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महान इतिहास के बिना कनाडाई सहज और व्यावहारिक हो सकते हैं

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 20 Oct 2019 03:57 AM IST
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रामचंद्र गुहा

सितंबर के महीने में मैं चार देशों में रहा। महीने की शुरुआत मैंने अपनी मातृभूमि भारत से की, जो कभी खुद के बारे में सोचता था कि उसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसा के जरिये स्वतंत्रता हासिल कर अन्य पूर्व उपनिवेशों को रास्ता दिखाया था। आज उसके नेता इतिहास का स्मरण अतीत में कुछ और पीछे जाकर कर रहे हैं। कुछ पृथ्वीराज चौहान और शिवाजी द्वारा किए गए मुस्लिम शासकों के प्रतिकार को याद कर रहे हैं, तो कुछ को गुप्त वंश और अन्य लोगों की महानता याद आ रही है।

जो लोग आज भारत में शासन कर रहे हैं, उनके वैचारिक गुरु दिवंगत एम एस गोलवलकर थे, जो कि पूरे पैंतीस वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख रहे। पूर्व सरसंघचालक की जिन हठधर्मिताओं के कारण उनके अनुयायियों ने उन्हें दिल से अपनाया, उनमें उनकी यह मान्यता शामिल है कि अपने गौरवशाली इतिहास के कारण हिंदू ही भविष्य में दुनिया पर राज करेंगे। गोलवलकर ने दावा किया था कि 'विश्व को एकजुट करने का अकेले हिंदुओं का विचार ही मानवीय भाईचारे के लिए स्थायी आधार बन सकता है।' विश्व नेतृत्व, उन्होंने आगे दावा किया कि, 'एक दैवीय विश्वास है, हम कह सकते हैं कि नियति ने हिंदुओं को इसकी जिम्मेदारी दी है।'



भारत से मैं इंग्लैंड गया, जिसके राजनेता इसी तरह से निरंतर अपने देश की अतीत की उपलब्धियों का आह्वान कर रहे हैं। मसलन, ब्रिटेन संसदों की मातृभूमि है, ब्रिटेन औद्योगिक क्रांति में अग्रणी था, ब्रिटेन शेक्सपीयर और डार्विन की जन्मस्थली है, ब्रिटेन अकेला ऐसा देश था, जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजियों का विरोध किया था- इस देश की आत्मछवि ऐसी है कि इसने अतीत में दुनिया को महान चीज सिखाई थी; और अब भी यह दुनिया को कुछ चीजें सिखा सकता है। 

सितंबर के अंत में मैं अमेरिका में था, जिसके मौजूदा राष्ट्रपति ने 2016 में अमेरिका को फिर से महान देश (टू मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) बनाने के वादे के साथ चुनाव जीता था। बड़ी संख्या में अमेरिकी इस विश्वास का निरंतर समर्थन करते हैं कि यह एक महान इतिहास वाला देश है। रूमानी अमेरिकियों के लिए उनका देश उस समय की तुलना में कभी महान नहीं रहा, जब उसके संस्थापकों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र किया और लोकतंत्र के पथप्रदर्शक रास्ते का अनुसरण किया। प्रगतिशील अमेरिकियों के लिए उनका देश विशेष रूप से फ्रैंकलीन डेलानो रूजवेल्ट और उनकी 'न्यू डील'(आर्थिक और सामाजिक सुधार से संबंधित कार्यक्रम) के समय महान था। संकीर्णतावादी अमेरिकियों के लिए उनका देश उस समय शीर्ष पर था, जब रोनाल्ड रीगन ने सोवियतों को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया और शीत युद्ध में विजय हासिल की थी। वैचारिक मतभेदों के बावजूद ये सभी अमेरिकी विश्वास करते हैं कि उनका देश हमेशा मानवता की आखिरी और सर्वश्रेष्ठ उम्मीद है और बना रहेगा।

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रामचंद्र गुहा
सितंबर के महीने में मैं चार देशों में रहा। महीने की शुरुआत मैंने अपनी मातृभूमि भारत से की, जो कभी खुद के बारे में सोचता था कि उसने महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसा के जरिये स्वतंत्रता हासिल कर अन्य पूर्व उपनिवेशों को रास्ता दिखाया था। आज उसके नेता इतिहास का स्मरण अतीत में कुछ और पीछे जाकर कर रहे हैं। कुछ पृथ्वीराज चौहान और शिवाजी द्वारा किए गए मुस्लिम शासकों के प्रतिकार को याद कर रहे हैं, तो कुछ को गुप्त वंश और अन्य लोगों की महानता याद आ रही है।

