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गुमशुदा की तलाश है: वैश्विक युद्धों के दौर में संयुक्त राष्ट्र की चुप्पी पर उठते सवाल

सार

मानवाधिकार व शांति के संकल्प के साथ स्थापित संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक युद्धों के बीच लापता दिखना उसकी प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करता है।
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संयुक्त राष्ट्र - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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दुनिया के बड़े हिस्से में धधक रही युद्ध की आग के बीच एक गुमशुदा की तलाश चल रही है, यह कोई इन्सान, माफिया या गिरोह न होकर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) नाम का संगठन है। युद्ध रोकने और मानव अधिकार समेत विकास की कसमें खाकर बने इस संगठन के किसी भी अंश का अस्तित्व ही ओझल हो गया है। वर्तमान युद्ध काल में लड़ाई के संसाधन इस कदर झोंक दिए गए हैं कि उनकी गिनती करना भी दूभर हो गया है। न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र का मुख्य संगठन, बल्कि उसके प्रमुख और आनुषंगिक संगठनों ने भी पूर्णतया मौन साधकर अपने को समाधि की स्थिति में स्थापित कर लिया है।
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इस संगठन का गठन 51 देशों ने 26 जून, 1946 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में किया था। भावी पीढ़ियों को युद्ध से बचाने के उद्देश्य से लिखित प्रस्तावना पर अपनी सहमति व्यक्त करते हुए संस्थापक राष्ट्रों ने हस्ताक्षर भी किए थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि युद्ध रोकने के उद्देश्य से गठित संगठन की नाक के नीचे से ही वैश्विक अशांति को दिशा दी जा रही है। प्रस्तावना के अनुसार, राष्ट्रों ने संकल्प लिया कि वे आने वाली पीढ़ियों को युद्ध के खतरे से बचाएंगे। साथ ही,  वे मूल मानवाधिकारों, मानव गरिमा और मूल्य तथा छोटे-बड़े सभी देशों की समानता में विश्वास को फिर से मजबूत करेंगे। वे ऐसे हालात बनाएंगे, जिनमें संधियों व अंतरराष्ट्रीय कानूनों से पैदा होने वाली जिम्मेदारियों का न्याय और सम्मान बना रहे, तथा स्वतंत्रता के माहौल में सामाजिक प्रगति तथा बेहतर जीवन को बढ़ावा दिया जा सके। यूएन के छह मुख्य अंग हैं, जो इसके कार्यों का संचालन करते हैं। इसके अतिरिक्त 16 विशिष्ट संस्थाओं का संचालन भी संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के तहत ही होता है। संगठन को अपेक्षित सफलता न मिलने के बाबत चर्चाएं तो विगत कुछ दशकों से दुनिया भर में चलती रही हैंै, किंतु यूएन की अपने मूल उद्देश्यों के प्रति बेबसीपूर्ण शिथिलता समझ से परे है। आखिर, क्या कारण हैं कि मूल संगठन समेत समस्त ढांचा युद्ध की विभीषिका के बचाव में पहलकारी भूमिका में नहीं दिख रहा। बीते चार वर्षों के युद्ध घटनाक्रम के बाद यूएन के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगे हैं। अमेरिका इस व्यवस्था की स्थापना से अभी तक इसका हिस्सा रहा है, किंतु वहां की सरकार ने ही सर्वप्रथम खुलेआम यूएन को औचित्यहीन माना है। शायद यही कारण है कि अमेरिका यूएन चार्टर की धज्जियां उड़ाते हुए, अपने समर्थित युद्धों की गौरवपूर्ण स्वीकृति दिए जा रहा है। रेडक्रॉस, रेड क्रिसेंट संस्थाओं की उपस्थिति भी मात्र औपचारिकता भर रह गई है।

इस परिपेक्ष्य में सर्वप्रथम रूस-यूक्रेन युद्ध का उल्लेख करना उचित होगा। अनुमान के अनुसार, जहां अब तक युद्ध में करीब 20 लाख लोगों ने अपनी जिंदगी से हाथ धोया, तो इससे दोगुने लोगों को देश छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। असंख्य लोग घायल और बेरोजगार हो गए। क्या यह मानव अधिकारों का उल्लंघन नहीं है? यह क्रम तब से लेकर वर्तमान में चल रहे विभिन्न युद्धों तक अनवरत रूप से चला आ रहा है। एक के बाद एक हो रहे युद्धों से राष्ट्रों की संप्रभुता पर सीधा-सीधा हमला हो रहा है और वे खतरे में हैं। ऐसे में, सुरक्षा परिषद क्यों दायित्वविहीन नजर आ रही है। इस संदर्भ में तो वीटो पावर रखने वाले रूस व अमेरिका की युद्धों में सक्रिय भागीदारी ने ‘जब सैंया भए कोतवाल, तो डर काहे का’ कहावत को चरितार्थ कर दिया है। इन युद्धों में इस्तेमाल हो रहे बेतहाशा आयुध क्या वैश्विक तापमान, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को आहत नहीं कर रहे? यदि कर रहे हैं, तो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का मौन समझ नहीं आता। युद्ध से सेहत पर पड़ने वाले असर को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहीं कोई हस्तक्षेप नहीं दिखा। अमेरिका व इस्राइल द्वारा ईरान के विद्यालयों को लक्षित कर किए गए हमले में सैंकड़ों मासूम बच्चों की जान चली गई। दस्त से हुई चंद मौत के बाद दुनिया भर में हल्ला मचाने वाला यूनिसेफ भी बेजुबान हो गया है।
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हाल ही में, तेहरान में 16वीं सदी की ऐतिहासिक विश्व विरासत धरोहर गोलेस्तान पैलेस को युद्ध से क्षति पहुंचाई गई। यूनेस्को चुप रहा। क्या यूनेस्को की भूमिका मात्र मान्यता देने तक ही सीमित है? मान्यता से संरक्षण तो प्राप्त नहीं होता। उचित होता संरक्षण हेतु राष्ट्रों को बाध्य किया जाता। इसी प्रकार, संयुक्त राष्ट्र के समस्त संगठन दुनिया में अपने तय एजेंडे के अतिरिक्त कहीं भी नजर नहीं आते। यदि आपातकालीन परिस्थितियां उनके लिए कोई महत्व नहीं रखतीं और राष्ट्रों को अपनी संप्रभुता की रक्षा स्वयं ही करनी है या किसी संगठन का अराजकता पर कोई अंकुश ही नहीं है, तो फिर उसके अस्तित्व पर हजारों करोड़ डॉलर प्रतिवर्ष का खर्चा क्यों किया जाए?

अतः यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र अपनी स्थापना की मूलभावना को क्रियान्वित करने हेतु सामने आकर अवहेलना कर रहे राष्ट्रों को पाबंद करे या चिंताओं का दिखावा करना बंद करे। यदि संयुक्त राष्ट्र को शांतिकाल तक ही अपनी भूमिका सीमित करनी है, तो वर्तमान ढांचे का पुनरावलोकन कर उसे सीमित एवं मितव्ययी संगठन के रूप में पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए।
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