पूरे देश के कुपोषित, नाटे, कम वजन वाले और खून की कमी से ग्रसित बच्चों का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश में है। सरकारी रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के 48 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। राज्य में गरीबों के घरों में शौचालय तेजी से बन रहे हैं, पर बच्चों का कुपोषण दूसरी कहानी बयान कर रहा है। कुछ ही दिन पहले जालौन जिले के आता क्षेत्र में एक दलित लड़की के साथ बलात्कार हुआ, उसे मार भी डाला गया। बताया जा रहा है कि वह घर से बाहर अंधेरे में शौच करने निकली थी, जब उसे घसीट लिया गया था।
पिछले महीने गोरखपुर से सटे कुशीनगर जिले में भूख और कुपोषण से नौ मौतों की खबर आई, जिनमें पांच साल की एक बच्ची भी थी। जब उन गांवों में पत्रकार पहुंचे, तो पता चला कि शौचालय काम ही नहीं कर रहे थे और शौच के लिए लोग खुले में जाते थे। राशन न मिलने की भी बड़ी समस्या बताई गई। बाल शिक्षा और पोषण सुनिश्चित करने के लिए सरकारी प्राथमिक स्कूलों में दिन का भोजन सरकार की तरफ से दिया जाता है। इस खर्च का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार से मिलता है।
कई सरकारें वर्षों से बच्चों को अंडा भी खिला रही हैं। सरकारी संस्थाओं की राय है कि अंडा खिलाना कुपोषण से निपटने का सबसे आसान तरीका है। ओडिशा के मुख्यमंत्री ने अंडे को मिड डे मील में शामिल करते हुए कहा था कि दाल, चावल, रोटी सब्जी की चोरी की जा सकती है, पर अंडे के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता। बच्चों को अंडा खिलाने वाले तमाम राज्यों में अंडा न खाने वाले बच्चों को केला दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश में भी बच्चों को अंडा मिलने लगा था, पर योगी जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अंडा बंद कर दिया गया। अधिकतर भाजपा-शासित राज्यों में यही स्थिति है। इसका असर बच्चों के स्वास्थ्य पर जरूर पड़ता होगा। मजे की बात यह है कि बच्चों को अंडा खिलाने से परहेज करने वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अन्य योजना के तहत कुपोषण दूर करने के लिए बुंदेलखंड के गांवों के गरीब घरों में मुर्गियां बांटी थीं। गरीबों के लिए मुर्गी पालना बहुत मुश्किल है। उस पर बुंदेलखंड में पानी की जबर्दस्त कमी है। नतीजतन ज्यादातर मुर्गियां मर चुकी हैं। मिर्जापुर के एक स्कूल से खबर आई कि बच्चों को रोटी के साथ नमक दिया जा रहा था। एक पत्रकार ने इसका वीडियो बनाकर उसे वायरल कर दिया, तो हड़कंप मच गया। बच्चों के खाने में सुधार हुआ या नहीं, इसका पता तो नहीं चल पा रहा, लेकिन पत्रकार पर संगीन धाराओं के अंतर्गत मुकदमा ठोक दिया गया। कुछ लोगों ने यह कहने की कोशिश की कि मामला साजिश से प्रेरित है, पर स्कूल में पढ़ने वाले एक बच्चे के पिता ने बताया कि इससे पहले बच्चों को चावल-नमक भी खिलाया जा चुका है।
उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में मिड डे मील योजना का क्रियान्वयन अजीब है। बलिया के एक स्कूल में दलित बच्चे अलग बैठकर खाना खाते हैं और सवर्ण बच्चे घर से अपने बर्तन लाते हैं। जब इसकी जांच करने कुछ दलित नेता पहुंचे, तो जिलाधिकारी ने उन्हें अपमानित किया, हालांकि बाद में उन्होंने माफी भी मांगी। बलिया के ही एक अन्य स्कूल से जानकारी मिली कि वहां मुस्लिम बच्चों को पत्तल में खाना परोसा जाता है और अन्य बच्चों को थालियों में। लगता है कि उत्तर प्रदेश के बच्चे केवल कुपोषण के ही शिकार नहीं हैं। उन्हें स्कूलों मे रोटी-नमक के साथ सांप्रदायिकता और जातीय-भेद भाव भी परोसे जा रहे हैं।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।