साधो, तीस-पैंतीस साल से कलम चलाते हुए मैंने किताबों के ढेर लगा दिए। घर वाले मेरी अलमारियों में रखे साहित्य को हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। मैंने कहा, मैं जनता का लेखक हूं। पर कोई है कि मानता नहीं। दिल्ली के एक नवोदित राजनीतिक उस्ताद मुझसे बोले कि तुम जनता का लेखक नहीं हो सकता, क्योंकि तुमने जनता से पूछकर लिखना नहीं शुरू किया।
वह बोले, तुम रायशुमारी कराओ। पूछो जनता से कि तुम्हें क्या और क्यों लिखना चाहिए। सो रायशुमारी का ऐलान करते ही दो दिन में ही मेरे पास पांच लाख एसएमएस और डेढ़ लाख टेलीफोन आ गए। लोगों ने जो राय व्यक्त की, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-तुम जो लिखते हो वह बकवास लगता है। कूड़े के अंबार लगा रहे हो। तुमसे पहले भी बहुत लिखा जा चुका। उसे ही कौन पढ़ रहा है? अच्छा हो कि परचून की दुकान खोल लो। बच्चे दुआ देंगे। दूसरी प्रतिक्रिया थी-तुम नई पीढ़ी की हत्या करने पर तुले हो। तुम्हें कलम एक तरफ रखकर आत्महत्या कर लेनी चाहिए।
तीसरे ने लिखा-गलतफहमी में मत जिओ। तुम कागज बेकार करके लोगों का दिमाग खराब करते हो। तुमसे ज्यादा कोई कूढ़मगज नहीं। चौथे ने सवाल किया-साहित्य किस चिड़िया का नाम है? पांचवें ने कहा-तुम जो लिखते हो, वह सिर के ऊपर से गुजर जाता है। तुम्हें पढ़कर पता नहीं, कितने बरबाद हो गए।
छठे का संदेश था-तुम सिर्फ अपने लिए लिखते हो। शर्म हो, तो बंगाल की खाड़ी में डूब मरो। सातवें ने दर्ज किया-तुम्हारे घर के नजदीक ही पागलखाना है। वहां रहना तुम्हारे लिए मौजूं रहेगा। आठवें की प्रतिक्रिया थी-अच्छा होता कि तुम पैदा होते ही अल्लाह मियां के प्यारे हो जाते। तुम्हें पढ़ना जहन्नुम से गुजरने जैसा है। क्या सीधे वहीं से इस धरती पर अवतरित हुए हो?
नवें ने भुनभुनाते हुए कहा-मैं तुम्हें श्रद्धांजलि देना चाहता हूं। कहो कि कब मरने का इरादा है? अंत्येष्टि में जरूर आऊंगा। दसवें ने कहा-मैं तुम्हें लिखने की इजाजत कभी नहीं दे सकता। तुम्हारे लिए मेरी सलाह है कि घर बैठकर घुइयां छीलो। ग्यारहवें का कहना था-एक कलमघसीटे को रोटी कैसे मुहैया हो जाती है। जरूर कोई घपला है। चोरी-छिपे कोई घोटाला तो नहीं कर रहे। आयोग बैठाकर तुम्हारी जांच की जानी चाहिए।
आप भी अपनी टिप्पणी से मुझे अवगत कराएं, ताकि पूरी रायशुमारी के बाद मैं कोई फैसला ले सकूं।