फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पानी के प्रवाह का सवाल

Fri, 08 Apr 2016 07:31 PM IST
वरुण गांधी
विज्ञापन
वरुण गांधी
विज्ञापन
पश्चिम बंगाल में एनटीपीसी के 2,100 मेगावाट की क्षमता वाले बिजली संयंत्र को 13 मार्च को बंद करना पड़ा, क्योंकि संयंत्र को ठंडा रखने के लिए पानी की आपूर्ति करने वाली फरक्का फीडर नहर में पानी कम हो गया था। इसके कारण पांच राज्यों में बिजली की आपूर्ति प्रभावित हुई और 38 हजार परिवारों को बिजली की किल्लत झेलनी पड़ी। वहीं, फरक्का शहर में भी पेयजल की समस्या भी खड़ी हो गई। गंगा में नावों के संचालन को स्‍थगित करना पड़ा, जबकि कोयले से लदी 13 नौकाएं गंगा में कम पानी में धंस गईं। इससे जाहिर होता है कि गंगा धीरे-धीरे उथली होती जा रही है।
विज्ञापन


हरियाणा के खेत सूख रहे हैं, जाट आंदोलन वहां कृषि संकट को बढ़ावा दे रहा है। पंजाब विधानसभा द्वारा सतलुज यमुना लिंक नहर बिल को स्वीकृति के बाद जल बंटवारे को लेकर भी संकट पैदा हो गया है। पिछले एक दशक में भारत के 91 प्रतिशत जलाशयों में पानी की उपलब्‍धता कम हुई है। केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक, इन जलाशयों में की कुल क्षमता का महज 29 प्रतिशत पानी बचा है। देश की 85 प्रतिशत पानी की जरूरत को पूरा करने वाले भूमिगत जल का स्तर लगातार गिर रहा है। पानी के टैंकरों पर निर्भरता बढ़ रही है, पानी के लिए टकराव बढ़ रहा है- लातूर के गांवों में प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए गए हैं और स्वीमिंग पूलों में पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई है। सिंचाई की अक्षमता और अदूरदर्शी राजनीतिक चालाकियां पानी के विवाद को और भी बढ़ा देती हैं। पानी एक ऐसी चीज है, जिसका उपभोक्ताकरण नहीं किया जा सकता।

ज्यादातर राज्य अक्सर हारमन सिद्धांत का हवाला देते हुए अपनी सीमा से होकर बहने वाले पानी पर अपना पूर्ण आधिपत्य जताते हैं। टकराव से निपटने के लिए अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) बनाया गया था। पर, इसके तहत गठित न्यायिक ट्रिब्यूनल में प्रत्यक्ष समझौते भी विफल हो जाते हैं। बाध्यकारी तंत्र न होने के कारण विवाद में शामिल पार्टियां इनके फैसले को कई बार मानने से इन्कार कर देती हैं। केंद्र के दखल का हश्र भी वही होता है, जैसा रावी-ब्यास विवाद में हुआ था।
विज्ञापन


वास्तव में भारत में पानी के विवाद के निपटारे से जुड़ा तंत्र अस्पष्ट और संदिग्‍ध बना हुआ है। राज्य सरकारें, संसद, कोर्ट, जल न्यायाधिकरण, केंद्रीय मंत्रालय एवं सिविल सोसायटी जैसे कई हिस्सेदार होने के कारण जल विवादों का निपटारा भारत में एक बड़ी समस्या बना हुआ है। विकास, राष्ट्र हित से जुड़े परिणाम देने में संस्‍थागत व्यवस्‍थाएं भी विफल साबित हो रही हैं। 1968 से 1990 के बीच कावेरी विवाद को निपटाने के लिए 26 मंत्री स्तरीय बैठकें तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच हुईं, मगर कोई सहमति नहीं बन सकी। बढ़ते राजनीतिकरण के कारण कावेरी जल विवाद निपटारे के लिए गठित ट्रिब्यूनल का प्रस्ताव महज एक मृग मरीचिका बनकर रह गया।

