टैगोर की तरह ही प्रोफेसर बेते दुनिया और शेष भारत के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं। उन्होंने अपना डॉक्टरेट फील्ड वर्क तमिलनाडु के तंजावुर में किया था। उनके अपने शोधार्थियों में मुंबई से एक बंगाली, जमशेदपुर से एक तमिल, लद्दाख पर काम करने वाले एक कन्नड़ और कर्नाटक पर काम करने वाला एक पंजाबी था। वे अपने मार्क्स और वेबर, इवांस-प्रिचर्ड, लेवी स्ट्रॉस और नेहरू और आंबेडकर को भी बहुत अच्छी तरह जानते और समझते हैं। मैंने अपनी किताब ‘डेमोक्रेट्स एंड डिसेंटर्स’ में प्रोफेसर बेते की विद्वता के बारे में लिखा है। मैं उनसे पहली बार 1988 में मिला था और तब से हम एक-दूसरे के संपर्क में हैं। उनके लेखन और हमारे बीच होने वाली बातचीत ने देश के प्रति मेरे सोचने के तरीके को एक नया आकार दिया है। एक बार मैंने आंद्रे बेते को भारत का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति कहा था, हालांकि वह एक लापरवाही वाला निर्णय था। हो सकता है कि उस समय भारत में कोई बुद्धिमान महिला हो या विदेश में कोई बुद्धिमान भारतीय रहता हो। जब हम पहली बार मिले थे, तब वे एक ही नौकरी में 30 साल गुजार चुके थे और मैं 7 साल में 4 नौकरियां बदल चुका था। मैं बहुत जल्दी में था, लेकिन वे शांत थे। मैं विद्वानों के बीच विवादास्पद बहस का पक्षधर था, चाहे बातचीत में हो या लेख में। वे हमेशा संयमित रहते थे। मैं युवा था और मेरी सोच उनसे बिल्कुल अलग थी। शायद यही वजह थी कि वे मुझसे घुल-मिल गए और हमारी बातचीत को एक नई दिशा मिली।
जब राजीव गांधी जीवित थे, तब आंद्रे ने मुझसे कहा था कि जवाहरलाल नेहरू की मरणोपरांत प्रतिष्ठा ने बाइबिल की एक प्रसिद्ध उक्ति को उलट दिया है। इस मामले में पिता के पापों का फल उनके बच्चों और पोतों पर पड़ने के बजाय उनकी बेटियों और उनके पोतों के पाप उल्टे उन पर आ गए। कहने का मतलब यह कि नेहरू ने गणतंत्र को बनाने में जो योगदान दिया, वह सब उनके वंशजों की गलतियों की वजह से नष्ट हो गए। जब सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी राजनीति में आए तो आंद्रे बेते की टिप्पणी की बुद्धिमत्ता और भी स्पष्ट हो गई।
आंद्रे ने नियमित रूप से मीडिया के लिए लिखा और विवादित व्याख्यान भी दिए। वे खुद को एक विद्वान के रूप में ही देखते थे, न कि एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि “मीडिया आकर्षण न केवल विद्वता का दुश्मन है, बल्कि यह नैतिक अखंडता के लिए भी खतरा है।” उनकी किताबें और शोध पत्र, कक्षाओं में दिए गए व्याख्यान और शोधार्थियों की निगरानी उनकी विद्वता को दिखाते हैं, न कि अखबारों में छपे उनके आर्टिकल्स। उनकी समाजशास्त्रीय विशिष्टता ने उन्हें राज्य की विशेष नीतियों की आलोचना करने में सक्षम बनाया, लेकिन कभी भी वैकल्पिक नीतियों की पेशकश नहीं की। आंद्रे अक्सर नीतियों का विश्लेषण तो करते हैं, लेकिन नीति निर्धारित नहीं करते।
प्रोफेसर बेते राजधानी दिल्ली में रहते हैं, लेकिन अन्य बुद्धिजीवियों के विपरीत उन्होंने कभी किसी प्रभुत्व वाले व्यक्ति से दोस्ती करने या उसे प्रभावित करने की कोशिश नहीं की। उनका काम शोध करना, लिखना और पढ़ाना है, न कि मंत्री या विपक्षी नेताओं के कान में सलाह देकर स्वयं को राजगुरु बताना। किसी ने उन्हें प्रकाशन या राजनीतिक पार्टियों में नहीं देखा होगा। ऐसा नहीं है कि उन्हें अपने काम के अलावा किसी अन्य चीज में रुचि नहीं है, उनकी तीन भाषाओं में कविता उनके स्थायी प्रेम में से एक है, अंग्रेजी में इलियट और मैक्नीस, फ्रेंच में मल्लार्मे, बंगाली में टैगोर और जिबनानंद दास उनके प्रिय कवि हैं।
