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फिर एक बार भारत की खोज

Sat, 20 Sep 2014 09:31 PM IST
फरीद जकरिया
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विंस्टन चर्चिल ने कभी उत्तेजना में कहा था कि भारत मात्र एक भौगोलिक अभिव्यक्ति है। इसी भावना को सिंगापुर के संस्थापक ली कुआन येन ने भी हाल ही में मुखरित किया था। उनका तर्क था कि भारत वास्तव में एक देश नहीं है। इसके बजाय वह 32 अलग राष्ट्रों का एक समूह है, जो ब्रिटिश रेल लाइन के साथ बंधा है।
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भारत विविधता को नए अर्थ देता है। इस देश की कम से कम 15 प्रमुख भाषाएं, सैकड़ों बोलियां, अनेक प्रमुख धर्म और हजारों कबीले, जातियां और उपजातियां हैं। दक्षिण के एक तमिल भाषी ब्राह्मण और पंजाब के एक सिख के बीच बहुत कम समानता है। प्रत्येक की अपनी अलग भाषा, धर्म, जातीयता, परंपरा और जीवन पद्धति है।
 
पिछले दो दशकों में हुए हर संसदीय चुनाव में टिप्पणीकार कोई एक राष्ट्रीय रुझान या थीम खोजने में विफल रहे हैं। दरअसल राज्य दर राज्य स्थानीय मसले और व्यक्तित्व छाए रहते हैं। आज भारत के ज्यादातर राज्यों में अलग-अलग क्षेत्रीय दलों का शासन है। फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं, जिनका पक्का यकीन है कि भारत अपरिहार्य रूप से एक है। इस बात के प्रबल पक्षधर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में नेहरू ने, जो भारतीय इतिहास की उनकी अपनी व्याख्या है, प्राचीन सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर सम्राट अशोक के शासन और मुगलकाल से होते हुए आधुनिक भारत तक के इतिहास में एक बुनियादी सातत्य का वर्णन किया है।
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नेहरू भारत की अपार विविधता और एकसूत्रता की इसकी कमी को बहुत अच्छी तरह समझते थे। देश हिन्दू और मुसलमानों में विभाजित था,जो उनके और महात्मा गांधी के एक संगठित भारत के सपने के लिए भयावह साबित होने वाला था। लेकिन वे आजादी के आंदोलन के लिए भारत को एक देश के रूप में देखने को एक बौद्धिक प्रश्न के रूप में खड़ा कर रहे थे। और उनकी बात में दम था। भारत का हजारों वर्षों तक एक तारतम्यपूर्ण भौगोलिक और राजनीतिक अस्तित्व रहा है।

लेकिन नेहरू और चर्चिल दोनों ही राष्ट्र-राज्य की अपनी अवधारणा में गलत थे। भारत यूरोप के एक जातीय और एक धर्म वाले राष्ट्रों के उदाहरण को न अपना सका। ब्रिटेन ने टेक्नोलॉजी-रेलमार्ग और हथियारों के जरिये भारत को संगठित किया था। इस तरह भारत को एक करने की प्रवृति ने बदले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में ब्रिटेन के खिलाफ एक संगठित राष्ट्रीय विरोध का मार्ग प्रशस्त किया। लेकिन यह एक ऐतिहासिक अपवाद ही था। इतिहास में ज्यादातर समय भारत एक ढीला-ढाला महासंघ ही रहा है।

नेहरू और उनके अनेक समवयी 19वीं शताब्दी के यूरोपीय राष्ट्रवाद और 20वीं शताब्दी के यूरोपीय समाजवाद से गहरे रूप में प्रभावित रहे हैं। एक शक्तिशाली राष्ट्रीय सरकार के बिना उन्होंने आधुनिक भारत की कल्पना तक नहीं की थी। भारत में राजनीतिक क्षेत्र के बजाय आर्थिक क्षेत्र में केंद्रीकरण ज्यादा मजबूती से हुआ। 1960 के दशक में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के हाथों अपनी राजनीतिक जमीन खोने लगी। पहले भाषायी आधार पर दक्षिण में और फिर जाति आधारित दलों के कारण उत्तर में। इंदिरा गांधी के समय में केंद्र सरकार का विरोध चरम पर पहुंच गया, जिन्होंने 1970 के दशक में दर्जनों स्थानीय सरकारों को बर्खास्त कर दिया था, ताकि या तो क्षेत्रीय दलों को कुचल दिया जाए या फिर उन्हें अंगीकार कर लिया जाए। परिणामस्वरूप उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में कोई आधा दर्जन हिंसक अलगावादी आंदोलनों का जन्म हुआ जिनमें से एक के कारण 1984 में उनकी जान गई।

