मेघनाद से युद्ध के दौरान लक्ष्मण मूर्च्छित हो गए, तो हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाकर उनकी बेहोशी दूर की। तंद्रा टूटने पर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, भ्राता, मूर्च्छित होना अकारण नहीं हो सकता। शास्त्रों में अठारह दोष बताए गए हैं, जिनके कारण प्राण संकट में पड़ जाते हैं। तुमने जाने-अनजाने किसी की झोंपड़ी को नुकसान तो नहीं पहुंचाया? किसी को निमंत्रण देकर बिना भोजन कराए तो नहीं लौटा दिया? कभी किसी गाय को चरने या पानी पीने से तो नहीं रोका? कभी किसी का अनजाने में धन तो नहीं हड़प लिया? इस तरह श्रीराम ने एक-एक कर अठारह दोषों के बारे में लक्ष्मण से पूछा।
लक्ष्मण ने कहा, भ्राताश्री, मैंने उपरोक्त दोषों में एक भी नहीं किया, परंतु तीन दोषों के कारण मुझे प्राणों का संकट झेलना पड़ा। पहला दोष था, आप स्वर्ण मृग के पीछे गए और मुझे सीता की रखवाली का दायित्व सौंप गए, परंतु मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया। दूसरा, मैंने निर्दोष भरत पर संशय किया और तीसरा निद्राजित होते हुए भी एक दिन मैं सूर्योदय के बाद तक वन में सोता रहा।
भगवान श्रीराम ने कहा, नित्य नैमित्तिक कर्म में चूक करना भी पाप है। सूर्य की ओर मुंह करके थूकना भी अधर्म है। किसी के बगीचे से बिना पूछे फल-फूल तोड़ना, दूध पीते बछड़े को गाय से अलग करना, वृक्षों में आग लगाना आदि भी घोर पाप कर्म हैं।