श्रावस्ती के नगर सेठ मिगार की पुत्रवधू विशाखा परम विदुषी गृहिणी थी। नगर सेठ अत्यंत कृपण प्रवृत्ति के थे। किसी को दान देना उन्होंने सीखा ही नहीं था। एक दिन नगर सेठ भोजन कर रहे थे। उसी समय एक बौद्ध भिक्षु ने मकान के द्वार पर आकर भिक्षा की मांग की। नगर सेठ ने आवाज सुनी, तो वह क्रोध में कुछ बड़बड़ाने लगे। पुत्रवधू विशाखा ने धीरे से उस भिक्षु से कहा, मुनिवर, मेरे श्वसुर बासी अन्न खा रहे हैं। इसलिए आप किसी अन्य घर से भिक्षा ग्रहण कर लें। नगर सेठ ने विशाखा के ये वचन सुने, तो उनका चेहरा क्रोध में लाल हो उठा। उन्होंने कहा, विशाखा, तूने यह कैसे कहा कि मैं बासी अन्न खा रहा हूं। तूने मेरा अपमान किया है...।
विशाखा ने अत्यंत विनम्रता के साथ हाथ जोड़कर जवाब दिया, पिताश्री, आपको जो संपत्ति मिली है, वह आपके पूर्वजों से मिली है तथा यह सब पहले के पुण्यों का सुफल है। आपने कभी अपना धन सेवा और दान-कार्यों में नहीं लगाया। पूर्वजों के पुण्यों से मिले धन से किया गया भोजन बासी ही तो कहा जाएगा। इसलिए मैंने भिक्षु के प्रति आपके क्रोध को देखकर कह दिया कि वह बासी अन्न खा रहे हैं।
पुत्रवधू के वचन सुनते ही नगर सेठ की आंखें खुल गईं। उसने उसी दिन से अपना धन सेवा, सहायता तथा अन्य धर्म-कार्यों में खर्च करना शुरू कर दिया।