सिंधु के जल बंटवारे के लिए जिस तरह भारत और पाकिस्तान के बीच समझौता है, उसी तरह उप-घाटी केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने से सफलता मिल सकती है। कृष्णा गोदावरी विवाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और मध्य प्रदेश के बीच अतिरिक्त पानी के अंतरराज्यीय उपयोग पर केंद्रित था। 1976 में कृष्‍णा टिब्यूनल ने अपना फैसला सुनाया, जो विचाराधीन अथवा चालू परियोजनाओं के पक्ष में था। वहीं, कृष्‍णा के पानी को नदी घाटी के बाहर, मगर प्रवाह तंत्र में शामिल राज्यों की सीमा के भीतर मोड़ने की अनुमति दे दी गई। जल प्रवाह के विभाजन की मात्रा निर्धारित न होने से इसे सफलता मिली, जो राज्यों के बीच उप-घाटी पर केंद्रित समझौतों पर ही आधारित था। भारत की कृषि नीति में भी सुधार की जरूरत है।

नासा के मुताबिक भारत में जल स्तर 0.3 मीटर की दर से हर साल गिर रहा है। यह भी विडंबना है कि हम पानी की उपलब्‍धता की परवाह किए बिना शुष्क इलाकों में गन्ने की खेती की सलाह देते हैं। शुष्क भूमि पर चावल एवं गेहूं के उत्पादन पर जिस तरह ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, उसे बदलने की जरूरत है। दूसरी ओर खेती में ड्रिप सिंचाई से भी गिरते जल स्तर पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है।

पानी के संरक्षण से जुड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों के डिजाइन, समन्वय और नियंत्रण पर केंद्रित एक केंद्रीय नियामक एजेंसी के गठन की जरूरत है। सामाजिक समता, जरूरत और तर्क आधारित पानी के विभागीय बंटवारे से जुड़े फैसले लेने के लिए एक संचालन तंत्र की जरूरत है। समुदाय, इंडस्ट्री और नागरिकों को आवंटन से जुड़ी बातचीत में शामिल करने के लिए सरकार को क्षेत्रीय एवं नदी घाटियों से जुड़े जल नियोजन को अपने हाथ में लेना चाहिए। नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को बचाए रखने के लिए नियमों को भी सख्त करने की जरूरत है। नदियों में न्यूनतम जल प्रवाह बनाए रखने के लिए भी हमें कानूनी प्रावधान बनाने होंगे।

दलदल, घास के मैदान और वनों से आच्छादित केवलादेव नेशनल पार्क राजस्थान के भरतपुर में 29 किलोमीटर के दायरे में फैला है। सर्दियां आते ही यह पार्क लोकप्रिय हो जाता है, क्योंकि यहां प्रवासी साइबेरियाई सारस की 370 से ज्यादा प्रजातियां झुंड में पहुंचती हैं। इस अभयारण्य में रहने वाले जीवों की पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए मानसून के दौरान हर वर्ष 500 मीलियन क्यूबिक फीट पानी की जरूरत होती है, जिसका अधिकांश गंभीर नदी (जिस पर अब पंचना बांध बना है) से उपलब्ध कराया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को नोटिस दिया था कि पंचना बांध से पानी छोड़े, लेकिन सिंचाई के लिए पानी की मांग करने वाले किसानों के विरोध के कारण उस पर अमल नहीं हुआ। नदी तट के आसपास इस तरह के विवाद में देखा गया है कि पानी की कमी राजनीति से जुड़ जाती है, जो मुक्त पानी के संरक्षण को प्रोत्साहित करती है और पानी की राजनीतिक कीमत बढ़ जाती है। दीर्घकालीन नदी तटीय स्थिरता की तलाश ही इसका एकमात्र उपाय है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें