राजनीतिक रूप से देश के सबसे महत्वपूर्ण राज्य के विधानसभा चुनाव में आदिवर्णिक शब्द (विभिन्न शब्दों के शुरुआती अक्षरों को मिलाकर गढ़ा गया शब्द) सभी योद्धाओं के पसंदीदा हथियार के रूप में उभरकर सामने आया है। आदिवर्णिक शब्दों के उत्सुक प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मेरठ में एक जनसभा में अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करते हुए अंग्रेजी के शब्द 'स्कैम' का मतलब समाजवादी, कांग्रेस, अखिलेश और मायावती बताया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तुरंत उसी शब्द का अपने ढंग से मतलब बताते हुए पलटवार किया। अखिलेश ने कहा कि वस्तुतः स्कैम का मतलब होता है-सेव कंट्री फ्रॉम अमित शाह ऐंड मोदी (देश को अमित शाह और मोदी से बचाएं)।
कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी पीछे नहीं रहे, उन्होंने स्कैम को सेवा, साहस, क्षमता और शील के रूप में परिभाषित किया। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि प्रधानमंत्री मोदी इन सबसे काफी दूर हैं। सोशल मीडिया ने तुरंत अपने शब्दों और वाक्यांशों के तोपखाने का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। किसी ने ट्वीट किया, 'अबकी बार आदिवर्णिक शब्दों वाली सरकार'। इन सभी जुबानी जंग के बीच इस विडंबना को भूलना मुश्किल है कि हिंदी हृदयप्रदेश में आदिवर्णिकी शब्दों के जरिये लड़ी जा रही इस राजनीतिक लड़ाई में अंग्रेजी भाषा के शब्द का इस्तेमाल हो रहा है। इससे भी एक बड़ी विडंबना का पता मुझे हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तूफानी यात्रा के दौरान चला।
चुनावी बयानबाजी और सर्वेक्षणों के शब्दों की उड़ान के बीच उन असली मुद्दों पर बहुत कम बातें हो रही हैं, जिनके कारण उत्तर प्रदेश का विकास पटरी से उतरा हुआ है। उत्तर प्रदेश में बीस करोड़ लोग रहते हैं, इसलिए उसका भारी राजनीतिक महत्व है। उत्तर प्रदेश के मतदाता यदि इतने महत्वपूर्ण हैं, तो फिर यह सूबा स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण परिणामों और बुनियादी संरचनाओं के क्षेत्र में इतना पिछड़ा हुआ क्यों है?
कुछ दिनों पहले आगरा, हाथरस और बुलंदशहर जैसे इलाकों के आम लोगों से बात कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंची कि इन मुद्दों का उनके जीवन में बहुत मतलब है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अपने आसपास होने वाली चुनावी बातचीत में वे इन्हें प्रमुखता मिलते नहीं देखते। इन तीनों शहरों के बाजारों और गलियों में मैं जिन युवाओं से मिली, उनका कहना था कि राजनेताओं के चुनावी वायदे सुन-सुनकर वे थक चुके हैं और जमीनी स्तर पर काम होता देखना चाहते हैं। बुलंदशहर में जूस बेचकर जीविका चलाने वाले एक युवक का कहना था कि यह शहर दो चीजों के लिए प्रसिद्ध है-निजी कॉलेज और निजी अस्पताल। लेकिन ये दोनों ही दोयम दर्जे के हैं। उसने बताया कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए काफी काम किया हैं, हालांकि इसे और भी बेहतर करने की जरूरत है।
समस्या की जड़ यह है कि मतदाता पिछले कुछ वर्षों में सत्ता में रहे सभी राजनीतिक दलों पर वायदाखिलाफी का आरोप तो लगाते हैं, लेकिन न तो वे अपनी मांग जोर-शोर से उठाते हैं और न ही वोट मांगने आए प्रत्याशियों से इस संबंध में जमकर पूछताछ करते हैं। सिर्फ यही नहीं कि राज्य में विकास नहीं हुआ है, बल्कि यहां कुछ जरूरी सवाल हैं, जो जवाब की मांग भी करते हैं।
असर (एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट) की ताजा रपट बच्चों की स्कूली शिक्षा और बुनियादी शिक्षण पर केंद्रित है, जिसके मुताबिक, अखिल भारतीय स्तर पर सभी उम्र के छात्रों में वर्ष 2014 से 2016 के बीच बच्चों का स्कूलों में दाखिला बढ़ा है। हालांकि कुछ राज्यों में स्कूली शिक्षा से वंचित छह से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों की संख्या में इस अवधि के दौरान बढ़ोतरी देखी गई है। इस सूची में उत्तर प्रदेश भी शामिल है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी इस श्रेणी में आने वाले अन्य राज्य हैं।
दूसरी बेहद चिंताजनक बात यह है कि उत्तर प्रदेश उन राज्यों की सूची में भी शामिल हैं, जहां ग्यारह से चौदह वर्ष की आठ फीसदी से ज्यादा लड़कियां अब भी स्कूली शिक्षा से वंचित हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए जारी भाजपा के घोषणापत्र में कहा गया है कि पार्टी यदि राज्य में सत्ता में आती है, तो वह विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में मुफ्त वाईफाई की सुविधा उपलब्ध कराएगी। समाजवादी पार्टी ने नौ से बारह वर्ष की लड़कियों को मुफ्त साइकिल देने का वायदा किया है। ये सभी अच्छी बातें हैं, लेकिन सवाल फिर भी रह जाता है कि राज्य के इतने सारे बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित क्यों हैं!
अब जरा स्वास्थ्य सुविधा के बारे में बातें करें, जो एक दूसरा चिंताजनक मुद्दा है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के हाल में हुए एक अध्ययन में रेखांकित किया गया है कि फरवरी और मार्च में जिन पांच राज्यों (16.9 करोड़ मतदाता) में चुनाव हो रहे हैं, उनमें प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च (केंद्र और राज्य, दोनों को मिलाकर) सबसे कम उत्तर प्रदेश में ही होता है। इसका नतीजा कई स्वास्थ्य संकेतकों में दिखता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश देश का दूसरा राज्य है, जहां मातृत्व मृत्यु दर (प्रति लाख बच्चों के जन्म पर जननी की मौत) सबसे ज्यादा है। इन मौतों को लेकर राजनीतिक बहस क्यों नहीं होती? और आज के समय में लाखों बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, इसे क्यों स्वीकार किया जाता?
यह कहना तो फिलहाल मुश्किल है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी लड़ाई में कौन जीतेगा, क्योंकि अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि जो भी जीतता है, उसे इन मुद्दों पर काम करने के लिए कहना होगा, ताकि वे राज्य के लोगों को बेहतर सुविधा दें। अन्यथा हम हमेशा जुबानी जंग लड़ते रहेंगे और लोगों की जिंदगियां निराशा में फंसती रहेंगी।