पिछले एक दशक में शहरों को जोड़ने के लिए विश्व-स्तरीय एक्सप्रेसवे और चमचमाते कॉरिडोर बनाए गए हैं। दिल्ली से लखनऊ या बंगलूरू से हैदराबाद की दूरी पहले कभी इतनी सुगम, तेज या बेहतर रोशनी वाली नहीं थी। हालांकि, सड़कों का आधुनिकीकरण हो गया है, लेकिन उन पर चलने वाले वाहन, खासकर सार्वजनिक परिवहन, ‘चलता है’ युग के ही अवशेष बने हुए हैं। ज्यादातर सार्वजनिक और निजी बसें खराब रखरखाव, बेतरतीब ढंग से बदलाव और खतरनाक रूप से कम नियंत्रण वाली होती हैं। नतीजतन हाईवे पर बस में आग लगने जैसी भयावह त्रासदियां देखने को मिलती हैं।
पहले भी ऐसी घटनाएं होती थीं। वर्ष 2013 में आंध्र प्रदेश में एक वोल्वो स्लीपर बस में आग लग गई थी, जिसमें 45 लोगों की सोते हुए ही मौत हो गई थी। ऐसे ही हादसे 2022 में नासिक में, और हाल ही में राजस्थान में हुए थे। कहानी डरावनी है, एक चिंगारी, बिजली का शॉर्ट सर्किट, या ओवरलोड डीजल लाइन; दरवाजे जाम और फंसे हुए यात्री। हर घटना के बाद कुछ दिनों तक आक्रोश, संवेदना और जांच संबंधी बयान आते हैं और फिर सन्नाटा छा जाता है, जब तक कि कोई दूसरी त्रासदी न हो।
भारत की विकास गाथा का विरोधाभास यह है कि सड़कें अब उन पर चलने वाले वाहनों से ज्यादा सुरक्षित हैं। राजमार्ग चमकते हैं, पर उन पर चलने वाली बसें अक्सर घिसे हुए तारों, पतले टायरों, या बिना मंजूरी वाले स्लीपरों के सहारे चलती हैं, जिनकी सीटें दमघोंटू बक्से में तब्दील हो गई हैं। कई निर्माता ऐसी सामग्री का इस्तेमाल करते हैं, जो ज्वलनशीलता और अग्नि सुरक्षा के बुनियादी वैश्विक मानकों का भी उल्लंघन करते हैं। ऐसे में एक चिंगारी इन्सान की प्रतिक्रिया से भी तेजी से फैल सकती है।
यूरोपीय संघ के यूएनईसीई विनियमन 118 के अनुसार, यात्री बसों में इस्तेमाल होने वाली हर सामग्री (चाहे सीट हो या केबल) को कठोर अग्नि-प्रतिरोधक और गलन परीक्षणों से गुजरना होगा। अमेरिका भी इसी तरह के मानदंडों का पालन करता है, जो आपातकालीन निकास और चालक प्रशिक्षण को भी नियंत्रित करते हैं। जिस बस में अग्निरोधी आंतरिक सज्जा नहीं होती, वह न तो कारखाने से बाहर निकलती है और न ही सड़कों पर चलती है। भारत में प्रमाणन प्रणाली अपूर्ण है और उसका प्रवर्तन और भी कमजोर। नियम तो मौजूद हैं, लेकिन भारत की अनौपचारिक परिवहन अर्थव्यवस्था के साथ उनका संपर्क शायद ही कभी टिक पाता है, जहां वाहनों को उनके मूल सुरक्षा डिजाइन से कहीं अधिक रंगा जाता है, तार बदलकर फिर से लगाए जाते हैं। विडंबना यह है कि मोटर वाहन अधिनियम सुरक्षा को कानूनी आवश्यकता बताता है, लेकिन सड़क अक्सर गति और लाभ को महत्व देती है।
फिर भी, कई राज्यों में संस्थागत इच्छाशक्ति की झलक दिखाई देती है। जैसे, उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की अग्निशमन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के आधुनिकीकरण को आगे बढ़ाया है। महाकुंभ 2025 से पहले सरकार ने रेत, कीचड़ और भीड़भाड़ वाले इलाकों में काम करने में सक्षम फ्लोरीन-मुक्त रासायनिक फोम सिस्टम से लैस अग्निशमन वाहनों की शुरुआत की है।
