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राहुल बनाम मोदी की लड़ाई

नीरजा चौधरी Updated Sun, 22 Jul 2018 06:36 PM IST
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मोदी-राहुल

पिछले दिनों संसद में नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव गिर गया और सदन ने 126 के मुकाबले 325 मतों से सरकार में अपना विश्वास व्यक्त किया। इस बहस के दौरान कांग्रेस ने जहां खुद को मुख्य विपक्षी दल के तौर पर स्थापित किया, वहीं भाजपा ने इसका इस्तेमाल अपने कामकाज की उपलब्धियों के गुणगान और राहुल गांधी तथा कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक तेवर दिखाने के लिए किया। इस तरह बहस मुख्यतः राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी होकर रह गई और बाकी सारे मुद्दे गौण हो गए। आंध्र प्रदेश का मुद्दा गौण हो गया, जिसे लेकर तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई थी, तो क्षेत्रीय विपक्षी दलों की एकजुटता का मुद्दा भी गौण हो गया। अपनी उपलब्धियों के गुणगान के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहस के दौरान सोनिया, राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ जोरदार हमला बोला।



 लेकिन अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान जो कुछ हुआ, उससे आने वाले दिनों में राजनीति किस तरह से आगे बढ़ेगी, उसके बारे में कुछ दिलचस्प संकेत मिलते हैं। खासकर क्षेत्रीय पार्टियों के साथ क्या संबंध हो सकते हैं, जो कि 2019 के लिए निर्णायक होंगे। कुल मिलाकर एनडीए के नंबर अपेक्षा से ज्यादा रहे, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी शिवसेना मतदान से बाहर रही। एनडीए के नंबर में बढ़ोतरी का मुख्य कारण है-अन्नाद्रमुक। जयललिता की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक भाजपा का सहयोग करती रही है और अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान भी उसने सरकार के पक्ष में मतदान किया। पर सवाल उठता है कि क्या 2019 के चुनाव में अन्नाद्रमुक भाजपा के साथ जाएगी। इसके बारे में ठीक-ठीक कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में रजनीकांत भी कूद पड़े हैं। हो सकता है कि भाजपा वहां रजनीकांत का पल्लू पकड़कर अपने लिए नई जगह बनाने की कोशिश करे।


दूसरा संकेत जो मिलता है, वह यह कि शिवसेना, बीजद और टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान अनुपस्थित रहीं। इन पार्टियों ने मतदान से बाहर रहकर परोक्ष रूप से सरकार की ही मदद की है। हालांकि सरकार यह मान रही थी कि शिवसेना उसके पक्ष में मतदान करेगी और ऐसे संकेत भी मिले थे, लेकिन जिस व्हिप ने सरकार के पक्ष में मतदान का निर्देश दिया था, पार्टी ने उसकी ही छुट्टी कर दी। जाहिर है, ऐसा उद्धव ठाकरे के इशारे पर हुआ होगा। इससे यही संकेत मिलता है कि शिवसेना और भाजपा के बीच में सौदेबाजी हो रही थी, लेकिन शिवसेना जैसा चाहती थी, वैसा नहीं हो पाया, तो उसने यह रास्ता अपनाया। इसलिए शिवसेना के रवैये से लगता है कि वह 2019 के मद्देनजर भाजपा को अपना तेवर दिखा रही है और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में खुद को वरिष्ठ सहयोगी के रूप में पेश करने के लिए उच्च स्तरीय सौदेबाजी करेगी, लेकिन वह अभी भाजपा के साथ ही है।


दूसरी तरफ आपको याद होगा कि टीआरएस ने सबसे पहले महागठबंधन के लिए ममता बनर्जी से बात की थी, लेकिन उसी टीआरएस ने भाजपा की मदद करने के लिए मतदान से वॉकआउट किया। उसके रवैये से लगता है कि वह भाजपा के खिलाफ नहीं है, लेकिन 2019 में वह चुनाव से पहले भाजपा से हाथ नहीं मिलाना चाहेगी, क्योंकि उसका जनाधार मुस्लिम मतों पर पर निर्भर करता है। लेकिन चुनाव के बाद अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो वह उसके साथ सहयोग कर सकती है।

 

लेकिन सबसे अजीब रवैया बीजद का था, उसने भी वॉकआउट करके भाजपा की मदद की, जबकि ओडिशा में भाजपा उसे सबसे बड़ी चुनौती दे रही है। इससे पता चलता है कि बीजद यह सोच रही है कि केंद्र में चाहे जिसकी भी सरकार आए, वह उसके साथ संबंध रखेगी और उसे न तो भाजपा से मतलब है और न ही कांग्रेस से। चूंकि आज भाजपा सत्ता में है, इसलिए वह उसके साथ सहयोग कर रही है। अन्नाद्रमुक, बीजद और टीआरएस, तीनों का लगभग यही रवैया था।


लेकिन असली नुकसान भाजपा को टीडीपी का हुआ है। वह आंध्र के बंटवारे के कारण कांग्रेस के खिलाफ रही है, और भाजपा की सबसे मजबूत सहयोगी थी, लेकिन वह उसे छोड़कर अलग चली गई है और वही अविश्वास प्रस्ताव लाई थी। स्पष्ट है कि राजनीतिक रूप से टीडीपी का एनडीए से बाहर होना भाजपा के लिए बड़ा नुकसान है और जो क्षेत्रीय पार्टियां अभी उसकी सहयोगी हैं, वे आगे ज्यादा सौदेबाजी करेंगी। शिवसेना भी पूरी तरह घर वापस नहीं आई है, यानी भाजपा को आगे सहयोगी दलों को भाव देना होगा। प्रधानमंत्री ने क्षेत्रीय पार्टियों के प्रति कड़ा रवैया नहीं अपनाया, बल्कि उनको चेतावनी देते रहे कि कांग्रेस से बचिए। उन पार्टियों को उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया। अविश्वास प्रस्ताव पर बहस से एक और चीज दोबारा निकल कर आई कि विपक्षी दलों का महागठबंधन बनना बहुत मुश्किल है। टीआरएस और टीडीपी के बीच, ममता और वामदलों के बीच समस्या है। शरद पवार ने तो यह कह ही दिया है और अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के एक दिन बाद ममता बनर्जी ने फिर से कोलकाता में सिर्फ फेडरल फ्रंट बनाने की बात कही।

 

राहुल गांधी ने विपक्षी नेता के तौर पर सरकार पर बहुत आक्रामक हमला बोला और लोगों ने उसे पसंद भी किया। कुछ लोगों ने तो यह भी कहा कि 'दे मारा'। जाहिर है, राहुल का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ दिखा और उन्होंने यह दिखाया कि मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ही है। इस तरह से 2019 का चुनाव राहुल बनाम मोदी होने वाला है, जिसका भाजपा फायदा उठाना चाहेगी। लेकिन आक्रामक भाषण और गले मिलने (हालांकि बेहतर होता कि उन्होंने आंख नहीं मारी होती, क्योंकि आजकल टीवी सब कुछ पकड़ लेता है) से पता चलता है कि राहुल सही दिशा में तो बढ़ रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी, नरेंद्र मोदी, से टक्कर लेने के लिए और फासला तय करना होगा। यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। 

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