दशहरा हमारे सांस्कृतिक जीवन का एक बड़ा हिस्सा है। यह पर्व नैतिकता और सत्य का संस्कार देता है और बुरे विचारों एवं अहंकार से दूर रहने का ज्ञान देता है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी को सही रास्ते पर चल कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित व प्रोत्साहित करता है। बचपन से ही मैं इस पर्व को बड़ी निष्ठा से समाज में मनाते हुए देखता आ रहा हूं। मैं ओडिशा से आता हूं, वहां हमारे घरों में दुर्गा पूजा के अवसर पर कौलिक पूजा के रूप में विद्या की पूजा होती थी, क्योंकि विद्या भी हमें सशक्त ही करती है।
हमारे जो भी भारतीय पर्व-त्योहार हैं, उसके प्रतीकात्मक अर्थ होते हैं। जैसे रावण के दस सिर थे, तो इसका मतलब है कि रावण के जो दस दिमाग थे, उसमें अच्छे-बुरे दस तरह के विचार थे। मनुष्य भी बहुत सारे विचारों के साथ जीता है। बहुत सारे विचारों के होने का मतलब है कि व्यक्ति बौद्धिक है। बौद्धिक होना, विद्वान होना अच्छी बात है, लेकिन उसका अहंकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि जब विद्वान होने का अहंकार चढ़ जाता है, तो आप अराजकता एवं अनैतिकता की तरफ बढ़ने लगते हैं। संस्कृत में कहा गया है कि 'अतिदर्पे हतो लंका।' अर्थात रावण के अति घमंड ने सोने की लंका का विनाश कर दिया। रावण भी बहुत बड़ा विद्वान था। अपने तपोबल से उसने बहुत सिद्धियां हासिल की थीं। लेकिन अहंकार और अनैतिकता उसके विनाश का कारण बनीं।
दूसरी तरफ, राम की जीवन-यात्रा देखें, तो उनका जीवन संघर्षों से भरा था। जीवन भर उन्होंने संघर्ष किया, कष्ट सहा। कहा गया है-रावण रथी विरथ रघुवीरा। उनके पास तो रावण से लड़ने के लिए रथ भी नहीं था, साधनहीन थे वह। लेकिन उनके पास नैतिक बल था। सच्चाई, विनम्रता और नैतिकता के बल पर उन्होंने रावण जैसे शक्तिशाली महारथी को परास्त कर दिया। तो कहने का तात्पर्य है कि आप विद्वान हैं, शक्तिशाली हैं, तो उसका उपयोग समाज की भलाई के लिए कीजिए, न कि किसी के प्रति अत्याचार करने के लिए। अगर अपनी शक्ति के बल पर समाज में अराजकता फैलाएंगे, निर्बलों पर अत्याचार करेंगे, तो आपका विनाश होना तय है। राम की संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा हमें बताती है कि भले ही उन्होंने काफी कष्ट सहा, लेकिन उसके पीछे समाज की भलाई का उद्देश्य था। उन्होंने अहिल्या से लेकर सुग्रीव और शबरी तक कइयों का उद्धार किया।
राम और रावण-दो व्यक्तित्व-दो चरित्र के माध्यम से दशहरा का उत्सव हमें सामाजिक भलाई के लिए जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह आपके संस्कार और संस्कृति को जागरूक रखता है। यही वजह है कि भारतीय सभ्यता की दुनिया भर में एक अलग पहचान है, जिसकी झलक हमें हमारे पर्व-त्योहारों में मिलती है। यह उत्सव हमें सामूहिकता का पाठ पठाती है। हम मिल-जुलकर दशहरे का उत्सव मनाते हैं। मैं नाटक की पृष्ठभूमि से आता हंू, जो सामूहिक कर्म है। नाटक में कई विद्याओं का समाहार होता है। इसमें साहित्य है, संगीत है, नृत्य है, ललित कला है, सौंदर्यबोध है यानी बहुत कुछ है।
नाटक करना आसान नहीं होता है। देवी मां की कृपा के बिना यह संभव नहीं है। मां का आशीर्वाद होता है, तभी हम प्रस्फुटित होते हैं। रामचंद्र जी को भी देवी मां की उपासना से ही शक्ति मिली। स्वस्थ दिमाग के लिए भी देवी मां का आशीर्वाद चाहिए। देवी मां का आशीर्वाद नैतिकता, न्याय के प्रति पक्षधरता, विनम्रता और ईमानदारी से मिलेगा। जिस दिन हम यह सब हासिल कर लेंगे, समाज अपने-आप बदल जाएगा, देश बदल जाएगा। विकसित मस्तिष्क होगा, तो विकसित भारत बनेगा। दशहरा का उत्सव हमें यही संदेश देता है।