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रोजगार के मोर्चे पर परीक्षा

मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Tue, 01 May 2018 06:51 PM IST
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बढ़ती बेरोजगारी
एक ओर तो जीडीपी के बढ़ते आंकड़े दिखाकर सरकार खुश है, वहीं दूसरी ओर बेरोजगारी है कि उसी रफ्तार से बढ़ती जा रही है। अगर उपलब्ध आंकड़ों पर यकीन किया जाए, तो इस समय भारत दुनिया का ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा बेरोजगारी है।



फरवरी महीने के अंत तक के आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल तीन करोड़ 10 लाख लोग बेरोजगार हैं और यह 7.1 फीसदी की दर से बढ़ती जा रही है। अंदाजा है कि इस साल लगभग छह लाख लोगों को रोजगार मिल पाएगा, जबकि मांग इससे कई गुना ज्यादा है।



फिलहाल जिस दर से बेरोजगारी बढ़ रही है, वह चिंताजनक है तथा इसका समाधान तुरंत ढूंढना जरूरी है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों और विदेशी दौरों से जो उम्मीदें लगाई थीं, वे समय की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। उनका बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को उद्योग लगाने का आमंत्रण देना, विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजे खोलना और आर्थिक सुधारों की गति बढ़ाना अभी तक तो निष्फल रहे हैं। 



ऐसा नहीं है कि हालात अभी कुछ वर्षों में ही बिगड़े हैं। इसके लिए कई तत्व जिम्मेदार हैं और इन सभी की परिणति इस रूप में हुई है। सच तो है कि इसके लिए अकेले सरकार ही नहीं, बल्कि प्रशासन, उद्योपतियों का लालच, अदालतों के प्रतिबंधात्मक आदेश, पर्यावरण के नाम पर कड़े कदम वगैरह सभी हैं। सरकार की नीतियां अधूरी थीं। मोदी सरकार ने शुरू में छोटे और मंझोले उद्योंगों की तरफ तो ध्यान ही नहीं दिया, जो देश में कृषि के अलावा 80 फीसदी रोजगार देते हैं। इनके बजाय बड़े उद्योगों को तरजीह दी गई, जिनका इसमें काफी कम योगदान है। 



इतना ही नहीं, ये उद्योग निवेश के मुकाबले रोजगार देने में लघु और छोटे उद्योगों से पीछे भी हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों का जीडीपी में योगदान आठ फीसदी का है और तकरीबन आठ करोड़ लोग उनमें काम करते हैं। नोटबंदी के दौरान इस सेक्टर को सबसे ज्यादा चोट पहुंची थी और बड़े पैमाने पर लघु इकाइयां बंद हो गई थीं। हालांकि उसमें कुछ सुधार हुआ है, लेकिन हालात अभी भी पहले जैसे नहीं हैं। सरकार ने जितना प्रयास बड़े उद्योगों को अपनी ओर आकर्षित करने में किया, उसका दसवां हिस्सा भी इन उद्योगों के लिए करती, तो हालात कुछ और होते।



चीन से आयातित सस्ते सामानों ने यहां के छोटे और मंझोले उद्योगों पर कहर ढाया है। उससे बचाव का रास्ता सही तरीके से नहीं ढूंढा गया। इसी तरह वित्त और टेक्नोलॉजी की भी इस क्षेत्र को कमी रही। चीन की तरह हमने इस दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। 



बेरोजगारी पर काबू पाने में सरकार की विफलता का एक बड़ा कारण भ्रष्टाचार भी रहा। यूपीए दो के शासनकाल में भ्रष्टाचार की वजह से अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, जिसका खामियाजा कामगारों ने भुगता। सैकड़ों उद्योग बंद हो गए और उनके कर्मचारी बेरोजगार हो गए। सबसे बुरा तो खनन उद्योग के साथ हुआ, जहां सुप्रीम कोर्ट ने बड़े पैमाने पर खदानों को बंद करने का आदेश दिया। ताजा मामला है गोवा और कर्नाटक का, जहां पिछले साल अक्तूबर में अदालत के आदेश के बाद लौह अयस्क खदान बंद कर दिए गए।
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इससे खदानों में काम कर रहे सवा लाख लोगों के सामने तो आजीविका का संकट खड़ा हो गया और ट्रांसपोर्ट, जहाजरानी तथा अन्य कामों से जुड़े लोग भी बेरोजगार हो गए। जो लोग कई वर्षों से उन खदानों तथा जुड़े हुए उद्योगों में काम कर रहे थे, वे अब किसी काम के नहीं रहे। अदालत के आदेश के बाद गोवा सरकार भी अससंजस में है। 



अगला कदम क्या हो और लाखों लोगों को उनका रोजगार फिर कैसे दिलाया जाए, इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। खनन पर पूर्ण प्रतिबंध का असर गोवा के बैंकों पर भी पड़ा है। ट्रकों, जहाजों और खनन मशीनों के मालिक बैंकों की किश्तें दे पाने में असमर्थ हैं, जिसका असर यह हुआ कि वहां बैंकों का विस्तार भी रुक गया है। इन खदानों से राज्य सरकार को होने वाली आय भी बंद हो गई, जिससे सरकारी नौकरियों में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। 



यह एक उदाहरण है कि कैसे अदालतों और पर्यावरण विभाग के आदेशों से रोजगार पर बुरा असर पड़ता है। सरकार की गलत नीतियों का खामियाजा वे लोग भुगत रहे हैं, जिनका उनसे कोई मतलब नहीं था। गोवा के इस मामले से सरकार को सबक लेना चाहिए और अपनी नीतियां दुरस्त करनी चाहिए, ताकि गोवा तथा अन्य राज्यों में ठप पड़े खनन उद्योगों को जिंदा किया जा सके और रोजगार तेजी से बढ़ाया जा सके। खनन उद्योग का जीडीपी में योगदान 2.5 फीसदी का रहा है और यह घटकर 1.2 फीसदी हो गया है।



इससे बेरोजगारी बढ़ी है। ऐसा ही एक आदेश राजमार्गों पर शराब की बिक्री से जुड़ा हुआ था, जिसके कारण पूरे देश में लाखों लोग बेरोजगार हो गए थे। दिल्ली में सीलिंग का मामला भी कुछ ऐसा ही है। 



देश में इस समय निजी क्षेत्र बड़े पैमाने पर निवेश नहीं कर रहा है। ऐसे में अब सवाल है कि केंद्र और राज्य सरकारें देश में रोजगार बढ़ाने के लिए क्या कदम उठा रही हैं। क्या उनके पास रोजगार बढ़ाने या सृजित करने की ठोस योजना है? सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान में इतनी बढ़ोतरी हो चुकी है कि अब ज्यादातर राज्य अपने यहां रिक्त पद भरना नहीं चाहते, क्योंकि उसका विपरीत असर उनके बजट पर पड़ेगा। 



रोजगार बढ़ाने के लिए सरकारों को अपने खजाने का मुंह खोलना ही पड़ेगा। सरकारें इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य योजनाओं पर जितना ज्यादा खर्च करेंगी, रोजगार के रास्ते उतने ही खुलेंगे। समय की मांग है कि रोजगार बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश हो, लेकिन पारदर्शिता के साथ।
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