अपने राजनीतिक पंडित के साथ मैं आजकल जब मिल-बैठकर गप्पें मारती हूं, तो अक्सर हममें से कोई न कोई मजाक में कह देता है कि नरेंद्र मोदी की सबसे ज्यादा मदद अगर कोई कर रहा है, तो वह हैं राहुल गांधी। भाजपा के किसी भी राजनेता ने मोदी की इतनी मदद नहीं की है अभी तक, जितनी बेचारे राहुल ने अनजाने में की है। यकीन नहीं आता, तो सुनिए कैसे-कैसे, कितनी-कितनी बार मोदी की सहायता की है राहुल गांधी ने, और वह भी यह सोचकर कि उनका विरोध कर रहे हैं।
पहली मदद कांग्रेस के उपाध्यक्ष ने की है इस तरह कि अब भी भाषण ऐसे देते हैं, जैसे राजनीति में अभी-अभी आए हों। याद कीजिए, कितना फायदा उठाया नरेंद्र मोदी ने, जब राहुल गांधी ने अपनी ही सरकार के अध्यादेश को कूड़ेदान में फेंकने की बात कही थी। ऊपर से जब कोई नया भाषण, कोई नया वक्तव्य आता है उनकी तरफ से, मोदी को देर नहीं लगती है उसका करारा जवाब देने में। इस बयानबाजी में मोदी अक्सर जीतते हैं। उदाहरण है मोदी की मुंबई वाली आम सभा से, जिसमें उन्होंने अपने भाषण में राहुल गांधी का नाम लिए बिना उनका मजाक उड़ाया यह कहकर कि आजकल कांग्रेस के बड़े नेता भ्रष्टाचार को खत्म करने की बातें करते हैं...पता नहीं कैसे!
फिर हम, जिनका काम है दिल्ली की राजनीतिक गलियों में घूमना, अच्छी तरह जानते हैं काफी दिनों से कि राहुल गांधी के करीबी सलाहकारों के सामने एक ही लक्ष्य है ः मोदी को बदनाम करना इतना कि लोकसभा चुनाव से पहले ही वह हार जाएं। इस लक्ष्य को पूरा करने के चक्कर में महीनों से कोशिश रही है। इशरत जहां की हत्या की जिम्मेदारी उनके सिर थोपने की तमाम कोशिश रही है, तो उधर जाकिया जाफरी को पूरी मदद मिलती रही है अपने पति की हत्या का दोष मोदी पर व्यक्तिगत तौर पर लगाने की।
पिछले सप्ताह इस शृंखला में नई कड़ी जुड़ गई। केंद्र सरकार ने निर्णय लिया कि आयोग बिठाया जाएगा उस महिला जासूसी वाले मामले की जांच कराने के लिए, जिसमें माना जाता है कि नरेंद्र मोदी का सीधे तौर पर हाथ था। यह वही किस्सा है दोस्तो, जिसमें एक महिला की जासूसी गुजरात सरकार कर रही थी किसी 'साहेब' के कहने पर। गुलेल वेबसाइट के पत्रकार और कांग्रेस, दोनों का मानना है कि जिस साहेब के निर्देश पर पुलिसवाले उस महिला की जासूसी कर रहे थे, वह गुजरात के मुख्यमंत्री खुद थे।
सो इल्जाम है मोदी पर कि उन्होंने उस महिला पर नाजायज निगरानी रखी और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया। आयोग बनाने का फैसला जब केंद्र सरकार ने सुनाया, तो कांग्रेस की महिला राजनीतिज्ञों को काम सौंपा गया इस निर्णय को सही ठहराने का। टीवी पर आईं वरिष्ठ महिला कांग्रेसी नेताओं ने कहा कि यह मामला महिलाओं के अधिकारों का है और कुछ नहीं।
वाह क्या बात है! जिन महिलाओं ने पिछले साल निर्भया के बलात्कार और दर्दनाक मौत के समय अपनी शक्ल तक नहीं दिखाई थी, आज आई हैं, महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने। और क्या जांच आयोग बिठाने का फैसला लिया जा सकता था बिना राहुल गांधी की इजाजत के? वह भी उस समय, जब कांग्रेस उनको पेश करने जा रही है अपने प्रधानमंत्री के रूप में? यकीन करना मुश्किल है।
आपने भी देखा होगा कि अब कितना दिखने लग गए हैं कांग्रेस के युवराज। कभी उद्योगपतियों के सम्मेलन में पहुंच जाते हैं, तो कभी युवाओं से बातें करते हैं। आजकल तो पत्रकारों से भी मिल लेते हैं पहले से कहीं ज्यादा। इसलिए कि कांग्रेस को एहसास हो गया है मोदी की बढ़ती लोकप्रियता को देखकर कि अगर उनकी तरफ से प्रधानमंत्री का नाम घोषित नहीं होता है, तो मोदी का मुकाबला करना कठिन हो सकता है। फिर लोकसभा चुनाव में भाजपा के विजय रथ को रोकना संभव नहीं होगा। लेकिन अगर नरेंद्र मोदी को बदनाम किया जा सकता है लोकसभा चुनाव से पहले ही, तो कांग्रेस के लिए इससे अच्छी बात नहीं हो सकती। राहुल गांधी के सलाहकार जानते हैं कि बिना नरेंद्र मोदी के भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को न तो कड़ी चुनौती दे सकती है और न ही केंद्र की अगली सरकार बनाने की उम्मीद रख सकती है।