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पटेल की विरासत पर झगड़ने वाले

Fri, 01 Nov 2013 09:15 PM IST
अवधेश कुमार
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अगर आप नरेंद्र मोदी के प्रति व्यक्तिगत या वैचारिक आग्रह-दुराग्रह से परे हटकर विचार करेंगे, तो यह स्वीकार करने में हिचक नहीं होगी कि लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारतीय राजनीति के बहस के केंद्र में लाने की अपनी रणनीति में वह सफल हो चुके हैं। पहले पटेल की 182 मीटर ऊंची दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा लगाने की घोषणा, उसके लिए गांव-गांव से लोहा दान कराने की योजना, फिर प्रधानमंत्री के साथ मंच पर नेहरू की जगह उनको प्रधानमंत्री का बेहतर व्यक्तित्व बताना और अब पटेल की 138वीं जयंती के मौके पर नर्मदा के तट पर केवाडिया में उस प्रतिमा ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ यानी एकता प्रतिमा का शिलान्यास...।
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इस समय का जमीनी सच यही है कि दूसरे नेता एवं पार्टियां चाहे पटेल को संघ व भाजपा विरोधी साबित करते रहें, मोदी विरोधी बुद्धिजीवी चाहे अपनी बुद्धि का जितना वितंडावाद प्रकट करें, मोदी अपने समर्थकों तक राजनीतिक संदेश देने में सफल हैं। हालांकि महापुरुषों को चुनावी आईने में देखना उचित नहीं होगा, लेकिन चूंकि इस समय चुनाव का मौसम है और सारी रणनीतियां उसी के इर्द-गिर्द बुनी जा रही हैं, इसलिए इस प्रश्न का उत्तर तलाश करना आवश्यक है कि इसका चुनावी लाभ किसे मिलेगा?

इसका उत्तर देने के लिए हमें इस प्रश्न पर विचार करना होगा कि क्या पटेल की आज के समय में इतनी प्रासंगिकता निःशेष है कि लोग उनके प्रति संवेदनशील होकर अपना राजनीतिक मत बनाएं? अगर ऐसा नहीं होता, तो इस तरह कांग्रेस सहित सारे राजनीतिक दल मोदी, भाजपा एवं संघ पर टूट नहीं पड़ते। ध्यान रखिए कि मोदी ने महात्मा गांधी का भी मंदिर बनाया, जो इस समय पटेल पर बहस के कारण सुर्खियां पा रहा है। कांग्रेस एवं प्रधानमंत्री कहते हैं कि पटेल धर्मनिरपेक्ष थे। इस पर मोदी का जवाब है कि देश को सरदार साहब जैसी धर्मनिरपेक्षता चाहिए, वोट बैंक वाली धर्मनिरपेक्षता नहीं। इसके साथ वह यह जोड़ना नहीं भूलते कि सरदार साहब ऐसे धर्मनिरपेक्ष थे, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर बनावाया।
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जरा सोचिए, इस समय 1990 के दशक के समतुल्य घूमते राष्ट्रवाद के चक्र के इस दौर में इसका वैचारिक असर लोगों पर किस तरह हो सकता है। पटेल पर बहस से धर्मनिरपेक्षता पर बहस ठीक उसी तरह सतह पर आ चुकी है, जिस तरह 1990 के दशक में अयोध्या में श्रीराममंदिर आंदोलन के समय आडवाणी द्वारा धर्मनिरपेक्ष राजनीति को विकृत धर्मनिरपेक्षता कहने से आई थी। तब भाजपा को उसका लाभ मिला था और 1999 के आते-आते कांग्रेस 112 लोकसभा सीटों पर खिसक गई, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से उसका सफाया हो गया। इसलिए पटेल की प्रासंगिकता वर्तमान राजनीति में धर्मनिरपेक्षता बनाम गैर धर्मनिरपेक्षता के विभाजन के बीच सबसे ज्यादा है।


हमारी समस्या यह है कि सरदार पटेल पर उतने शोध नहीं हुए, जितने नेहरू, गांधी आदि पर हुए, इसलिए उनके बारे में बहुत सारे सच प्रामाणिक पुस्तकों के रूप में उपलब्ध नहीं है।

नेहरू और पटेल के बीच अनेक कामों में सामंजस्य था, तो वह इसलिए कि देशहित उनके लिए सर्वोपरि था। पटेल चाहते तो प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी कर सकते थे, तब गांधी जी के लिए फैसला करना मुश्किल हो जाता। लेकिन उनके लिए देशहित सर्वोपरि था, पद नहीं। इसलिए अवसरवादी राजनीति को उन्होंने अपने पास फटकने नहीं दिया। नेहरू और पटेल के बीच पत्र व्यवहार और बातचीत के जितने अंश उपलब्ध हैं, उनसे दोनों के बीच तीखे वैचारिक मतभेदों के प्रमाण मिलते हैं। कई पत्र में तो एक दूसरे के विरुद्ध इतने कड़े आलोचनात्मक शब्दों का प्रयोग है, जिसकी इसे न पढ़ने वालों को कल्पना भी नहीं होगी। संघ पर प्रतिबंध लगाने और उसके बाद नेहरू को राजी कर इसे समाप्त करने का कदम भी उन्होंने ही उठाया था।

किसी महापुरुष की प्रतिमा लगाने या उस पर बहस से ज्यादा आवश्यक उनके विचारों को जीवन में उतारना है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा या कोई भी दल- इस कसौटी पर सभी विफल हैं, लेकिन कांग्रेस इसमें अव्वल है।  
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