जो लोग आज भारत में शासन कर रहे हैं, उनके वैचारिक गुरु दिवंगत एम एस गोलवलकर थे, जो कि पूरे पैंतीस वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख रहे। पूर्व सरसंघचालक की जिन हठधर्मिताओं के कारण उनके अनुयायियों ने उन्हें दिल से अपनाया, उनमें उनकी यह मान्यता शामिल है कि अपने गौरवशाली इतिहास के कारण हिंदू ही भविष्य में दुनिया पर राज करेंगे। गोलवलकर ने दावा किया था कि 'विश्व को एकजुट करने का अकेले हिंदुओं का विचार ही मानवीय भाईचारे के लिए स्थायी आधार बन सकता है।' विश्व नेतृत्व, उन्होंने आगे दावा किया कि, 'एक दैवीय विश्वास है, हम कह सकते हैं कि नियति ने हिंदुओं को इसकी जिम्मेदारी दी है।'

भारत से मैं इंग्लैंड गया, जिसके राजनेता इसी तरह से निरंतर अपने देश की अतीत की उपलब्धियों का आह्वान कर रहे हैं। मसलन, ब्रिटेन संसदों की मातृभूमि है, ब्रिटेन औद्योगिक क्रांति में अग्रणी था, ब्रिटेन शेक्सपीयर और डार्विन की जन्मस्थली है, ब्रिटेन अकेला ऐसा देश था, जिसने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजियों का विरोध किया था- इस देश की आत्मछवि ऐसी है कि इसने अतीत में दुनिया को महान चीज सिखाई थी; और अब भी यह दुनिया को कुछ चीजें सिखा सकता है। 

सितंबर के अंत में मैं अमेरिका में था, जिसके मौजूदा राष्ट्रपति ने 2016 में अमेरिका को फिर से महान देश (टू मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) बनाने के वादे के साथ चुनाव जीता था। बड़ी संख्या में अमेरिकी इस विश्वास का निरंतर समर्थन करते हैं कि यह एक महान इतिहास वाला देश है। रूमानी अमेरिकियों के लिए उनका देश उस समय की तुलना में कभी महान नहीं रहा, जब उसके संस्थापकों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से देश को स्वतंत्र किया और लोकतंत्र के पथप्रदर्शक रास्ते का अनुसरण किया। प्रगतिशील अमेरिकियों के लिए उनका देश विशेष रूप से फ्रैंकलीन डेलानो रूजवेल्ट और उनकी 'न्यू डील'(आर्थिक और सामाजिक सुधार से संबंधित कार्यक्रम) के समय महान था। संकीर्णतावादी अमेरिकियों के लिए उनका देश उस समय शीर्ष पर था, जब रोनाल्ड रीगन ने सोवियतों को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया और शीत युद्ध में विजय हासिल की थी। वैचारिक मतभेदों के बावजूद ये सभी अमेरिकी विश्वास करते हैं कि उनका देश हमेशा मानवता की आखिरी और सर्वश्रेष्ठ उम्मीद है और बना रहेगा।

अमूमन मैं लंदन के रास्ते से अमेरिका जाता हूं। इस बार मैं कनाडा होकर गया। सितंबर में मैं जिन चार देशों में गया, उनमें से यही एक ऐसा देश है, जो शानदार और प्रभावी अतीत होने का अहंकार नहीं करता। दुनिया को शून्य, योग या प्लास्टिक सर्जरी कनाडा ने नहीं दी; न तो किसी कनाडाई ने उद्भव का सिद्धांत दिया या बिजली का आविष्कार किया; न ही कनाडाइयों ने दुनिया के अमीर लोकतंत्र की स्थापना की जहां बेहिसाब नोबेल पुरस्कार विजेता पैदा करने वाले दुनिया के महान विश्वविद्यालय स्थित हैं।

