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कम हो रहे... किसान!

Thu, 02 May 2013 09:32 PM IST
प्रकाश पुरोहित
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सरकार ने कहा है तो सच ही होगा कि इस साल किसानों ने कम आत्महत्या की है। अभी यह पता लगना बाकी है कि आत्महत्या में कमी किन कारणों से आई है। यह भी नहीं बताया गया कि किसानों के जिंदा बने रहने में सरकार का दोष नहीं है। अभी तो आंकड़े ही मिले हैं, किसान रहें, तो कारण भी मिल ही जाएंगे।
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इसमें दिक्कत यह पेश आ सकती है कि मरने वाले किसान के बारे में तो पक्का है कि उसने कर्ज लिया था और न चुका पाने की वजह से उसने आत्महत्या की है। लेकिन वह किन कारणों से अब तक जिंदा है, यह पता लगाना मुश्किल काम है, क्योंकि जिंदा और मुर्दों में कर्ज ही ऐसी घटना है, जो दोनों में समान रूप से पाई जाती है। हो सकता है, मुख्यमंत्री के बयान के बाद आरोप लगे कि सरकार की वजह से किसान आत्महत्या नहीं कर पा रहे। सरकार का क्या है, किसान को आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकती है, तो उसे जिंदा रहने के लिए मजबूत भी कर सकती है।

इसलिए यह मान लिया जाना चाहिए कि सरकार के डर से किसान अब आत्महत्या कम कर रहे हैं, क्योंकि सरकार ने यह तो अभी तक नहीं बताया है कि उसने किसानों के लिए पैसे का पेड़ लगा दिया है। किसान पिछले साल भी कर्ज में था, जब वह आत्महत्या कर रहा था, और इस साल भी कर्ज में है, जबकि वह होशो-हवास में जिंदा है।
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किसानों के साथ एक परेशानी यह भी है कि वे पूरे साल आत्महत्या नहीं करते। जनवरी से अप्रैल के बीच ही ऐसे दुखद मामले सामने आते हैं। इसकी वजह यही है कि इन दिनों खेतों में कामकाज तो कुछ रहता नहीं है, तो उकता कर किसान जान देने लगते हैं।

यह अच्छी बात है कि किसानों ने इस साल कर्ज को कर्ज नहीं समझा, और जिंदा रहे। यही बात तो सरकार समझाती आ रही है कि किसान का जन्म कर्ज में होता है और उसकी मौत भी जब कर्ज में ही होती है, तो कर्ज की वजह से जान देने की क्या जरूरत है!

सरकार यह तो नहीं कर सकती कि किसानों को पानी, बिजली, बीज, खाद और बाजार भाव दिलवा दे। फिर बिचौलियों को आत्महत्या से कौन रोकेगा? सरकार की कोशिशें काम कर रही हैं। और आप देख ही रहे हैं कि इस साल कम किसानों ने जान दी है। अब आप यह तो कहिए मत कि किसान बचे ही कहां हैं कि जान दें। भारत कृषि प्रधान देश है, तो आत्महत्या लायक किसान तो होंगे ही।
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