इस वर्ष अर्थशास्त्र का नोबेल अभिजीत बनर्जी एवं अन्य को मिला हैं, जिनके अध्ययन का आधार समावेशी विकास है। इस संदर्भ में भारत के ग्रामीण विकास के समावेशी एप्रोच पर प्रकाश डालना महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद ग्रामीण विकास के लिए दो कार्यक्रम चलाए गए थे-सामुदायिक विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय विकास सेवा। इनके दो उद्देश्य थे-सहभागिता के आधार पर विकास करना तथा ग्रामीण क्षेत्र के लिए हो रही नई खोजों के बारे में ग्रामीणों व किसानों को बताना। पर दोनों कार्यक्रम सफल नहीं हुए, क्योंकि उनमें लोगों की भागीदारी नहीं थी।
ग्रामीण विकास को समावेशी बनाने के लिए पंचायती राज व्यवस्था आरंभ की गई। वर्ष 1993 में 73वें संविधान संसोधन द्वारा पंचायतों को अधिक सशक्त किया गया, ग्रामीण समाज के कमजोर वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। नतीजतन पंचायतों में 31 लाख से अधिक चुने प्रतिनिधि अध्यक्ष एवं सदस्यों के रूप में हैं। क्या ये विभिन्न फोरमों पर कार्य कर रहे हैं या नाममात्र के लिए हैं?
ग्रामीण विकास मंत्रालय का 2018-19 का बजट आवंटन 1,14,915 करोड़ रुपये था। साथ ही 14वें वित्त आयोग द्वारा भी दो लाख से ज्यादा पैसा गांवों में जा रहा है। जहां इस पैसे के प्रयोग में सहभागिता रही है, वहां नतीजे अच्छे आए हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का जिन परिवारों ने इसका लाभ उठाया, उनकी वार्षिक आमदनी इसमें शामिल न होने वाले परिवारों से 22 प्रतिशत अधिक है। जिन गांवों में यह कार्यक्रम लागू था, उनमें उद्यमों की संख्या औसतन 25 थी, जबकि जिन गांवों में यह कार्यक्रम लागू नहीं था, वहां उद्यमों की औसत संख्या मात्र 14 थी। यह कार्यक्रम समावेशी विकास पर आधारित है, जिसमें स्वयं सहायता समूह बनाए जाते हैं, जो सभी निर्णय मिल-जुलकर लेते हैं।
लोगों की सहभागिता कार्यक्रम को प्रभावी बनाती है। पर गांवों में जात-पांत का चलन ग्रामीणों को कहां तक समावेशी प्लेटफार्म उपलब्ध कराता है? क्या पंचायतें यह कमी दूर करती है? गांवों में ग्रामसभा की बैठकें नाममात्र की होती हैं। सारी व्यवस्था सरपंच या प्रधान केंद्रित है, जो नहीं चाहते कि ग्रामीणों की भागीदारी बढ़े। गांवों में एक ‘वर्ग’ उभर कर आया है, जो स्थानीय, ब्लॉक व जिला स्तर की नौकरशाही से तालमेल कर सारी व्यवस्था को हाइजेक किए हुए है। आम ग्रामीण की भागीदारी ग्रामीण विकास में नहीं, पंचायत चुनावों में वोट देने तक है। दलित वर्ग के प्रधान पद खरीद लिए जाते हैं। गोरखपुर जिले का अध्ययन बताता है कि प्रधान पद पर तभी बना रह सकता है, जब वह विभिन्न स्तरों पर बनी पूरी कड़ी (चेन) को कमीशन दे, जो कुल आवंटन का 75 फीसदी होता है। शेष 25 प्रतिशत ही विकास कार्य में लगता है। इस कड़ी में ग्राम सचिव, जूनियर इंजीनियर, ब्लॉक एवं जिला स्तर के कर्मी शामिल हैं।
एक बाधा निचले स्तर पर जरूरत के अनुसार कर्मियों का न होना भी है। सुमित बोस समिति की रिपोर्ट, जो यूनिसेफ द्वारा सात राज्यों के 35 जिलों के अध्ययन पर आधारित है, के मुताबिक, सर्वाधिक खाली पद झारखंड, (25 फीसदी) व राजस्थान (21 फीसदी) में थे। जिला स्तर पर उत्तर प्रदेश में 25 फीसदी पद खाली पडे़ थे। ग्रामीणों के समावेश विकास के लिए जितना पैसा फेंका जा रहा है, उतने की जरूरत नहीं है। जरूरत किसानों, मजदूरों और दस्तकारों के संगठित होने की है, ताकि वे एक एजेंसी बनकर कार्य करें।