किसी विशेष देश के साथ व्यापार को नियंत्रित करने के लिए टैरिफ का चुनिंदा ढंग से उपयोग केवल संरक्षणवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उससे आगे की चीज है। कई समीक्षकों का मानना है कि इस नीति के पीछे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अन्य देशों के सस्ते निर्यात से बचाने या देश में विनिर्माण को पुनर्जीवित करने जैसे आर्थिक कारण कम, बल्कि अमेरिका द्वारा अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन और वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश अधिक है। इस नीति के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं-एक ओर जहां चीन ने इस नीति का कड़ा विरोध किया, तो यूरोपीय संघ समझौते के दबाव में झुक गया और जापान ने ऐसा व्यापार करार किया, जिससे वास्तविक लाभ अमेरिका को ही मिला। भारत इसका डटकर विरोध कर रहा है। संभावित समझौतों से जुड़े किसी सकारात्मक फैसले पर पहुंचने के लिए दोनों देशों के बीच जारी बातचीत का भविष्य भी फिलहाल संकट में ही दिख रहा है।
अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया, जिसमें रूसी तेल की निरंतर खरीद के दंडस्वरूप अतिरिक्त 25 फीसदी शुल्क भी शामिल है। इस लेख का उद्देश्य पारस्परिक शुल्कों और व्यापार समझौतों की विघटनकारी प्रकृति को देखते हुए, भारत पर इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही स्तरों पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों का विश्लेषण करना है।
सबसे पहले मैं उन अप्रत्यक्ष प्रभावों पर चर्चा करूंगा, जो स्वाभाविक रूप से अधिक जटिल हैं। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा फैलाई गई व्यापारिक अनिश्चितताओं के कई वैश्विक निहितार्थ हैं। विश्व बैंक के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि चालू वर्ष में वैश्विक आर्थिक वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंका है। ऐसी अनिश्चितताओं का भारत की प्रगति पर भी असर पड़ेगा ही। विभिन्न अनुमान बताते हैं कि पारस्परिक शुल्क के कारण भारत की वृद्धि में 50 से 100 आधार अंकों की गिरावट आ सकती है। दूसरा, रूस कच्चे तेल का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश है, जो कुल वैश्विक उत्पादन का 12 फीसदी से अधिक हिस्सा अकेले प्रदान करता है और उत्पादन की दृष्टि से तीसरे स्थान पर आता है। ऐसे में, रूसी तेल की खरीद पर रोक लगाने या रूस पर व्यापक प्रतिबंध थोपने के प्रयास लंबे समय तक टिक पाएंगे, ऐसी उम्मीद कम ही है। लेकिन अल्पावधि में कच्चे तेल की आपूर्ति में व्यवधान पैदा होने से ऊर्जा आपूर्ति में कमी आएगी, जिसके कारण बड़े पैमाने पर मुद्रास्फीति की समस्या बढ़ सकती है। भारत को भी इस चुनौती पर ध्यान देना होगा। तीसरा, आर्थिक शक्ति के जिस वैश्विक पुनर्गठन की बात की जा रही है, उससे भी कई चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप अमेरिका के आर्थिक हितों की रक्षा के नाम पर भागीदार देशों को धमकाते-डराते रहेंगे।
इसके प्रत्यक्ष प्रभावों को आसानी से समझा जा सकता है। सर्वविदित है कि अमेरिकी टैरिफ भारत से निर्यात होने वाले क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगे। ये प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः श्रम-प्रधान उद्योग हैं, जिनमें वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, झींगा, चमड़े के सामान, रसायन तथा ऑटो-पार्ट्स प्रमुख हैं। स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों पर नकारात्मक असर का सीधा संबंध भारत में रोजगार की स्थिति पर भी पड़ेगा। चूंकि, भारत पहले से ही उच्च बेरोजगारी दर की चुनौती से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में ‘ट्रंप-टैरिफ’ के कारण रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का गहन विश्लेषण किया जाना नितांत आवश्यक है, ताकि उचित नीतिगत कार्रवाई की जा सके और जिसमें टैरिफ के कारण नौकरी खो सकने वाले लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा/आय हस्तांतरण भी शामिल हो।
पिछले कुछ महीनों में वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा इस तरह के लेन-देन पर आधारित होती नजर आ रही है, जहां सब कुछ राष्ट्रपति ट्रंप की व्यक्तिगत धारणा और व्याख्या पर टिका प्रतीत होता है। यह अलग बात है कि ऐसी व्यापार नीति दीर्घकाल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भी बहुत नुकसान पहुंचा सकती है। क्या बढ़ता हुआ संरक्षणवाद वास्तव में सिर्फ ट्रंप की ही देन है? ऐसा नहीं है। 2019 में, जर्नल ऑफ इकनॉमिक पर्सपेक्टिव में मैरी अमिटी, स्टीफन जे. रेडिंग और डेविड ई. वीनस्टीन द्वारा प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोधपत्र में इस विषय पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया था, जिसमें इसके व्यापक संदर्भों और प्रभावों को साफ तौर पर समझाया गया है। इसमें बताया गया कि 1971 में रिचर्ड निक्सन ने शुल्क योग्य आयात पर 10 प्रतिशत का ‘अधिभार (सरचार्ज)’ टैरिफ लगाया था। इसके बाद 1977 में जिमी कार्टर ने जूतों के आयात पर कोटा तय किया। 1981 में रोनाल्ड रीगन ने जापानी सरकार पर दबाव डालकर अमेरिका में जापानी ऑटोमोबाइल के निर्यात को सीमित करने वाला ‘स्वैच्छिक निर्यात समझौता (वॉलंटरी एक्सपोर्ट रेस्ट्रेंट)’ लागू कराया।
इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए 2002 में जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने स्टील पर टैरिफ लगाया और 2009 में बराक ओबामा ने चीनी टायरों पर 35 प्रतिशत शुल्क थोप दिया। केवल जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश और बिल क्लिंटन ने ही इस परंपरा का विरोध किया। बिल क्लिंटन ने तो अपने प्रशासन के पहले साल ही 1993 में उत्तरी अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करके व्यापार को और अधिक उदार बना दिया था। गौरतलब है कि अतीत में अमेरिका द्वारा टैरिफ लगाए जाने के इन उदाहरणों में ज्यादातर में सहयोगी देशों ने विश्व व्यापार संगठन से अमेरिका की शिकायत भी की थी।
तो क्या हम राष्ट्रपति ट्रंप के दिखावटी कदमों पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहे हैं? क्या यह दिखावा जल्द ही खत्म होगा या फिर इसमें वैश्विक व्यापार व्यवस्था को जड़ से बदलने की क्षमता है? चाहे जो भी हो, इसके तात्कालिक प्रभाव भी खतरनाक साबित हो सकते हैं। यदि अमेरिकी टैरिफ से उपजी यह व्यापारिक अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रहती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का स्तर और भी गहरा जाएगा। ऐसे में भारत को इस चुनौतीपूर्ण दौर का सामना करने के लिए सीधी टक्कर लेनी ही चाहिए।