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पढ़ने का संकट: युवा किताबों से दूर न रहें, इनसे अच्छा साथी कोई नहीं

क्षमा शर्मा
Updated Wed, 04 Feb 2026 07:34 AM IST

सार

डिजिटल पढ़ाई बच्चों को आत्मकेंद्रित और चिड़चिड़ा बना रही है। भारत इस मामले में स्वीडन व डेनमार्क जैसे देशों से सबक ले सकता है।
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किताबें सबसे अच्छी साथी है - फोटो : अमर उजाला


पिछले अगस्त में खबर आई थी कि डेनमार्क में सरकार इस बात से चिंतित है कि स्क्रीन की इस दुनिया में क्या अब भी लोग किताबें पढ़ना चाहते हैं। लोगों को किताबों तक वापस लाने के लिए वहां तमाम सामान पर लगाया जाने वाला पच्चीस प्रतिशत टैक्स, जो किताबों पर भी लगाया जाता है, उसे हटा दिया गया। वहां की संस्कृति मंत्री एंजेल स्मिट ने कहा कि हम चाहते हैं कि लोग ज्यादा से ज्यादा किताबें पढ़ें। उन्होंने यह भी कहा कि इन दिनों देश में एक तरह की रीडिंग क्राइसिस है। कोई पढ़ना नहीं चाहता। युवा लोग इसके अधिक शिकार हैं। किताबों पर टैक्स हटाने से वे सस्ती होंगी। युवा भी इनकी ओर आकर्षित होंगे। लोग अधिक से अधिक किताबें पढ़ना चाहेंगे। वैसे भी किताबों से अच्छा साथी कोई होता भी नहीं है। सिर्फ डेनमार्क ही नहीं, अमेरिका में भी यही स्थिति देखी जा रही है कि वहां लोग बहुत कम पढ़ते हैं। पढ़ने का कम कारण मोबाइल फोन और तरह-तरह के स्क्रीन टाइम को बताया जा रहा है। 



स्वीडन ने भी किताबों पर टैक्स कम कर दिया है। भारत में भी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) नहीं लगता, लेकिन किताबें जिस कागज पर छपती हैं, उस पर बारह प्रतिशत और छपाई पर अठारह प्रतिशत जीएसटी लगता है। यानी कि कान इधर से नहीं पकड़ा, उधर से पकड़ लिया। महंगी किताबें कैसे कोई खरीदे, और कैसे पढ़े। हमारे देश को भी इस बारे में बहुत सीखने की जरूरत है। अपने यहां लगातार कहा जा रहा है कि यहां भी पढ़ने की आदतें कम हो रही हैं। क्या बच्चे, क्या युवा, सब ज्यादा से ज्यादा समय मोबाइल पर बिता रहे हैं। हालांकि, हाल ही में दिल्ली में लगे पुस्तक मेले में बीस लाख लोगों की उमड़ी भीड़ ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि लोगों में किताबों के प्रति दिलचस्पी कम हो रही है। अब तक लगे तिरपन पुस्तक मेलों में आने वालों का यह आंकड़ा सबसे ज्यादा है। किताबों की बिक्री भी खूब हुई। लेकिन बहुत से लोगों का यह भी कहना है कि चूंकि इस बार मेले में प्रवेश निःशुल्क था, इसलिए भीड़ ज्यादा थी।  


स्वीडन की तरह अब डेनमार्क में भी स्कूलों में किताबें वापस लाई जा रही हैं। सिर्फ किताबें ही नहीं कॉपी और पेन की वापसी भी हो रही है। वहां की सरकार का मानना है कि डिजिटल पढ़ाई से बच्चों की ध्यान केंद्रित होने की क्षमता कम होती जा रही थी। इसलिए उनके लिए कक्षाओं में किताबें, कॉपियां और पेन हों, इसकी जरूरत को महसूस किया गया। कागज के महत्व को दोबारा स्थापित किया जा रहा है। बहुत से स्कूलों ने मोबाइल फोन को बैन कर दिया है। बच्चों का पढ़ाई करते समय स्क्रीनटाइम कम से कम हो, इसकी योजनाएं बनाई जा रही हैं। कक्षा में विद्यार्थी और शिक्षक के आपसी तालमेल को भी रेखांकित किया जा रहा है। जबकि एक जमाने में डेनमार्क को डिजिटल चैंपियन कहा जाता था। वहां 2011 से ही स्कूलों में पूरी तरह से डिजिटलाइजेशन कर दिया गया था। 


कागज मुक्त समाज की बात की जा रही थी। लेकिन सरकार ने पाया कि इससे बच्चों के सीखने की क्षमता तो कम हो ही रही है, उन्हें तमाम तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों ने भी घेर लिया है। वे किसी भी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। अब वहां माना जा रहा है कि तकनीक का उपयोग ठीक है, लेकिन बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए स्कूलों में तकनीक से दूरी भी जरूरी है। किसी भी चीज की अति, चाहे वह तकनीक ही क्यों न हो, खतरनाक होती ही है। स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों ने अपने बच्चों के बारे में सोचा और त्वरित निर्णय लिया। लेकिन हमारे यहां तो इन दिनों बहुत से दल अपने-अपने घोषणा पत्रों में इस बात का वादा करते रहते हैं कि वे जल्द से जल्द हर छात्र को लैपटॉप देंगे। मोबाइल देंगे। बच्चों और युवाओं को ये सुविधाएं मिलें, वे इन पर काम करना भी सीखें, लेकिन ये अति नुकसानदेह हैं, इसे हम स्वीडन और डेनमार्क से सीख सकते हैं।
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