अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लोगों के साथ भेदभाव न सिर्फ उन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक रूप से कमजोर बनाता है, बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालता है। सामाजिक रूप से किए जाने वाले भेदभाव का सबसे वीभत्स रूप है, गांवों में पानी को लेकर अनुसूचित जाति के लोगों के साथ जानवरों-सा बर्ताव।
भारतीय समाज की जाति व्यवस्था ने गांवों के कुओं को सामाजिक भेदभाव, बहिष्कार और बीमारियों को फैलाने का केंद्र बना दिया है। भेदभाव के कारण सवर्णों की अपेक्षा इस वर्ग की आबादी डायरिया, कालरा, मलेरिया, फाइलेरिया जैसी जल जनित बीमारियां की चपेट में ज्यादा आती है।
वाटरएड इंडिया की फेलो रिसर्च अनुसूचित जाति के लोगों व वंचितों के खराब स्वास्थ्य के कारणों की पड़ताल करती है। वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़े भी अप्रत्यक्ष तौर पर भारत में जल वितरण में असंतुलन के कारण दलितों के खराब स्वास्थ्य की ओर इशारा करते हैं।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, सामान्य तौर पर अनुसूचित जाति के लोगों को पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण उनका स्वास्थ्य खराब रहता है। महिलाएं थकावट, कमजोरी और रक्त अल्पता से ग्रसित रहती हैं। भारत में 80 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी है। लगभग 20 प्रतिशत महिलाएं कद में काफी छोटी रह जाती हैं। कुपोषित गर्भवती महिला के साथ प्रसव के समय कुछ गंभीर जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं। जैसे खून का बहना, संक्रमण या नवजात शिशु का छोटा व कमजोर पैदा होना।
गरीबी, जमीन का न होना, रहन-सहन की निम्न परिस्थितियों के साथ ही गांवों में अनुसूचित जाति के लोगों को शुद्ध पानी मिलने में परेशानी के कारण समाज के कमजोर वर्गों खासकर महिलाओं का पोषण स्तर खराब रहता है, जो स्वस्थ्य समाज के विकास में बाधा है। शुद्ध जल तक आसान पहुंच नहीं होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं में कुपोषण सबसे अधिक समस्या है।
वाटरएड इंडिया की फेलो रिसर्च बुंदेलखंड पर केंद्रित होने के साथ ही पूरे देश में अनुसूचित जाति के लोगों की स्थिति को बयां करती है। बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों के गांवों में स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब है। लगातार सूखे की मार झेलने वाले इस इलाके में अनुसूचित जाति के लोगों को पानी के लिए कुछ ज्यादा ही संघर्ष करना पड़ता है।
बुंदेलखंड में करीब 70 से 80 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है। गांवों में निवास करने वाले करीब 25 से 30 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी के साथ हर स्तर पर भेदभाव किया जाता है। बुंदेलखंड में 66 अनुसूचित जाति व जनजातियां सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं, जिनमें मुख्यतः अहिरवार, गौतम, डोमार, जाटव, वाल्मीकि, छोड़ा आदि जातियां शामिल हैं।
बुंदेलखंड के गांवों की संरचना सवर्ण बहुल है। यहां 50 से 70 प्रतिशत सवर्ण और करीब 30 प्रतिशत अनुसूचित और शेष अन्य जातियां हैं। अनुसूचित जाति के बीच काम करने वाले एक मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में अनुसूचित जाति की करीब पचास फीसदी आबादी पानी के स्रोतों से वंचित है। जबकि इस वर्ग के 20 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को शुद्ध पानी तक नसीब नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, विगत एक दशक में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ होने वाले अपराध में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
वर्ष 2006 से 2016 के बीच पूरे देश में अनुसूचित जाति के लोगों व आदिवासियों से जुड़े पांच लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में सबसे ज्यादा मामले अनुसूचित जाति के लोगों के साथ छोटी-मोटी लड़ाइयों से जुड़े हैं, जो यह बताता है कि अभी भी इस वर्ग के साथ छोटी-छोटी बातों पर मारपीट करना या भेदभाव करना सामान्य बात है।