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परीक्षा से बड़ा प्रश्न: सवाल राजनीतिक जीत-हार का नहीं, परीक्षा प्रणाली पर युवाओं का भरोसे लौटना अहम

अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Sat, 25 Jul 2026 08:37 AM IST
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नीट पेपर लीक के कारण छात्रों में आक्रोश - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

नीट प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर युवाओं के आक्रोश और देशभर में फैलते विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार ने संवाद का रास्ता अपनाकर तनाव कम करने की दिशा में पहल की है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर बना गतिरोध बता रहा है कि संकट अभी टला नहीं है।



सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई बातचीत, प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर दर्ज मुकदमे वापस लेने पर सहमति, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त करना, प्रधानमंत्री मोदी से मिला कठोर कानून का आश्वासन और संबंधित अधिकारियों पर की जा रही कार्रवाइयां निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत हैं। लेकिन, यह भी उतना ही स्पष्ट है कि इस पूरे विवाद का समाधान तभी हो सकता है, जब युवाओं के उस भरोसे को बहाल किया जाए, जो बार-बार सामने आ रही परीक्षा संबंधी अनियमितताओं की वजह से गहरे तक प्रभावित हुआ है।


प्रश्नपत्र लीक लाखों युवाओं के मन में संदेह पैदा करता है कि उनकी सफलता का निर्धारण मेहनत नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरियां करेंगी। ऐसे में, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का एलान स्वागतयोग्य है, क्योंकि ऐसे अपराधों की जांच वर्षों तक लंबित रहने या दोषियों को समय पर सजा न मिलने से गलत संदेश जाता है।


हालांकि, नीट यूजी-2024 पेपर लीक के मुख्य आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में सीबीआई से क्लीनचिट मिलना यह भी याद दिलाता है कि केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। अगर जांच एजेंसियां ठोस साक्ष्य नहीं ढूंढ पातीं और मुकदमे न्यायालय में टिक ही नहीं पाते, तो कानून का डर स्वत: कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में, जरूरत सिर्फ दंड को कठोर बनाने की नहीं, बल्कि जांच प्रक्रिया को अधिक पेशेवर, तकनीकी रूप से सक्षम और समयबद्ध बनाने की भी है।


फिलहाल, यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर संगठित स्वरूप नहीं ले पाया है, लेकिन इतिहास बताता है कि युवाओं के असंतोष को केवल इस आधार पर हल्के में नहीं लिया जा सकता। सरकार को समझना होगा कि संवाद की शुरुआत जितनी आवश्यक है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है कि उसके नतीजे भी दिखें, सिर्फ आश्वासन पर्याप्त नहीं होंगे। यह सही है कि विभिन्न संगठन और विपक्षी दल इस आंदोलन को अपनी-अपनी तरह से आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन इसके मूल में युवाओं की भविष्य को लेकर जो चिंता है, उसे खारिज नहीं किया जा सकता। सरकार और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है कि छात्रों के भविष्य से जुड़े मुद्दे को दलगत हितों से ऊपर रखें। यहां प्रश्न राजनीतिक जीत-हार का नहीं, बल्कि देश की परीक्षा प्रणाली पर युवाओं के भरोसे को लौटाने का है। 

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