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प्रौद्योगिकी: मनुष्य से निजात क्यों चाहिए, कृत्रिम बुद्धि पर ढेर सारे अगर-मगर

क्षमा शर्मा
Updated Fri, 12 May 2023 06:51 AM IST

सार

बताया जा रहा है कि एक दिन कृत्रिम बुद्धि मनुष्य से आगे निकल जाएगी और मानवता का सर्वनाश कर देगी।
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Artificial Intelligence - फोटो : Istock


पाठकों को याद होगा कि पिछले दिनों कुछ कंप्यूटरों ने अपनी कोड भाषा विकसित कर ली थी और वे आपस में संदेशों का लेन-देन कर रहे थे, तब वैज्ञानिकों ने उन्हें नष्ट कर दिया था। हाल ही में आए चैटजीपीटी से अन्य कामों के साथ-साथ आप अपनी किताब तक लिखवा सकते हैं। हॉलीवुड में टर्मिनेटर, प्रिडेटर जैसी कई फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें तकनीक को मनुष्य से अधिक ताकतवर दिखाया गया है।


कई बार लगता है कि अगर सचमुच ये बातें सही हो जाएंगी, तो बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां चली जाएंगी। अभी से बड़ी-बड़ी कंपनियां तकनीक के सहारे हजारों लोगों को निकाल रही हैं। वह दिन दूर नहीं है, जब मनुष्यों के स्थान पर रोबोट नौकरियां करेंगे, क्योंकि उन्हें न तो छुट्टी चाहिए और न ही हर साल का इन्क्रीमेंट, बोनस और अन्य कोई सामाजिक सुरक्षा। थकान की कोई शिकायत भी नहीं। इसलिए कंपनियां इसे एक बेहतरीन विकल्प मान रही हैं, लेकिन इस विचार में आफत भी छिपी हुई है।


आपको उस राजा की कहानी तो याद होगी, जिसने वरदान मांगा था कि जिस चीज को भी हाथ लगाए, वह सोने की हो जाए। जब तक वह हर सामान को हाथ लगा-लगाकर सोने का बनाता रहा, तब तक तो बहुत खुश था, लेकिन जैसे ही रोटी को हाथ लगाया, वह सोने की हो गई और राजा का जीवन खतरे में पड़ गया। इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक तरह से ऐसी ही प्रविधि है, जो मनुष्यों का अहित ही करेगी।


अब जरा कल्पना कीजिए कि दुनिया में हर काम कृत्रिम बुद्धिमत्ता से हो रहा है, हर उद्योग-दफ्तर में वही छाए हुए हैं, मनुष्य का कहीं नामोनिशान नहीं है! सुनने में यह बात बड़ी रोमांचक और विज्ञान का अनोखा विकास लगती है। लेकिन जब मनुष्य के पास रोजगार नहीं होगा, तो वह न तो खरीदार होगा और न ही अच्छा उपभोक्ता, क्योंकि उसकी जेब में पैसे नहीं होंगे, जिनसे कुछ भी खरीदा जा सके। ऐसे में उद्योग अपने-अपने उत्पाद भला किसको बेचेंगे! मशीनें न तो खाती हैं, न पीती हैं, न उन्हें कहीं जाना है, न घूमना है, न जूते चाहिए, न मोबाइल फोन, न दवाएं, न अनाज, न दूध, न मक्खन, न ब्रेड, न मिठाई न पकवान, न यूनियन। यानी मनुष्यों ने जो दुनिया अपने लिए बनाई है, वहां उनकी अपनी जरूरतों के जितने भी काम-काज हैं, उनकी जरूरत मशीनों को होगी नहीं। ऐसे में मुनाफा तो क्या, उद्योग एक के बाद एक बैठ जाएंगे। जब खरीदार ही नहीं होगा, तो किसके लिए उद्योगों में उत्पादन होगा, कैसे वे चलेंगे। ऐसे में कंपनियां मनुष्य को कार्यस्थलों से हटाते-हटाते अपने पतन की गाथा खुद लिखेंगी।


व्यापार जगत को मनुष्य के दिमाग, उसकी मांगों, जरूरतों से हमेशा समस्या रही है, लेकिन जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता को बहुत खुशी से विकसित किया जा रहा है और उसका जश्न मनाया जा रहा है, वह फ्रेंकेस्टाइन साबित होगा यानी भस्मासुर बन जाएगा, तब क्या होगा। कोई कह सकता है कि यह दूर की कौड़ी है, लेकिन जो बातें सोची जाती हैं, वे आगे-पीछे सच भी हो जाती हैं। आज से कुछ दशक पहले तक इसकी कल्पना भी मुश्किल थी कि कभी मोबाइल आएगा और आप हर वक्त दूसरे से संपर्क में रह सकेंगे या कि चिट्ठियों के लंबे इंतजार के मुकाबले मेल, मैसेज से संदेश पहुंचाना चुटकियों का खेल होगा। अगर कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकसित करने वाले ही इसकी भविष्य की ताकत से डरे हुए हैं, तो उनका यह डरना अकारण नहीं है। विज्ञान की दुनिया जब से मुनाफा बढ़ाने वाली तरकीब बनी है, तब से ऐसी परिकल्पना अजूबा नहीं है, जहां हम अपने ही बनाए जाल में खुद उलझ जाएं और समझ न पाएं कि आखिर उससे कैसे निकलें।

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