बहरहाल पिछले 20 वर्षों में भारत राष्ट्रीयता के एक अलग मॉडल की तरफ बढ़ा है। क्षेत्रों और क्षेत्रीय दलों की ताकत आज निर्विवाद है। 1990 के दशक के शुरू से भारत में लाइसेंस परमिट कोटा राज का खात्मा शुरू हुआ और अर्थव्यवस्था को खोला गया। इसका असर यह हुआ कि भारत के संस्थापकों ने देश की जो परिकल्पना की होगी, उससे वह काफी अलग बन गया है। आर्थिक उदारीकरण ने एक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का निर्माण किया है और टेक्नोलॉजी एक राष्ट्रीय संस्कृति का निर्माण कर रही है। क्रिकेट से लेकर बॉलीवुड तक एक साझा लोकप्रिय संस्कृति हर भारतीय के जीवन में झलक रही है। एक और साझा चीज आर्थिक विकास ने देश को दी है। यह है एक शहरी मध्य वर्ग, जिसके हित क्षेत्र, जाति और धर्म की सीमाओं को लांघते हैं।  भारत की ज्यादातर संपदा शहरों और कस्बों में पैदा होती है। शहरी भारत देश के सकल घरेलू उत्पादन का 70 प्रतिशत देता है, लेकिन देश के 70 प्रतिशत लोग आज भी गांव में रहते हैं। ब्राउन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय ने लिखा है कि गांव वह जगह है, जहां वोट है और शहर वह जगह जहां पैसा है।

दशकों तक राष्ट्रीय राजनीतिक दल काम, भोजन और ऊर्जा के लिए भारी सब्सिडी देते रहे हैं, जिसके कारण से बाजार प्रभावित हुए हैं और भारत की बुनियादी आर्थिक समस्याएं ज्यों की त्यों खड़ी रही हैं। भारत के आर्थिक सुधारों के बाद भी ये सब्सिडी आदि की योजनाएं जारी रही हैं और प्रायः अच्छा शासन देने के बजाय इसी मानसिकता को प्राथमिकता दी जाती रही है। ज्यादातर राजनीतिक आभिजात्य वर्ग यही मानता है की भारत तीसरी दुनिया का एक गरीब देश है।

मध्यवर्ग भी इसी धारणा का शिकार है। सरकार से बेहतर स्कूल की मांग करने के बजाय वह अपने बच्चों को कीमती प्राइवेट स्कूलों में भेजता है। पुलिस पर भरोसा करने के बजाय वह अपने घर आदि के लिए सुरक्षा गार्ड की सेवा लेता है। वह चुनाव के लिए खड़ा नहीं होना चाहता और न ही वोट देता है, बल्कि सिंगापुर या अब चीन की तरह अधिनायकवादी शासन व्यवस्था से भी उसे गुरेज नहीं है। लेकिन 20 वर्षों के आर्थिक विकास ने देश को बादल दिया है। आज भारत में 25 करोड़ का मध्यवर्ग है और देश की आबादी का 30 प्रतिशत शहरों में रहता है और यह संख्या भी बढ़ रही है।

वैश्वीकरण ने इस शहरी मध्यवर्ग की अपने से और अपनी सरकार से अपेक्षा बढ़ा दी हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के खुलने से इस वर्ग के सामने एक नया विश्व खुला है—ऐसा विश्व जिसमें भारत जैसे देश तेजी से विकास कर रहे हैं, आधुनिक इन्फ्रॉस्ट्रचर का निर्माण कर रहे हैं और सक्षम सरकारों का गठन कर रहे हैं। अच्छे विचार और कठिन श्रम पर उनका भरोसा है।
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(जाने माने पत्रकार के मैकेंजी एंड कंपनी द्वारा संपादित रीइमेजनिंग इंडिया में प्रकाशित एक लेख के अंश)

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