल भुला दिया गया। जिसने भी इस बात को कभी उठाने की कोशिश की, उसे मुफ्त में स्त्री विरोधी होने का तमगा सौंप दिया गया।
जिस समय दहेज उत्पीड़न कानून बना था, उस समय सोचा गया था कि इससे हमारे समाज में फैला यह रोग दूर होगा। लड़कियों और उनके माता-पिता को राहत की सांस मिलेगी। मगर ऐसा हुआ नहीं। एक तरफ शादी अपनी हैसियत दिखाने की चीज बनी और दहेज में दी जाने वाली चीजें स्टेट्स सिम्बल बनती चली गईं। दूसरी तरफ वे गरीब माता-पिता थे, जो लड़की को जैसे-तैसे पालते, पढ़ाते थे, लेकिन दहेज नहीं दे सकते थे, उनकी विपत्तियां कम नहीं हुईं। क्योंकि कानून भी उसे न्याय दे पाता है, जिसके पास उसका लाभ उठाने के संसाधन होते हैं। लेकिन कुछ चालाक लोग, जिन्हें 498 ए की जानकारी थी, वे इसे एक तरह से लड़के वालों को सताने और उनसे वसूली करने का साधन समझने लगे। कुछ साल पहले एक साथी ने बताया था कि हरियाणा के बहुत से गांव ऐसे हैं, जो बाकायदा दहेज उत्पीड़न कानून के नाम पर ब्लैकमेलिंग करते हैं। वहां ऐसे बहुत से संगठित गिरोह बन गए हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट देखें, तो कहा जा सकता है कि दहेज उत्पीड़न के मामले बढ़े हैं। मगर ब्यूरो थाने में की गई शिकायतों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालता है। वह कभी उन बातों और खबरों पर ध्यान नहीं दे पाता, जिनमें कहा जाता है कि इन दिनों इस कानून के तहत की जाने वाली अधिकांश शिकायतें या तो झूठी होती हैं या बदला लेने के लिए की गई होती हैं।
यह दुखद ही है कि एक कानून महिलाओं के भले के लिए बनाया गया था। मगर उसके दुरुपयोग के कारण आज उसे कमजोर किया जा रहा है।