संभवतः हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच चीन के वुहान में हुई पहली अनौपचापिक शिखर बैठक के नतीजे से वाकिफ है। दोनों नेताओं की उस मुलाकात से दोकलम में चीनी और भारतीय सेना के बीच करीब सत्तर दिनों से चले आ रहे ऐतिहासिक सैन्य टकराव का सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान निकालने में और 1962 के बाद भारत-चीन के बीच दूसरा युद्ध छिड़ने की आशंकाओं को लेकर जारी अनिश्चितता को खत्म करने में मदद मिली थी।
एशिया के दो ताकतवर नेताओं की दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक इस बार भारत की मेजबानी में जम्मू-कश्मीर में हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में हुई है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि कश्मीर मसले पर चीन की नजर है। बीजिंग ने जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने और इस राज्य को दो भागों में विभाजित किए जाने के भारत के फैसले पर सार्वजनिक तौर पर असंतोष और असहमति जताई थी।