फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

लोकतंत्र और न्याय प्रणाली का रिश्ता

Sun, 23 Apr 2017 08:07 PM IST
तवलीन सिंह
विज्ञापन
तवलीन सिंह
विज्ञापन
अब बाबरी मस्जिद मामले की रोज सुनवाई होगी और दो वर्ष के अंदर हम जान जाएंगे कि मस्जिद को ढहाए जाने के पीछे षड्यंत्र था या नहीं और उसमें भाजपा के वरिष्ठ, मार्गदर्शक राजनेता  शामिल थे या नहीं। षड्यंत्र साबित हो भी जाता है, तो क्या हासिल होगा? यह वह दौर है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तय कर रहे हैं कि नशाबंदी हाइवे से कितने मीटर की दूरी तक होनी चाहिए। यह वह दौर है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय तय कर रहा है कि सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य होना चाहिए या नहीं। आर्थिक नीतियों में भी परिवर्तन लाने का काम न्यायाधीश कर रहे हैं।
विज्ञापन


न्यायाधीशों की आलोचना करना खतरे से खाली नहीं है। सो आगे बढ़ने से पहले मैं विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं कि मेरी बातों को आलोचना न मानकर रचनात्मक सुझाव के रूप में देखा जाए। स्पष्ट कर दूं कि मेरी नजरों में लोकतंत्र और न्याय प्रणाली का रिश्ता चोली-दामन का है। जिन लोकतांत्रिक देशों में न्याय प्रणाली कमजोर होती है, वहां अक्सर अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमजोर होती हैं।

न्याय का भय जब नहीं होता है, तब ऐसी घटनाएं अक्सर देखने को मिलती हैं, जिनमें आम नागरिक कानून को अपने हाथों में लेता फिरता है। पिछले सप्ताह राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के एक गांव में एक नवविवाहित दंपति को गांव वालों ने नंगा करके गांव की सड़कों पर सिर्फ इसलिए घुमाया, क्योंकि दोनों ने भागकर शादी कर ली थी। इस तरह का ‘न्याय’ हाल में हमने तब भी देखा, जब अलवर में पहलू खान को गोरक्षकों ने पीट-पीटकर मार डाला।
विज्ञापन


देश की महिलाओं को न्याय इतनी मुश्किल से मिलता है कि लाखों  पीड़ित महिलाएं अदालतों का दरवाजा खटखटाने की कोशिश तक नहीं करतीं। बलात्कारियों को दंडित करने में दशक लग जाते हैं। तेजाब फेंकनेवाले गुंडे कई-कई वर्षों तक दंडित नहीं होते। जिन लोगों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है, वे तो वैसे भी अदालत जाना  नहीं चाहते, क्योंकि उनके लिए वकीलों की फीस देना तकरीबन असंभव होता है।

कुछ महीने पहले मैंने मुंबई में मेरी जानकारी के कुछ अति गरीब लोगों की मदद करने की कोशिश की थी। दरअसल जब उनकी झुग्गियां तोड़ी गई थीं, तब उन्होंने पुलिस वालों को रोकने की कोशिश की थी। सो उन पर फौजदारी का मुकदमा लग गया। मैंने उनकी तरफ से वकील रखा, जिसने एक दिन की पेशी के लिए मुझसे 35,000 रुपये मांगे। यह रकम मेरे लिए भी काफी ज्यादा थी, लेकिन मैं करती क्या?

जरा सोचिए कि जब बाबरी मस्जिद जैसे अति महत्वपूर्ण मामले को 25 वर्ष लग सकते हैं, तो बेहाल गरीबों के मुकदमे कितने वर्षों तक चलते होंगे। कोई बीस साल पहले दिल्ली परिवहन निगम की एक बस ने मेरी गाड़ी को पीछे से टक्कर मारी थी। बस का ड्राइवर सड़क पर बस छोड़कर भाग गया था, पर मैंने थाने में एफआईआर दर्ज किया था। आज तक उस मामले में कार्यवाही शुरू नहीं हुई है। सो सवाल न राम मंदिर का है, न बाबरी मस्जिद का। सवाल यह है कि 25 वर्ष बाद अगर न्याय मिलता भी है, तो क्या उसे न्याय कहा जा सकता है? जब बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद दंगों में हजारों लोग मारे गए थे, उस समय षड्यंत्र साबित हो जाता, तब न्याय होने से ताजे घावों पर राहत का मरहम तो लग जाता। अब जब घाव भर गए हैं, तब अदालत के फैसले से भरे हुए जख्म फिर से नहीं खुल जाएंगे?
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें