जब तक झूठी शान के नाम पर की जाने वाली हत्याओं को राज्य के खिलाफ अपराध नहीं घोषित किया जाता, और इनसे निपटने के लिए विशेष प्रावधान नहीं किए जाते, तब तक इस अफसोसनाक सिलसिले को थामा नहीं जा सकता। गौरतलब है कि पिछले सात वर्षों में इसी सम्मान के नाम पर पाकिस्तान में तीन हजार जानें ली जा चुकी हैं। औरत फाउंडेशन द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक इन तीन हजार महिलाओं में से ज्यादातर की हत्या खुद उनके ही परिवार के सदस्यों ने की। इन महिलाओं की छोटी-सी जिंदगी और हैरतअंगेज मौतों का ब्योरा बेहद हल्के ढंग से पाकिस्तानी अखबारों के पिछले पृष्ठों में मिलता है। इनमें से कोई बेटी थी, तो कोई बहन, सभी को अपनों ने ही मार दिया गया, कुछ को पत्थरों से कुचलकर और कुछ को जिंदा जलाकर। इनका कुसूर सिर्फ इतना था, कि इन्होंने खुद पर मालिकाना हक समझने वाले अपने पति, पिता या भाई की मर्जी के खिलाफ अपनी इच्छा जाहिर करने की जुर्रत की। ऐसे में, बार-बार होने वाली पहले से कहीं ज्यादा भयावह और निर्दयी हत्याओं की ओर उन महिलाओं का ध्यान जाना स्वाभाविक है, जिन पर फिलहाल यह गाज नहीं गिरी है।
फरजाना परवीन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। लाहौर उच्च न्यायालय के बाहर जिस बर्बरता के साथ पत्थर मार कर उनकी हत्या की गई, उससे राष्ट्र की चेतना आहत हुई है। फरजाना अपनों से सुरक्षा की मांग लेकर अदालत के पास गई थी। ये वह लोग थे, जो उसके निकाह के खिलाफ थे, और उसकी मौत चाहते थे, और ऐसा ही हुआ। फरजाना उन तीन हजार महिलाओं की सूची में शामिल हो गई, जिनके खून को उनके हत्यारों ने अपने सम्मान की बहाली का जरिया बना लिया। अदालत की शरण में फरजाना परवीन यह बतलाने आई थी कि वह कोई वस्तु नहीं है। मगर इससे पहले कि वह अदालत के सामने पहुंच सके, उसके परिवार ने उसकी हत्या कर दी। पिछले बुधवार को एक दूसरी अदालत ने फरजाना के पिता और भाई को उसकी हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाई, मगर यह तय है कि फैसले के पालन में देरी के चलते इसे आजीवन कारावास में बदल दिया जाएगा। पत्थर फेंकने के आरोप के चलते दो अन्य व्यक्तियों को भी दस वर्ष के कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई है। कहा जा सकता है कि इन न्यायिक फैसलों ने फरजाना परवीन मामले को न्यायसंगत अंजाम तक पहुंचा दिया है, मगर फिर भी कई ऐसी प्रक्रियागत खामियां अभी बरकरार हैं, जिनका फायदा ऐसे तीन हजार अन्य मामलों में हत्यारों ने उठाया है, और भविष्य में भी उठाते रहेंगे।
फरजाना के मामले में उसकी ओर से एक सरकारी वकील ने आरोप पत्र दर्ज किया। इसके बाद ही फरजाना के कातिलों को पकड़ा, और फिर सजा दिलाई जा सकी, क्योंकि अदालत में मामला पहुंचने के बाद यह मुमकिन नहीं रह गया था, कि फरजाना का परिवार इसे पारिवारिक मामला बताते हुए, दोषियों को माफ कर दे। पाकिस्तान में ऑनर किलिंग को रोकने के लिए फरजाना का मामला एक नजीर बन सकता है। मगर ऐसा करने के लिए उस विधेयक में बदलाव करना जरूरी होगा, जिसमें परिवारजनों के जरिये हत्यारों को माफी देने की व्यवस्था है। दरअसल, इस विधेयक के प्रावधान उन्हीं परिस्थितियों में तर्कसंगत कहे जा सकते हैं, जहां जिसकी हत्या हुई हो, और हत्यारा, दोनों ही अलग-अलग परिवारों से ताल्लुक रखते हों, और तभी दया और माफी जैसी बातों का मतलब है। ऑनर किलिंग से जुड़े अपराधों में ऐसी कोई बात नहीं होती। अगर एक व्यक्ति के पुत्र ने उसकी पुत्री का कत्ल किया हो, तो कानूनी रूप से पिता को अपने पुत्र को क्षमा करने का अधिकार नहीं होगा।
जाहिर है, पाकिस्तान में जिंदगी आसान नहीं है, खासकर महिलाओं के लिए। तीन हजार महिलाओं की हत्याओं से इसकी तस्दीक होती है। पाकिस्तान में महिलाओं की हत्या इतनी सामान्य चीज है कि ऐसे कांड के दौरान मौजूद लाखों लोग बेहद स्वाभाविकता के साथ ठंडी सांस छोड़ते हुए मूक दर्शक बने रहते हैं। मगर केवल आंखे मूंद लेने से लोगों के पाप कम नहीं हो सकते। महिलाओं को वस्तु नहीं, बल्कि इंसान माना जाए, उन्हें समान नागरिक का दर्जा मिले, बराबर संवैधानिक अधिकार मिलें और राष्ट्र निर्माण में उनकी समान भागीदारी हो, इसके लिए जरूरी है कि पाकिस्तान में ऐसे अपराधों में सजा का निर्धारण देश के कानून के तहत हो, और ऐसे हर मामले में, हर बार इसी कानून का ही पालन हो।
(द अपस्टेयर्स वाइफः एन इंटिमेट हिस्ट्री ऑफ पाकिस्तान की लेखिका और पाकिस्तानी अखबार डॉन की स्तंभकार)