अपने स्वभाव के कारण आंद्रे बेते को लगा कि मैं सार्वजनिक क्षेत्र में बहुत ज्यादा सक्रिय हूं, बहुत ज्यादा भाषण देता हूं, अक्सर टेलीविजन पर दिखाई देता हूं और बिना बात के विवादों में पड़ जाता हूं। 2012 की गर्मियों में मैं एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गया, जिसमें मेरी कई हड्डियां टूट गईं और मुझे ठीक होने के लिए कई महीनों तक बिस्तर पर आराम करना पड़ा। यह सुनकर आंद्रे ने लिखा, “मुझे लगता है कि आपकी दुर्घटना एक छिपे हुए आशीर्वाद के रूप में आई है। मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि इसका आपके लेखन पर प्रतिकूल प्रभाव क्यों पड़ना चाहिए। वास्तव में, इसका आपके लेखन पर लाभकारी प्रभाव होना चाहिए। इससे आपको अपनी यात्रा और व्याख्यान कम करने और सोचने तथा लिखने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए समय मिलना चाहिए। मुझे लगता है कि आप अपने और लेखन के भले के लिए बहुत ज्यादा यात्रा और बकवास कर रहे हैं। आपके बहुत बड़े प्रशंसक और चचेरे भाई इतिहासकार धर्म कुमार मुझसे कहते थे कि मेरे पास बहुत ज्यादा अनुशासन और बहुत कम कल्पना है। मैं वास्तव में मानता हूं कि आपको भी अपनी सोच और लेखन में अधिक अनुशासन की जरूरत है और यह तभी आ सकता है, जब आप एक जगह बैठकर सोचें और लिखें।” कुछ साल पहले मैं बंगलूरू में भारत के पुराने मित्र मार्क टुली से मिला, जिन्होंने अपना पूरा जीवन उपमहाद्वीप में बिताया है। मैंने आंद्रे को लिखा, “टुली ने मुझसे पूछा था कि क्या मैं भी आपको जानता हूं? वह आपको एक ऐसे सच्चे विद्वान के रूप में याद करते हैं, जो रेडियो पत्रकारिता को प्रिंट पत्रकारिता से कमतर मानते हैं और प्रिंट पत्रकारिता को विद्वत्ता से कमतर। आप बेशक दोनों ही मामलों में सही हैं!”
उनके आलोचक अक्सर इस बात की शिकायत करते हैं कि आंद्रे बेते के पास सिर्फ एक ही विषय है, हालांकि उनका विषय विस्तृत और बेहद महत्वपूर्ण है, जैसे कि समाज में असमानता का लगातार बढ़ना। उन्होंने तमिल गांवों में जाति पर, कृषि की वर्ग संरचना पर, पूर्व और पश्चिम में असमानता के तुलनात्मक विश्लेषण पर, पिछड़े वर्गों के उत्थान पर, सामाजिक न्याय के दावों और संस्थागत अखंडता के बीच तनाव पर किताबें लिखी हैं। स्तरीकरण को केवल आर्थिक कारकों पर आधारित मानने के बजाय उन्होंने स्थिति और शक्ति के आयामों का भी अध्ययन किया है।
आंद्रे बेते के लेखन की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी। उनके कामों से अपरिचित पाठकों को उनके अखबारी लेखों के संग्रह ‘क्रॉनिकल्स ऑफ आवर टाइम’ से शुरुआत करनी चाहिए। उनके बारे में ज्यादा जानने की इच्छा करने वाले लोग ‘कास्ट, क्लास एंड पावर’, ‘सोसायटी एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया’ और ‘द आइडिया ऑफ नेचुरल इनईक्वैलिटी एंड अदर एसेज’ को पढ़ सकते हैं। अंत में, मैं उनके अखबारी लेखों के एक अन्य संग्रह के बारे में कहूंगा, जिसका शीर्षक है, ‘आइडियोलॉजी एंड सोशल साइंस’।