मैं पहले भी कई बार कनाडा गया हूं। अपनी हर यात्रा में इस जगह के लिए मेरे मन में अनुराग बढ़ता जाता है। इसका एक शांत और सादगी भरा चरित्र है, जो कि इसके दंभी दक्षिणी पड़ोसी से एकदम उलट है। कनाडाई दंभी नहीं होते; हालांकि तथ्य यह है कि उनके पास अहंकार करने की बड़ी वजहें हैं। उनके पास अच्छे सरकारी विश्वविद्यालय और शानदार सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा है। श्वेत सर्वोच्चता और नस्लीय समाज वाले अतीत से बाहर निकलकर वे अब बहु सांस्कृतिक समाज बनने की दिशा में अग्रसर हैं। वहां वेस्ट इंडियंस, दक्षिण एशियाई और चीनी प्रवासी अन्य पश्चिमी देशों के प्रवासियों की तुलना में कहीं अधिक बेहतर ढंग से एकीकृत हो चुके हैं। हालांकि अपने मूल निवासियों के प्रति उनका व्यवहार बहुत अच्छा है, और वे अमेरिकियों के विपरीत कम से कम अपराधबोध भी महसूस करते हैं।

कनाडा की मेरी हाल की यात्रा के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि जिन देशों के पास आह्वान करने के लिए अपना महान वास्तविक या मिथकीय इतिहास नहीं होता, वे शायद उन देशों से सौभाग्यशाली होते हैं, जिनके पास ऐसा इतिहास होता है। बोरिस जॉनसन के खुद को विंस्टन चर्चिल जैसा मानने या फिर नरेंद्र मोदी के समर्थकों द्वारा अपने नेता को नए शिवाजी या नए हिंदू ह्रदय सम्राट समझने से शायद ही इग्लैंड और भारत को आज मिल रही ढांचागत चुनौतियों को सुलझाने में कोई मदद मिल सकती है। शानदार और गौरवशाली अतीत का यह विचार चौथे देश अमेरिका में भी जारी है, जहां मैं सितंबर के महीने में गया था। और जरा रूस के बारे में विचार कीजिए जहां पुतिन खुद को नए पीटर द ग्रेट समझ रहे हैं, या तुर्की जहां एर्डोगन खुद को एक ऑटोमन सुलतान समझ रहे हैं। या ईरान जहां के नेताओं में फारसी अतीत को लेकर विचलित कर देने की हद तक अहंकार व्याप्त है या फिर चीन जिसके नेता पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि उनकी प्राचीन सभ्यता की महानता विश्व की महाशक्ति के रूप में उसके आसन्न उभार को संभव बनाती है।
 

कनाडाई लोगों को सोमवार 21 अक्तूबर को आम चुनाव में वोट डालना है। सितंबर के आखिर में मैं जब वहां था तो चुनाव प्रचार अपने चरम पर था और सारी प्रतिद्वंद्वी पार्टियां इसमें जुटी हुई थीं। मौजूदा लिबरल प्रधानमंत्री पर दोहरेपन का आरोप लगाया जा रहा था, क्योंकि अतीत में उन्होंने एक बार नस्लीय कृत्य किया था। इसके जवाब में लिबरल मतदाताओं को आगाह कर रहे थे कि यदि कंजरवेटिव चुनकर आ जाते हैं, तो स्वास्थ्य और शिक्षा के सरकारी खर्च में तेजी से गिरावट आ जाएगी। इस बीच, नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी और ग्रीन पार्टी कनाडाइयों से कह रही थीं कि वे दो मुख्य पार्टियों से बाहर निकलकर उनकी ओर भी देखें।

रेखांकित करने वाली बात यह है कि चुनाव प्रचार में अतीत की राष्ट्रीय (वास्तविक हों या फिर मिथकीय) उपलब्धियों को मुद्दा नहीं बनाया जा रहा था। किसी भी नेता ने कनाडा को फिर से महान बनाने की बात नहीं की। अगले प्रधानमंत्री के रूप में चाहे जो भी चुना जाए वह कनाडा के संसद भवन की सीढ़ियों में सिर नहीं झुकाने वाला है और न ही आठ सौ वर्ष की दासता की भरपाई करने का वादा करने वाला है। न ही वह प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों को याद करने वाला है ( हालांकि तथ्य यह है कि कनाडाई सैनिकों ने इन्हें जीतने में मदद की थी और ब्रिटिश को खासतौर से इसे याद करने की जरूरत है)।

कनाडाई सहज और व्यावहारिक हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास ऐसा महान अतीत नहीं है, जिस पर वे अहंकार करें। वे अपनी अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने, कहीं अधिक देखभाल करने वाले समाज के निर्माण और अपने विश्वविद्यालयों तथा अस्पतालों को और बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। हमारे पास उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ है, यहां तक कि तब भी जब वे हमें इस बारे में कुछ भी न बताएं।
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