जनता परिवार की एकता के लिए जो प्रयास आरंभ हुए थे, उसमें पहली सफलता तो मिल गई, पर यदि भाजपा का विकल्प ही इसका मूल उद्देश्य था, तब इसे वैचारिक रूप से पूर्ण नहीं माना जा सकता, क्योंकि ऐसे प्रयोग कांग्रेस के विकल्प के रूप में भी हुए थे। वे प्रयोग सत्ता में पहुंचने के बाद स्वार्थ और संकल्पहीनता के कारण बिखर भी गए। उस बिखराव का सबसे निकृष्ट रूप तो 1969 में तब देखने में आया था, जब कांग्रेस, उसके संगठन, विचार और शैली से नाराज होकर चौधरी चरण सिंह अलग हुए, उत्तर प्रदेश में संविद सरकार बनी, पर कांग्रेस-विरोधी स्वार्थों में एकरूपता न होने के कारण वह विकल्प बिखर गया।
यही हाल आपातकाल के खिलाफ भी रहा, जिसमें जनता की भावना को ध्यान में रखकर एक चुनाव चिह्न पर कई दल मिलकर चुनाव लड़े, जीते, पर वह विकल्प पांच वर्षों तक भी स्थायी नहीं रह पाया। यही स्वरूप गैर कांग्रेसवाद के बाद 1989 में भी बना था, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने और भाजपा तथा कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थन से सरकार चली, पर वह एक वर्ष का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। इसी प्रकार जब पीवी नरसिंह राव सरकार के बाद गठजोड़ों की राजनीति के प्रयोग हुए, तो कांग्रेस की निर्णायक भूमिका के कारण एक-एक वर्ष के कार्यकाल के उसमें दो प्रधानमंत्री बने।
जहां तक जनता परिवार की एकता का संबंध है, समाजवादी पार्टी का उदय तो कांग्रेस के पेट से ही हुआ था। लेकिन वह प्रयोग टूटा, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनी और फिर विभाजन के नए प्रयोग होते गए। समाजवादी पार्टी टूटने और बिखरने के प्रयोग में सबसे अग्रणी बन गई। तर्क यह दिया गया कि हम विचार की राजनीति करते हैं, इसलिए सत्ता निर्णायक नहीं हो सकती। बिखराव कहां-कहां, कैसे हुए, यदि इस रूप में देखें, तो यह पैबंद के रूप में दर्जन भर से अधिक पार्टियों में दिखाई पड़ रहा है।
ऐसी स्थिति में समाजवादी परिवार की एकता के लिए जिन घटकों को एकता के नाम पर समायोजित किया जा रहा है, उनके स्थायित्व का सवाल तो रहेगा ही। यह बात जदयू के नेता शरद यादव ने कह भी दिया है कि हम इसके स्थायित्व को लेकर अभी कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। फिर यह एकजुट जनता परिवार बिहार के चुनाव में जितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है, उतनी कहीं और नहीं। उत्तर प्रदेश के चुनाव में इसका बहुत मतलब नहीं, इसलिए सपा के भीतर इसे लेकर बहुत उत्साह भी नहीं दिखता।
जनता दल की मौजूदा एकजुटता को भाजपा के राजनीतिक विरोध की आवश्यकता बताया जा रहा है। पर राजनीति मूलतः वैचारिकता पर आधारित होती है, वह सिर्फ विरोध के आधार पर अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सकती। इसलिए वैचारिक एकता के अभाव में यह परिवार कहीं एकांगी न हो जाए, क्योंकि किसी पार्टी का मूल तत्व यदि विरोध पर ही आधारित होगा, तो जिसका विरोध किया जा रहा है, उसकी समाप्ति के बाद फिर एकता के कौन से तत्व होंगे? इसलिए जनता परिवार में ऐसी कोई वैचारिक एकता तो होनी ही चाहिए, जिसे उसकी निष्ठाओं से जोड़ा जा सके। ऐसे में इस परिवार को स्वार्थ, पदलिप्सा, दूसरे को धकेल कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति-इस सबको छोड़ना पड़ेगा, जो आसान नहीं है। अलगाव के बजाय जुड़ने की प्रवृत्ति इसका स्थायी तत्व हो, तभी वह जनता परिवार को एक स्थायी विकल्प बना सकेगा।