हमारे देश में बच्चों का पोषण और स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए शुरू की गई जिस प्रभावी मध्याह्न भोजन योजना की संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और विश्व बैंक ने काफी प्रशंसा की थी, वह अब हमारी उदासीनता, कुप्रबंधन, गैरजिम्मेदारी, और सर्वोपरि, लालच एवं भ्रष्टाचार के कारण मौत का फंदा बनती जा रही है।
इसकी शुरुआत बिहार से हुई, जहां सरकारी स्कूल के 23 छात्र दोपहर का भोजन खाने से मर गए और छह दर्जन से ज्यादा बच्चे बीमार पड़ गए। छात्रों को जो खाना परोसा गया, उसमें बाजार में बेचे जा रहे मानक उत्पाद से पांच गुना घातक जहरीला कीटनाशक था। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों को तेल के नमूनों, प्लेटों में बचे खाने, खाना बनाने की जगह से पाए गए एल्यूमीनियम के बर्तन आदि में जहरीले कीटनाशक मिले। राज्य सरकार ने अपनी जांच में पाया कि उस स्कूल की प्रधानाचार्य की घोर लापरवाही उन बच्चों की मौत का कारण बनी।
माना जाता है कि स्कूल की महिला प्रधानाचार्य ने कथित रूप से तेल से निकलने वाली तीखी गंध की शिकायत के बावजूद रसोइए को उसी तेल से खाना बनाने के लिए दबाव डाला था। अब नीतीश कुमार की सरकार ने यह फैसला लिया है कि किराये के और जीर्ण-शीर्ण भवनों में स्कूल नहीं चलाया जाएगा तथा नए स्कूलों में रसोईघर होंगे।
यह घोड़ों के भाग जाने के बाद अस्तबल में ताला लगाने का मामला है। भयानक त्रासदी के बाद कमियों को दूर करने के लिए सरकार जागी तो है, पर इसकी जिम्मेदारी लेने से भागते हुए उसने न सिर्फ इस त्रासदी को साजिश बताया, बल्कि निचले स्तर के कर्मचारियों और विपक्षी दलों को इसका जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की! क्या विडंबना है, भयावह त्रासदी हुई, पर मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री ने इसे भाजपा और राजद की साजिश बताया। इससे एक बार फिर यही साबित हुआ है कि सरकार की विफलता के लिए राजनेता अपने विरोधियों को दोषी ठहराने से बाज नहीं आने वाले।
सवाल यह है कि मध्याह्न भोजन की निगरानी करने वाले प्रधानाचार्य के ऊपर के वरिष्ठ अधिकारी क्या कर रहे थे। क्या कभी उन्होंने अनाज और दूसरे खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और बर्तनों की जांच की? अब राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे स्कूलों के बारे में जांच करने का समय आ गया है, जहां ऐसी घटनाएं हुई हैं। यह देखना होगा कि वहां मध्याह्न भोजन तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री के संबंध में क्या निर्देश जारी किए गए हैं।
अगर बिहार की बात करें, तो एक रिपोर्ट के मुताबिक, वहां मध्याह्न भोजन योजना के लिए 700 करोड़ और सरकारी अस्पतालों के उन्नयन के लिए 1,000 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई थी। या तो यह राशि खर्च नहीं की गई या इसका उचित ब्योरा नहीं है कि उसे कैसे खर्च किया गया। यह राशि मध्याह्न भोजन योजना के लिए दिए गए उस 462 करोड़ रुपये से अलग है, जिसे बिहार सरकार ने केंद्र को लौटा दिया था।
बेहतर होता कि नीतीश कुमार इस मामले में दोषियों के नाम का खुलासा करते और बताते कि गरीबों के मासूम बच्चों की हत्या के पीछे उनका उद्देश्य क्या था। अपनी लापरवाही को ढकने के लिए सरकार ने मृतकों के रिश्तेदारों को दो-दो लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की है।
लेकिन मामला सिर्फ बिहार का नहीं है। तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले के एक हायर सेकेंडरी स्कूल में पिछले दिनों मध्याह्न भोजन करने के बाद करीब सौ छात्र बीमार हो गए। तमिलनाडु सरकार ने भी जांच का आदेश दिया है। सरकारें जांच का आदेश इस तरह देती हैं, मानो उन्हें पता ही नहीं कि इस योजना के क्रियान्वयन में क्या-क्या गड़बड़ियां हैं। खाद्यान्न एवं खाद्य मामलों में अनगिनत जांच के आदेश दिए गए हैं, पर कभी कुछ बाहर नहीं आया, क्योंकि नीति-निर्माताओं की सोच स्पष्ट नहीं है।
मध्याह्न भोजन में खराब और सड़ा हुआ भोजन नया नहीं है। यह पिछले कई वर्षों से चल रहा है, क्योंकि हमारे देश में सरकारी नौकरी करने वालों को शायद ही दंडित किया जाता है। किसी भी सरकार में इतनी हिम्मत या इच्छाशक्ति नहीं है कि वह लापरवाह, भ्रष्ट और अपराधियों को दंडित करे। सरकार किसी योजना के बजट और क्रियान्वयन के साथ दंडात्मक उपाय की व्यवस्था करने के लिए कदम नहीं उठाती, ताकि ऐसी आकस्मिक स्थितियां न पैदा हों।
सभी राज्य सरकारों, खासकर बिहार को, दूसरे राज्यों से सीखना चाहिए और मध्याह्न भोजन योजना में अच्छी चीजें अपनानी चाहिए। बिहार की त्रासदी ने कर्नाटक सरकार को मध्याह्न भोजन के गुणवत्ता परीक्षण को फिर से शुरू करने के लिए प्रेरित किया है, ताकि यह तय हो सके कि बच्चों को पोषक आहार दिया जा रहा है। वहां यह अनिवार्य कर दिया गया है कि जब तक स्कूल के दो शिक्षक मौजूद नहीं हों, तब तक बच्चों को खाना नहीं परोसा जाना चाहिए।
बुनियादी ढांचे के मामले पर गौर करने के लिए सरकार एक नई योजना शुरू करेगी, जिसमें भंडारण, रसोई और स्वच्छ पेयजल शामिल है। बच्चों को बढ़िया खाना सुनिश्चित करने के लिए इसमें पोषण विशेषज्ञ, खाद्य निरीक्षक, आहार विशेषज्ञ, चिकित्सक एवं दवा परीक्षण प्रयोगशाला के सदस्य शामिल होंगे। सरकारों को यह याद रखना चाहिए कि जो इतिहास से सबक नहीं लेते, वे निंदा के पात्र बनते हैं। अतीत को बदला नहीं जा सकता, न ही उसे भुलाया या मिटाया जा सकता है, लेकिन उससे सबक सीखकर बेहतर कल की तैयारी तो की ही जा सकती है।