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मौका गंवाने का अफसोस

Mon, 04 Feb 2013 08:30 AM IST
हरवीर सिंह
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आगरा में संपन्न हुई पार्टनरशिप समिट, 2013 उत्तर प्रदेश के लिए एक मौके की तरह थी, लेकिन कहना ही पड़ता है कि राज्य सरकार इसका पूरा फायदा नहीं उठा पाई।
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नतीजतन यह अंतरराष्ट्रीय आयोजन, जिसका नारा मजबूत और टिकाऊ विकास के लिए वैश्विक साझेदारी था, एक मेले की तरह होकर रह गया। इसमें देश-विदेश के लोग आए तो जरूर, लेकिन राज्य के लिए यह एक ऐसी घटना में तब्दील नहीं हो सका, जिसका यहां के आम आदमी और अर्थव्यवस्था पर दूरगामी असर दिखे।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी ऐंड प्रमोशन (डीआईपीपी) द्वारा सीआईआई के सहयोग से आयोजित यह सम्मेलन हर साल किसी एक राज्य में होता है। यह  19वीं समिट वैसे तो कोलकाता में होनी थी, लेकिन ममता बनर्जी के साथ केंद्र सरकार का तालमेल बिगड़ने के कारण इसका आयोजन स्थल आगरा हो गया था।
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उत्तर प्रदेश की नई सरकार के लिए यह एक अवसर की तरह था, जिसका उपयोग राज्य में निवेश का रास्ता खोलने के लिए किया जा सकता था। पर तीन दिन के इस सम्मेलन में राज्य सरकार ने कोई ऐसी बड़ी नीतिगत घोषणा भी नहीं की, जो निवेशकों को तुरंत कुछ फैसले लेने में मदद कर सके। राज्य सरकार औद्योगिक और ढांचागत निवेश नीति पहले ही घोषित कर चुकी थी। इसलिए उसने इस सम्मेलन में पोल्ट्री, खाद्य प्रसंस्करण और सौर ऊर्जा जैसी विशेष क्षेत्रों से संबंधित नीतियां जारी कीं। पर इनमें भी क्रांतिकारी प्रावधान नहीं थे।

असल में उद्घाटन सत्र में ही राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को प्रभावी तरीके से राज्य को एक निवेश विकल्प के रूप पेश करना था। पर वह ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने लिखित भाषण पढ़ा, जो बहुत प्रभावी नहीं था। अपनी प्राथमिकता में उन्होंने कृषि को सबसे ऊपर रखा जरूर, परंतु कृषि क्षेत्र में राज्य सरकार ऐसा क्या काम कर रही है, जो उद्योगों को आकर्षित करे, यह उसमें नहीं दिखा।

उदाहरण के लिए, चीनी उद्योग को उन्होंने बहुत अहम बताया, लेकिन उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार के दौरान लागू की गई नीति के चलते बड़ी संख्या में चीनी मिलें स्थापित हुई थीं और अब इनकी संख्या बढ़ने की संभावना बहुत कम रह गई है।

दरअसल ढांचागत कमी राज्य की सबसे बड़ी समस्या है। बिजली की किल्लत से उद्योग और कृषि क्षेत्र से लेकर आम आदमी तक दिक्कत झेल रहा है। अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने 16,000 मेगावाट विद्युत क्षमता बढ़ाने की बात की, लेकिन पिछले एक साल में एक बड़ी बिजली परियोजना से एक निजी कंपनी के हाथ खींच लेने की खबरों के अलावा नई क्षमता को लेकर कोई कदम सामने नहीं आया है।

हालांकि इस सम्मेलन में बिजली वितरण के निजीकरण को लेकर सुझाव आए और राज्य सरकार अगर इस पर अमल करती है, तो कुछ निवेश आ सकता है। लेकिन यह देखना पड़ेगा कि क्या ऐसा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूदा सरकार में है। जिस यमुना एक्सप्रेस-वे को सम्मेलन में प्रचारित किया गया, वह तो पिछली सरकार के समय में बना था और कई दूसरी टोल रोड परियोजनाएं भी पिछली सरकार के समय ही शुरू हुई थीं।

हालांकि राज्य सरकार ने हाइवे परियोजनाओं में 23,000 करोड़ रुपये के निवेश की योजना की बात कही है।
असल में राज्य सरकार की सबसे बड़ी खामी यह रही कि इस मौके को भुनाने के लिए जिस व्यापक होमवर्क की जरूरत थी, वह नहीं किया गया। इसके लिए पूरी सरकारी मशीनरी को संभावित निवेशकों के साथ बातचीत कर परियोजनाओं पर फैसले के स्तर तक पहुंच जाना चाहिए था, ताकि इस मौके पर कुछ बड़ी निवेश घोषणाएं हो पातीं।

इससे राज्य को लेकर घरेलू और विदेशी उद्यमियों का रुझान दिखता। इसके लिए राज्य सरकार को गुजरात सरकार के अनुभव से सीख लेनी चाहिए थी। वहां वाइब्रेंट गुजरात में बड़ी निवेश घोषणाएं कंपनियों ने कीं और उनके लिए सरकार पूरे साल काम करती रहती है। गुजरात के अलावा केरल और मध्य प्रदेश भी निवेशकों को अपने राज्य में लाने के लिए आयोजन कर चुका है। इन राज्यों को इस मोर्चे पर केंद्र सरकार का सहयोग भी हासिल नहीं था, जो पार्टनरशिप समिट के रूप में उत्तर प्रदेश को हासिल था।

दिलचस्प बात यह रही है कि इस सम्मेलन में केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने देश में कामकाजी आयु के युवाओं की बड़ी आबादी को भारत के लिए एक मौके की तरह पेश किया। अखिलेश यादव का भी कहना था कि अगर उत्तर प्रदेश को देश के रूप में देखा जाए, तो 20 करोड़ लोगों के साथ यह दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश होगा। इसलिए यहां संभावनाएं बहुत हैं।

फिलहाल यह आबादी राज्य के लिए फायदेमंद है या राज्य के संसाधनों पर भारी है, इसका कुछ संकेत उनके भाषण में नहीं दिखा। हालांकि दूसरे दिन उत्तर प्रदेश के लिए आयोजित खास सत्र में अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों ने राज्य के साथ आगे बातचीत बढ़ाने की बात जरूर कही। पर इसके लिए उन्होंने कई सुधारवादी कदमों की जरूरत भी राज्य सरकार को बताई।
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आगामी मार्च में उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार एक साल पूरा कर रही है। इन दिनों तमाम राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए कदम उठा रहे हैं। आगरा समिट में उत्तर प्रदेश सरकार अगर बेहतर तालमेल और रणनीति के जरिये राज्य की आर्थिक तरक्की के लिए कुछ बड़ी परियोजनाएं घोषित कराने में कामयाब हो जाती, तो यह उसके लिए पहले साल की एक बड़ी उपलब्धि में शुमार हो जाता। अब यह देखना है कि इस बड़े आयोजन का फायदा राज्य आने वाले दिनों में भी उठा पाता है या नहीं।

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