एक्सप्रेसवे पर नियमित अंतराल पर छोटे अग्निशमन केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। ये प्रशासनिक तौर पर छोटी-मोटी बातें लग सकती हैं, लेकिन ऐसे संकट में, जहां सेकंड में ही जिंदगी और मौत का फैसला होता है, प्रतिक्रिया की गतिशीलता मायने रखती है। लेकिन लाखों लोगों को ले जाने वाले बस संचालक यात्रियों की सुरक्षा के प्रति कब सचेत होंगे? एक हवाई दुर्घटना की खबरें लंबे समय तक सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन राजमार्गों पर होने वाली ये बस दुर्घटनाएं एक छोटी-सी खबर से ज्यादा कुछ नहीं होतीं। क्या ऐसा इसलिए है, कि बसों का इस्तेमाल करने वाले लोग आम तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं? जब विदेशी पर्यटक दिल्ली से जयपुर या आगरा, जैसे वैश्विक पर्यटन स्थलों तक बस से जाते हैं, तो बसें बेहतरीन होती हैं। यदि आरामदायक नहीं, तो कम से कम सुरक्षा मानकों का तो ध्यान रखा ही जाना चाहिए।
कुछ राज्य परिवहन निगम सख्त निरीक्षण कार्यक्रम चलाते हैं। लेकिन ज्यादातर अंतर-शहरी यात्री बसें निजी हैं और बहुत कम मुनाफे पर चलती हैं। फिटनेस जांच एक यांत्रिक रस्म है; तारों और ईंधन प्रणालियों पर शायद ही कभी विशेषज्ञों का ध्यान जाता है। ध्यान अगली यात्रा पर होता है, अगली त्रासदी पर नहीं। इन बसों में सवार यात्री शायद ही कभी आपातकालीन निकास द्वार या अग्निशामक यंत्रों की जांच करते हैं। कई तो यह भी नहीं जानते कि वे कहां हैं। हमें उदासीनता की इस संस्कृति को खत्म करना होगा। सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।
हर बस पर अंतिम अग्नि-सुरक्षा निरीक्षण तिथि उसी तरह प्रदर्शित होनी चाहिए, जैसे रेस्टोरेंट में स्वच्छता रेटिंग प्रदर्शित की जाती है। ड्राइवरों और कंडक्टरों के लिए आपातकालीन निकास का अभ्यास अनिवार्य होना चाहिए। फिर से सुधार किए गए वाहनों को अग्नि प्रतिरोध के लिए पुनः प्रमाणित किया जाना चाहिए और अग्निशामक यंत्र ड्राइवर की सीट के पास सजावटी नहीं होने चाहिए, बल्कि वे सुलभ, कार्यात्मक और नियमित रूप से बदले जाने चाहिए। अब किफायती अग्नि-संकेतक सेंसर उपलब्ध हैं, जो ड्राइवरों को बढ़ती गर्मी या बिजली की खराबी के बारे में सचेत कर सकते हैं। वैश्विक अग्निरोधी मानकों को पूरा करने वाली सामग्रियां भारत में उपलब्ध हैं; बस जरूरत है कि हमारे निर्माताओं को इनका उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। राज्य परिवहन परमिट या बीमा छूट को अंतरराष्ट्रीय अग्नि सुरक्षा मानदंडों या समकक्ष भारतीय कानून के अनुपालन से जोड़ सकते हैं।
हम बसों में आग को नियति मान बैठे हैं, जबकि यह सभी आपदाओं में सबसे ज्यादा रोकी जा सकने वाली आपदा है। आग सिर्फ इसलिए नहीं जान लेती कि वह जलाती है, बल्कि इसलिए भी कि व्यवस्था उसे ऐसा करने देती है। कुरनूल त्रासदी को राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा में एक ऐसे सुधार का प्रारंभिक बिंदु बनना चाहिए, जो बुनियादी ढांचे की महत्वाकांक्षा के साथ-साथ मानव जीवन की महत्वाकांक्षा से भी मेल खाती हो। अगर एक्सप्रेसवे भारत की प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उन पर यात्रा करने वाले लोग बिना डर के गंतव्य तक पहुंच सकें।